बिजनेस स्टैंडर्ड - राहत नीति के विकेंद्रीकरण की सख्त जरूरत
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राहत नीति के विकेंद्रीकरण की सख्त जरूरत

प्रणव वर्द्धन /  05 08, 2020

इस विशाल देश में कोरोनावायरस के खिलाफ जारी जंग में अलग इलाकों के लिए अलग नीतिगत कदम भी उठाने होंगे जो संक्रमण प्रसार के रुझान और प्रभावित होने वाले लोगों की आजीविका को ध्यान में रखकर बनाए जाएं। लेकिन अभी तक राहत नीति अत्यधिक केंद्रीकृत रही है। केंद्रीय नेतृत्व ने राज्यों के नेतृत्व से सलाह लिए बगैर देशव्यापी लॉकडाउन का फैसला लिया और वह भी इतनी जल्दबाजी में किया कि लॉकडाउन की वजह से खड़ी होने वाली समस्याओं के लिए तैयारी का मौका ही नहीं मिला। इसका नतीजा यह हुआ है कि करोड़ों गरीब मजदूर मुसीबतों में घिर गए हैं।

इससे भी ज्यादा परेशानी की बात यह है कि लॉकडाउन को सामुदायिक स्तर पर विश्वास के जरिये नहीं बल्कि कड़े पुलिस बंदोबस्त की मदद से लागू किया गया है। इस दौरान फंसे हुए प्रवासी मजदूरों पर सख्ती बरती गई और टॉप-डाउन नियमों में लचीलेपन की कमी भी दिखी है। मसलन, महामारी पर काबू पाने में काफी हद तक सफल रही केरल सरकार की केंद्र ने अपने निर्देशों का अक्षरश: पालन नहीं करने के लिए आलोचना भी की थी। हालांकि 3 मई के बाद राज्यों को फैसले लेने में थोड़ी छूट देने की बात कही गई है लेकिन क्षेत्रीय नीति विविधता के लिए इतना काफी नहीं है।

अगर कोई वायरस संक्रमण के 'हॉटस्पॉट'के देशव्यापी फैलाव पर नजर डाले तो उसमें एक रुझान दिखता है। ये हॉटस्पॉट मुख्यत: शहरी केंद्रों और आर्थिक रूप से सक्षम इलाकों में हैं। बाकी दुनिया से बेहतर संपर्क और शहरी आबादी का घनत्व शायद इसकी वजह है। साफ है कि इन इलाकों में सख्ती से लॉकडाउन लागू करने के साथ ही जांच एवं संदिग्धों की शिनाख्त का काम कुछ समय तक जारी रखना होगा। अधिक आबादी वाले इलाकों खासकर झुग्गी बस्तियों में शारीरिक दूरी के नियमों का पालन करा पाना मुश्किल होगा। उत्तर-मध्य एवं पूर्वी हिस्सों में संक्रमण काफी हद तक कम रहा है। ये ऐसे इलाके हैं जहां गरीब बड़ी संख्या में रहते हैं। ये इलाके मोटे तौर पर जनांकिकी रुझानों एवं प्रजनन दर के नाते जनसंख्या काफी हद तक युवा है। इसका मतलब है कि वायरस की चपेट में आ सकने वाले बुजुर्ग लोगों की संख्या कम है। इसका मतलब है कि इन इलाकों में आर्थिक गतिविधियों वाले हॉटस्पॉट की संख्या अधिक हो सकती है। दरअसल वहां गरीब आबादी के बेरोजगार युवा बड़ी संख्या में रोजी-रोटी की तलाश में होंगे। ऐसे में, गरीबों को आर्थिक राहत देने और अनौपचारिक क्षेत्र में कृषि एवं छोटे उद्यमों की हालत सुधारने पर बुनियादी जोर होना चाहिए।

खरीफ सीजन आने के पहले कृषि उत्पादन के लिए जरूरी सामान खरीदने के लिए नकदी का संकट होने और उद्यमों को ऋण न मिलने की समस्या दूर किए जाने की जरूरत है। बाजार में आ रही रबी की फसल के मार्केटिंग के लिए मौजूदा मंडी खरीद प्रणाली से आगे बढ़कर सभी मार्केटिंग चैनल खोलने की जरूरत है जिसमें सीधे किसान से खरीद भी शामिल है। सड़कों और बाजारों में शारीरिक दूरी के नियमों का ध्यान रखते हुए राज्यों के भीतर और बाहर वस्तुओं की आवाजाही खोल दी जानी चाहिए।

सरकार की तरफ से अभी तक घोषित राहत से आगे बढ़कर नकद सहायता देने का भी इंतजाम करना होगा और पुरुष-महिला और खाताधारक या खाता से वंचित दोनों तरह के लोगों को लाभ दिया जाए। मनरेगा को पूरी तरह लागू करने की जरूरत है और मजदूरी के लंबित भुगतान एवं काम मांगने पर उसे दिलाने जैसी समस्याओं का भी समाधान तलाशना होगा। सार्वजनिक खाद्य वितरण प्रणाली (पीडीएस) के दायरे से अब भी बाहर मौजूद लाखों लोगों के बीच भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के ठसाठस भरे गोदामों से अनाज निकालकर बांटा जाना चाहिए और इसके लिए राशन कार्ड या आधार कार्ड की कोई भी बाध्यता न रखी जाए।

