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अमेरिका में दवा फर्मों को दम

सोहिनी दास / मुंबई 05 08, 2020

सामान्य एंटासिड दवा फैमोटिडिन उस दौरान सुर्खियों में आ गई जब उसे कोरोनावायरस (कोविड-19) के उपचार के लिए संभावित दवा के तौर पर देखा जाने लगा। इसके साथ्थ ही अमेरिकी बाजार में इस दवा की मांग में जबरदस्त वृद्धि दर्ज की गई। कुछ विशेषज्ञ अमेरिकी बाजार में फैमोटिडिन की मांग में वृद्धि को बल्क ड्रग और फॉर्मूलेशन बनाने वाली एलेम्बिक और अरबिंदो फार्मा जैसी भारतीय दवा कंपनियों के लिए अवसर के तौर पर देख रहे हैं।

इस बीच, केंद्र सरकार ने भी अमेरिकी बाजार में इस दवा की मांग पर संज्ञान लिया है। सरकार ने जन औषधि स्टोरों के लिए इस दवा की खरीदारी करने के अलावा अचानक निर्यात मांग बढऩे जैसी हालत से निपटने के लिए इसका भंडारण करने का निर्णय लिया है। हालांकि घरेलू बाजार में फिलहाल इस ओवर द काउंटर (ओटीसी) दवा के लिए मांग में कोई उल्लेखनीय तेजी नहीं आई है।

भारतीय औषधि निर्यात संवद्र्धन परिषद के चेयरमैन दिनेश दुआ ने कहा, 'फैमोटिडिन अगली हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्विन (एचसीक्यू) हो सकती है। यह सस्ती दवा भी है जिसकी प्रति टैबलेट लागत करीब 40 पैसे है। हालांकि अध्ययन के नतीजे अभी तक सामने नहीं आए हैं। इसलिए उसकी प्रभावकारिता के बारे कुछ भी कहना अभी जल्दबाजी होगी।'यह काफी पुरानी एंटासिड दवा है और इसलिए सुरक्षा को लेकर उसका प्रोफाइल पहले से ही स्थापित है।

अमेरिकी औषधि नियामक यूएसएफडीए ने फैमोटिडिन को किल्लत वाली दवाओं की सूची में रखा है। पिछले एक महीने के दौरान अमेरिकी बाजार में इस दवा की कमी दिख रही है। न्यूयॉर्क के नॉर्थवेल हेल्थ के अनुसंधानकर्ता कोविड-19 के संभावित उपचार के लिए रोगियों पर फैमोटिडिन (हाई इंट्रावेनस डोज के इस्तेमाल के साथ) का परीक्षण कर रहे हैं। अस्पताल द्वारा फैमोटिडिन के क्लीनिकल परीक्षण की घोषणा किए जाने के बाद बाजार में इस दवा की किल्लत दिखने लगी। अमेरिका में इस दवा की बिक्री पेप्सिड ब्रांड के तहत की जाती है।

नॉर्थवेल द्वारा इस दवा का परीक्षण अप्रैल के पहले सप्ताह में 1,174 रोगियों पर शुरू किया गया था। इसके नतीजे अगले कुछ सप्ताह में आने की उम्मीद है। द साइंस पत्रिका में छपी रिपोर्ट के अनुसार, नसों के जरिये रोगियों के शरीर में इस को डाला गया। इसकी शुरुआत चीन में हुई थी जहां कुछ डॉक्टरों ने पाया था कि अस्पताल में भर्ती होने वाले जो रोगी पहले से ही इस दवा का सेवन करते थे उनकी स्थिति दूसरों के मुकाबले बेहतर थी। अनुसंधानकर्ता यह देखने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या फैमोटिडिन खुद को खास तरह के उस प्रोटीन से जोड़ती है जो कोरोनावायरस को फैलने से रोकता है।

हालांकि घरेलू बाजार में फैमोटिडिन की मांग में फिलहाल कोई तेजी नहीं दिख रही है। औषधि उद्योग के एक सूत्र ने कहा, 'यह काफी पुरानी दवा है और अब ओमेप्राजोल जैसी सामान्य एंटासिड दवा प्रोटोन पंप इनहिबिटर (पीपीआई) होती हैं। फैमोटिडिन एच2 ब्लॉकर की श्रेणी में आती है जहां रैनिटिडिन जैसी दवाएं मौजूद हैं। इसलिए इसकी मांग अधिक नहीं है। इसकी सालाना बिक्री करीब 40 करोड़ रुपये की है।'

