बिजनेस स्टैंडर्ड - मोदी और वंदे भारत बनाम भारत के बंदे
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मोदी और वंदे भारत बनाम भारत के बंदे

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  May 10, 2020

सियासत की 'सुर्खियां बदल डालने' के मामले में नरेंद्र मोदी सरकार का कोई सानी नहीं है और जिस महारत के साथ वह ऐसा करती है उसके क्या कहने! इसकी ताजातरीन मिसाल वंदे भारत मिशन है। मायूसी के इस दौर में भी इसने हलचल खड़ी कर दी है।

कोरोनावायरस ने दुनिया भर में अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी है। कमोबेश हरेक देश के विदेश में नौकरी करने वाले नागरिक, छात्र, सैलानी और परिवार दुनिया भर में फंसे हैं। ज्यादातर ने उन्हें वापस लाने के लिए कुछ न कुछ किया है।

मगर भारत ने इसे भी आयोजन बना दिया है। आयोजन मोदी का है तो इसे सुर्खी भी मिलनी है और हैशटैग भी। कई मंत्रालयों के हैंडलों से इसका जश्न मनाते ट्वीट भी आने ही हैं। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का अपना आईटी विभाग भी यह काम कर रहा है और टेलीविजन चैनल भी पीछे नहीं हैं। पार्टी और सरकार के करीबी चैनलों ने पल-पल की खबरें देनी शुरू कर दी हैं। मसलन: जब विमान उड़ान भरता है तो पाश्र्व में धूम मचाता संगीत होता है। 781 भारतीयों के स्वदेश लौटने का जश्न तो ऐसे मनाया जाता है मानो वे मुजफ्फराबाद या स्कार्डू को आजाद कराकर लौट रहे हैं। मंत्री ऐसे ताली बजा रहे हैं मानो कोई बड़ी उपलब्धि हासिल कर ली हो या लोगों को मौत के मुंह से बचाकर लाया गया हो। इतना काफी नहीं है तो स्वदेश लौटने वाले भारत मां के इन लालों के लिए शानदार होटलों में बने क्वारंटीन सेंटरों की कहानी दिन भर टीवी पर चलती रहती है।

हमें यह भी याद दिलाया जाता है कि वे इसका खर्च खुद भर रहे हैं क्योंकि उनके पास रकम है। भई, आखिरकार वे खास हैं, जो हर हिंदुस्तानी नहीं हो सकता। हिंदुस्तान के 1.38 अरब लोगों के बारे में सोचिए। भगवान इतने सारे लोगों पर कृपा कैसे कर सकता है? वह कुछ खास लोगों को चुनता है। हम सबको खुश तो होना ही चाहिए। सरकार इतने सारे भले भारतीयों को अपने जहाजों पर वापस ला रही है और उन्हें आलीशान क्वारंटीन सेंटरों में रख रही है ताकि वे महफूज रहते हुए अपने परिवारों, दोस्तों और पड़ोसियों के पास पहुंच सकें। भारत ने लंबे अरसे बाद ऐसा कारनामा किया है। पिछला कारनामा अक्षय कुमार का था, जो 1990 में इराक के कब्जे वाले कुवैत से अकेले दम पर ही लाखों को निकाल लाए थे। यह आधुनिक और उभरते भारत का जज्बा है, विश्व गुरु का जज्बा है। सब एकजुट होकर सावधान खड़े हो जाएं और 'वंदे भारत मिशन' के जज्बे को सलाम करें। और उन छोटे-मोटे भारतीयों की चिंता मत कीजिए, जो छाले भरे पैरों और खाली पेट के साथ हजारों मील पैदल चलकर घर जा रहे थे। जिनके स्वागत के लिए कोई नहीं खड़ा था, कोई ट्वीट नहीं कर रहा था। जिनके लिए क्वारंटीन केंद्र नहीं थे, 45 दिन तक बसें और ट्रेनें भी नहीं थीं, जबकि वे भी इसका खर्च उठाने के लिए तैयार रहे होंगे।

वे खास नहीं थे। अगर वे चतुर होते, ज्यादा पढ़े-लिखे होते, उनके माता-पिता ज्यादा सफल होते तो वे निर्माण स्थलों पर ईंट-रोड़ा क्यों ढो रहे होते? वे विदेश में काम कर रहे होते या पढ़ रहे होते। अगर ऊपर वाले ने सभी भारतीयों को एक जैसा नहीं बनाया तो ऊपर वाले से ही शिकायत कीजिए। और तब तक इस महान राष्टï्रीय मिशन के लिए ताली बजाइए। इसीलिए इस बार का लेख 'वंदे भारत बनाम भारत के बंदे' है।