ऐसा होने पर संक्रमण वाले क्षेत्रों में बड़ा बदलाव न होने पर भी उत्तर-मध्य एवं पूर्वी क्षेत्रों की राज्य सरकारें लॉकडाउन को लेकर अधिक आश्वस्त हो सकती हैं जिससे वे आर्थिक मुद्दों पर ध्यान केंद्रित कर पाएंगी। अगर पंचायतें एवं सामुदायिक संगठन साफ-सफाई की अहमियत के बारे में ठीक से संदेश देते रहेंगे तो ग्रामीण इलाकों में शारीरिक दूरी के नियमों का पालन कराना अधिक मुश्किल नहीं है।

स्कूलों को खोल देना चाहिए लेकिन यह काम बेहद सावधानी के साथ करना होगा। हमें यह ध्यान रखना होगा कि बच्चे दिन का अकेला भरपूर भोजन शायद स्कूल में ही करते हैं। किसी भी स्थिति में, उम्र समूह का संयोजन ऐसा है कि बच्चों में इस बीमारी के संक्रमण की आशंका कम है। लॉकडाउन के नियमों में थोड़ी ढील देते हुए स्थानीय प्राथमिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को नियमित रूप से घरों का दौरा कर बुजुर्गों एवं बीमारों पर खास ध्यान देने की नीति अपनाई जाए।

यह साफ है कि अधिक संक्रमण वाले शहरी एवं कस्बाई इलाके, जो बीमारी के हॉटस्पॉट हैं, में तात्कालिक तौर पर आर्थिक राहत देने की नीतियां लागू करने की जरूरत है। इसमें खास ध्यान फंसे हुए प्रवासी मजदूरों, अचानक बेरोजगार हो गए रेहड़ी-खोमचे वालों और स्वरोजगार में लगे अन्य लोगों एवं दिहाड़ी मजदूरों पर होना चाहिए। इन लोगों के लिए सामुदायिक रसोईघरों का नेटवर्क खड़ा करने और उन्हें नकद सहायता एवं बढ़ा हुआ राशन मुहैया कराना सुनिश्चित करने के साथ ही छोटे उद्यमियों के मौजूदा कर्ज तत्काल माफ करने और नए कर्ज देने के इंतजाम किए जाएं। इसके अलावा मनरेगा की तर्ज शहरी इलाकों के लिए भी एक रोजगार गारंटी योजना लाई जाए जिसमें लोक निर्माण एवं दूसरी नागरिक परियोजनाएं समाहित हों। इससे उन लोगों को वैकल्पिक रोजगार मिल सकेगा जो अपने गांव नहीं लौटना चाहते हैं। इसके अलावा सभी बड़े कारखानों के नियोक्ताओं को कामगारों की छंटनी से रोकने वाली अतिसक्रिय नीति अपनाने की जरूरत है। कुछ यूरोपीय देशों की तरह नियोक्ता अपने यहां कार्यरत सभी कामगारों को वेतन सब्सिडी दें। इसके लिए जरूरत होने पर आधार कार्ड सत्यापन का सहारा लिया जा सकता है।

केंद्र सरकार एक आर्थिक राहत पैकेज की घोषणा में अभी तक कंजूसी दिखाती रही है। अभी तक घोषित इकलौते पैकेज का केवल आधा हिस्सा ही नए कार्यक्रमों के लिए है जो सकल घरेलू उत्पाद के 0.5 फीसदी से भी कम है। कई पैमानों पर देखें तो आर्थिक पैकेज करीब इसका दस गुना अधिक होना चाहिए। आसन्न आर्थिक एवं मानवीय त्रासदी के समय राजकोषीय शुद्धता हमारी प्राथमिकता नहीं हो सकती है।

राज्यों को स्वास्थ्य, कृषि एवं सामाजिक सुरक्षा पर व्यय का बड़ा हिस्सा उठाने की जरूरत है, जीएसटी बकाये के भुगतान में तेजी लाने, केंद्रीय कार्यक्रमों में वित्तीय आवंटन के नियम अधिक लचीले बनाने और वित्तीय अंतरण एवं केंद्र-राज्य समन्वय के लिए फौरन एक ढांचा खड़ा करने की जरूरत है। इस संदर्भ में, मैं सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के उस सुझाव का समर्थन करता हूं जिसमें निष्क्रिय पड़ी अंतर-राज्य परिषद की जगह आपातकाल के लिए एक नया ढांचा बनाने की बात कही गई है।

(लेखक कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के ग्रैजुएट स्कूल में प्रोफेसर हैं)

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