देश भर मेंं करीब 8.5 लाख दवा विक्रेताओं का प्रतिनिधित्व करने वाला संगठन ऑल इंडिया ऑर्गेनाइजेशन ऑफ केमिस्ट्स ऐंड ड्रगिस्ट्स के महासचिव राजीव सिंघल ने कहा कि फिलहाल अधिक लोगों को इस बात की जानकारी नहीं है कि इसका इस्तेमाल कोविड-19 के उपचार में किया जा सकता है। इसलिए घरेलू बाजार में फिलहाल इस दवा की मांग में तेजी नहींं आई है।

भारत में बिकने वाली प्रमुख फैमोटिडिन दवा ब्रांड में सन फार्मा की फैमोसिड, ऐबट की फैमटेक, टॉरंट फार्मास्युटिकल्स की टॉपसिड और इंटास फार्मा की फासिड शामिल हैं। अमेरिकी बाजार को इस दवा का निर्यात करने वाली प्रमुख कंपनियों में एलेम्बिक और अरबिंदो फार्मा शामिल हैं। एलेम्बिक ने कहा कि वह इस दवा के लिए ऐक्टिव फार्मास्युटिकल इनग्रेडिएंट (एपीआई) का उत्पादन भी करती है और जरूरत पडऩे पर बाहर से भी सोर्स कर सकती है। एक सरकारी अधिकारी ने कहा कि भारत पर्याप्त मात्रा में फैमोटिडिन का उत्पादन करती है।


डॉ रेड्डीज के संयंत्र को यूएसएफडीए की मंजूरी

प्रमुख औषधि कंपनी डॉ रेड्डीज लैबोरेटरीज ने स्टॉक एक्सचेंज को आज सूचित किया कि अमेरिकी औषधि नियामक यूएसएफडीए ने श्रीकाकुलम में उसके ऐक्टिव फार्मास्युटिकल इनग्रेडिएंट्स (एपीआई) विनिर्माण संयंत्र को इस्टैबलिशमेंट इन्सपेक्शन रिपोर्ट (ईआईआर) जारी किया है। इसके साथ ही उस संयंत्र का निरीक्षण पूरा हो गया है।

श्रीकाकुलम संयंत्र डॉ रेड्डीज के उन तीन विनिर्माण संयंत्रों में शामिल है जिनके लिए यूएसएफडीए ने नवंबर 2015 में चेतावनी पत्र जारी किया था। अमेरिकी औषधि नियामक ने इन संयंत्रों को निर्धारित परिचालन एवं विनिर्माण गुणवत्ता मानकों का अनुपालन न किए जाने के कारण चेतावनी पत्र जारी किया था। कंपनी के दो अन्य संयंत्रों में आंध्र प्रदेश में दुवडा फॉर्मूलेशन इकाई और तेलंगाना में मिर्यालागुडा एपीआई संयंत्र शामिल हैं। पिछले कुछ वर्षों के दौरान कई दौर के निरीक्षण के ाबद इन दोनों संयंत्रों को यूएसएफडीए से हरी झंडी पहले ही मिल चुकी है।

इसी साल जनवरी में संपन्न अंतिम निरीक्षण के बाद डॉ रेड्डीज के श्रीकाकुलम संयंत्र को यूएसएफडीए ने ईआईआर जारी किया है जिससे करीब पांच वर्षों से अटका चेतावनी पत्र खत्म हो गया है। चेतावनी पत्र के तहत यूएसएफडीए ने आयात पर प्रतिबंध लगाए जाने के अलावा इन तीनों संयंत्रों से उत्पादित किसी भी नई दवा के लिए मंजूरी देने से इनकार किया था।

कोविड-19 के कारण दवा निर्यात लक्ष्य से कम

कोविड-19 की मार से पिछले वित्त वर्ष के दौरान देश के औषधि (फार्मास्युटिकल्स) निर्यात पर असर पड़ा है। बीते वित्त वर्ष 2019-20 में फार्मा निर्यात 20.58 अरब डॉलर रहा, जबकि इसका लक्ष्य 22 अरब डॉलर का रखा गया था। वाणिज्य मंत्रालय के तहत आने वाली औषधि निर्यात संवर्धन परिषद की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि इसके बावजूद बीते वित्त वर्ष में फार्मा निर्यात 2018-19 की तुलना में 7.57 फीसदी अधिक रहा है। परिषद ने कहा कि औषधि निर्यात की दृष्टि से 2019-20 की शुरुआत काफी अच्छी रही। पहली तीन तिमाहियों के दौरान निर्यात कुल मिलाकर 11.5 फीसदी बढ़ा। लेकिन उसके बाद फरवरी में निर्यात की वृद्धि दर घटकर 7.7 फीसदी रह गई और मार्च में इसमें 23.24 फीसदी की गिरावट रही। इससे चौथी तिमाही में निर्यात में 2.97 फीसदी की गिरावट आई। बीएस

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