और यहां एक सवाल खड़ा होता है, जिसके इतनी जल्दी खड़े होने की हमें उम्मीद नहीं थी: क्या नरेंद्र मोदी का जलवा कम हो रहा है? उनका यहां तक पहुंचे हैं, दो बार पूर्ण बहुमत हासिल किया है और पूरे विपक्ष को ध्वस्त कर दिया है तो ऐसा थोड़े ही है कि वह चतुर नहीं हैं। वह इंदिरा गांधी के बाद सबसे चतुर, सबसे होशियार राजनेता हैं। मगर उन्हें इंदिरा गांधी की तरह सब कुछ विरासत में नहीं मिला, उन्होंने सब कुछ अपने दम पर हासिल किया है और शायद आजाद भारत में ऐसा करने वाले वह पहले राजनेता हैं। उनकी राजनीतिक छवि तीन पहलुओं पर टिकी है। सबसे पहला शानदार वाक् शैली और संदेश देने की ताकत, दूसरा व्यक्तित्व और निर्णय लेने की क्षमता का आभामंडल और तीसरा तथा सबसे अहम पहलू है, आम हिंदुस्तानी के साथ जुड़ जाने का ऐसा हुनर कि गरीब से गरीब भारतीय खुद को उनसे जुड़ा महसूस करता है। वोटर उन्हें पसंद करते हैं क्योंकि उनमें वह सब दिखता है, जो गांधी परिवार में नहीं है। वह अपने दम पर यहां पहुंचे हैं, रईस नहीं हैं, कामकाजी तबके के हैं (चायवाला), चांदी का चम्मच लेकर पैदा नहीं हुए या विदेश में शिक्षा हासिल नहीं की, सादा, मितव्ययी जीवन जीते हैं और गरीबों का दर्द समझते हैं। सबसे अहम है गरीबों का दर्द समझना। मोदी ने बहुत होशियारी के साथ अपनी परिवारवाद विरोधी छवि गढ़ी है, ऐसे शख्स की छवि, जिसने खास लोगों के बीच रहकर नहीं बल्कि पूरे देश के एक-एक जिले में जाकर और समय गुजारकर देश की नब्ज को समझा है। वह याद दिलाते रहते हैं कि सत्ता जाने पर भी उन्हें तकलीफ नहीं होगी। वह झोला उठाएंगे और घर चले जाएंगे। 'फकीर' के पास खोने के लिए होता ही क्या है?

यही समझ थी, जिसे 'सूट-बूट' का जुमला सामने आते ही उन्हें होशियार कर दिया। इसी वजह से उन्होंने राजनीतिक अर्थव्यवस्था के मामले में यू-टर्न ले लिया। कारोबारियों के अनुकूल गुजरात मॉडल को छोड़ दिया गया। मनरेगा जैसी योजनाओं का मखौल उड़ाने के बजाय उन्हें मजबूत कर दिया गया। वह जानते थे कि जिस हिंदुस्तानी राजनेता को खुद तो चुनाव जीतना ही होता है, 300 दूसरे लोगों को भी लोकसभा चुनाव में जिताना होता है, उसके लिए असली वीआईपी गरीब होते हैं, कामकाजी तबका होता है। शहरी अभिजात या मध्य वर्ग नहीं।

मगर फिर कोरोनावायरस के इस दौर में उनके सभी संदेश मध्य वर्ग और रईसों के लिए क्यों हैं? जरा उनके भाषण और 'मन की बात' याद कीजिए। चाहे सलाह दे रहे हों या उपदेश, वह उन्हीं से बात कर रहे हैं। वह समझाते हैं कि हमारी अर्थव्यवस्था को भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। शहरों में रहने वाले शाह साहब या शर्मा जी या अग्रवाल साहब को शेयर बाजार में लुटने के बाद मोदी की बात याद रहेगी। लेकिन अचानक सड़क पर आ गए उस दिहाड़ी मजदूर को इन बातों से क्या? उस मजदूर को क्या, जो भूखों मर रहा है और तब तक पुलिस की लाठी खा रहा है, जब तक वह हजारों मील दूर घर नहीं लौटने लगता?

मोदी के नारे याद करें: ताली, थाली, टॉर्च, लाइट। छज्जे या अहाते में निकलिए। लगता है कि छठे साल में मोदी की सियासत इतनी भ्रमित हो गई है कि उसे 'छज्जे वाले' ही असली भारत लगते हैं। इस भारत में शहरी भारत के नए तानाशाह रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन की ऐंठ को भी सही माना जा रहा है। आखिर भारत में कितने वोटरों के पास छज्जे हैं? कितनों के पास बाकायदा घर हैं? कितनों की छतें टपक नहीं रही हैं? करोड़ों लोग अपने परिवारों से सैकड़ों मील दूर रहते हैं, बिना खिड़की की माचिस जैसी कोठरी में 14-14 लोग।

उसके बाद गृह मंत्रालय का फरमान है कि शाम 7 बजे के बाद कोई घर से नहीं निकले। कितने प्रतिशत भारतीयों के पास ऐसे घर हैं, जहां भीतर और बाहर का फर्क होता है? लोगों के रेले शुरू हुए 45 दिन गुजर चुके हैं और कोई भी बड़ा नाम इन लाखों लोगों से सहानुभूति जताने नहीं आया मानो इन लोगों का वजूद ही नहीं है।

ये लोग अपनी राज्य सरकारों के लिए मुसीबत हैं। अच्छा हुआ कि ये रईस भारतीयों के बड़े शहरों से चले गए। और अगर उनके साथ वायरस गांवों में भी पहुंच गया तो हम क्या कर सकते हैं? उन्हें समझना चाहिए था। राज्य सरकारें पुलिस की मदद से उन्हें अमानवीय क्वारंटीन शिविरों में कुछ अरसे तक रोकेंगी? घर के रास्ते में पैदल भटक रहे लोगों के लिए छह हफ्ते बाद ट्रेन तो चलाई गईं, लेकिन केंद्र ने उनके टिकट का खर्च राज्य सरकारों पर डाल दिया। उसके बाद तू-तू मैं-मैं शुरू हो गई।

गरीबों को रातोरात अमीर नहीं बनाया जा सकता। न ही लाखों लोगों को हवाई जहाज की सवारी कराई जा सकती है। लेकिन दर्द समझना भी कुछ होता है। भाजपा में इस समय उन लाखों लोगों की आवाज कौन बना है? कोई उनका दुख बांट रहा है? सहारा दे रहा है? उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखंड के मुख्यमंत्री ही कुछ कर रहे हैं। उनकी सियासी समझ खत्म नहीं हुई है, वे हकीकत जानते हैं। लेकिन यह मानना मुश्किल है कि मोदी भी जमीनी हकीकत समझ रहे हैं।

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