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जमीनी हकीकत पर आधारित हो बुनियादी निवेश का अनुमान

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  May 08, 2020

गत सप्ताह नरेंद्र मोदी सरकार ने छह वर्ष की बुनियादी ढांचागत निवेश योजना की घोषणा की। यह योजना 31 दिसंबर, 2019 को जारी अंतरिम रिपोर्ट से अधिक महत्त्वाकांक्षी है। केंद्रीय वित्त मंत्रालय के आर्थिक मामलों के सचिव की अध्यक्षता वाले कार्य बल द्वारा तैयार अंतरिम रिपोर्ट में कहा गया था कि 102 लाख करोड़ रुपये मूल्य की परियोजनाओं वाली नैशनल इन्फ्रास्ट्रक्चर पाइपलाइन का क्रियान्वयन मार्च 2025 तक किया जाएगा। चार महीने बाद वही कार्य बल इन बुनियादी परियोजनाओं का मूल्य 9 फीसदी बढ़ाकर 111 लाख करोड़ रुपये कर देता है।

महत्त्वाकांक्षाओं को पालना और ऊंचे लक्ष्य तय करना योजना और शासन का अहम हिस्सा हैं। परंतु जब योजना बनाने वाले हकीकत से दूर हो जाएं तो ऐसी महत्त्वाकांक्षाएं भी अप्राप्य हो जाती हैं और तय लक्ष्य पूरी व्यवस्था पर बोझ बन जाते हैं। नैशनल इन्फ्रास्ट्रक्चर पाइपलाइन ऐसी ही दिशा को प्राप्त होता दिख रहा है। छह साल में 102 लाख करोड़ रुपये की बुनियादी परियोजनाओं का लक्ष्य अपने आप में महत्त्वाकांक्षी है। परंतु इसे फिर भी समझा जा सकता है क्योंकि दिसंबर 2019 में सरकार कई तिमाहियों की गिरावट के बाद आर्थिक वृद्धि बहाल करने के लिए बेकरार नजर आ रही थी।

बुनियादी निवेश वृद्धि पर कई तरह से असर डालता है। इस पाइपलाइन को देखें तो छह वर्ष के दौरान औसतन 17 लाख करोड़ रुपये का बुनियादी निवेश आर्थिक गति अवश्य प्रदान करेगा। लेकिन ऐसे निवेश का वित्त पोषण करना बड़ी चुनौती है और यदि ऐसा हो जाए तब भी योजना का कुछ औचित्य है।

सवाल यह है कि अप्रैल में इस अंतिम योजना को पेश करने का क्या उद्देश्य था? क्योंकि कोविड-19 ने सारे आर्थिक अनुमानों को ध्वस्त कर दिया था। इकलौता बड़ा अंतर था बुनियादी परियोजनाओं में निवेश को 102 लाख करोड़ रुपये से बढ़ाकर 111 लाख करोड़ रुपये कर देना। कोविड-19 और 40 दिन से लंबे लॉकडाउन ने अर्थव्यवस्था को गहरी क्षति पहुंचाई। ऐेसे में क्या योजनाकारों के पास व्यापक तौर पर बढ़े निवेश के वित्त पोषण के लिए कोई जादुई योजना है? केंद्र और राज्य तथा निजी क्षेत्र को इन बुनियादी परियोजनाओं में निवेश के लिए संसाधन कहां से मिलेंगे?

नैशनल इन्फ्रास्ट्रक्चर पाइपलाइन की रिपोर्ट में कहा गया है कि बीते कुछ वर्षों के दौरान वार्षिक बुनियादी निवेश 8 से 10 लाख करोड़ के बीच रहा है। वर्ष 2017-18 में यह 10.2 लाख करोड़ रुपये था और अगले वर्ष थोड़ा घटकर 10 लाख करोड़ रुपये रह गया। वर्ष 2018-19 में केंद्रीय निवेश में बुनियादी क्षेत्र की हिस्सेदारी 38 फीसदी थी। जबकि राज्यों और निजी क्षेत्र की क्रमश: 37 फीसदी और 25 फीसदी थी।

इसके बावजूद कार्यबल ने केंद्र, राज्यों और निजी क्षेत्र की निवेश राशि को संशोधित किया। इससे कई सवाल पैदा होते हैं। दिसंबर 2019 की अंतरिम रिपोर्ट में ऐसे निवेश में केंद्र और राज्यों की हिस्सेदारी बढ़ाकर 39 प्रतिशत प्रत्येक तय की गई जबकि शेष 22 फीसदी निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी तय की गई। परंतु अप्रैल में इसे बदल दिया गया। अब केंद्र की हिस्सेदारी 39 फीसदी, राज्यों की 40 फीसदी और निजी क्षेत्र की महज 21 फीसदी कर दी गई। कार्य बल को यह भरोसा कहां से मिला कि राज्यों के पास इतना फंड होगा कि वे आने वाले वर्षों में बुनियादी ढांचे में अपना निवेश केंद्र और निजी क्षेत्र से अधिक कर सकेंगे? दरअसल कोविड-19 के बाद राज्यों की आर्थिक स्थिति पर बहुत बुरा असर पड़ा है। इसके बावजूद बुनियादी आवंटन में 9 फीसदी इजाफे के बाद तथा उपरोक्त बदलाव के कारण राज्यों को आने वाले वर्षों में 4.62  लाख करोड़ रुपये तक की राशि अतिरिक्त देनी होगी। तुलनात्मक रूप से केंद्र पर यह बोझ 3.5 लाख करोड़ रुपये और निजी क्षेत्र पर महज 0.86 लाख करोड़ रुपये होगा।

कार्य बल ने जिस तरह आने वाले कुछ वर्षों के बुनियादी निवेश का अनुमान पेश किया है, वह भी पहेलीनुमा है। योजना के अनुसार 2019-20 से शुरुआत के बाद छह वर्ष में औसत सालाना निवेश 18.5 लाख करोड़ रुपये होना चाहिए। इसी तरह 2019-20 में निवेश करीब 14.42 लाख करोड़ रुपये होना था। 2020-21 में इसे बढ़ाकर 21 लाख करोड़ रुपये किया जाना था और 2021-22 में 21.32 लाख करोड़ रुपये।

अगर गहराई से अध्ययन किया जाए तो इन अनुमानों में गंभीर कमी नजर आएगी। वर्ष 2019-20 के लिए 14.42 लाख करोड़ रुपये का लक्ष्य फिर भी लक्ष्य में माना जा सकता है। राज्यों ने कुल 5.7 लाख लाख करोड़ रुपये के पूंजीगत आवंटन की व्यवस्था की जबकि कार्य बल ने इसके लिए 5.77 लाख करोड़ रुपये का लक्ष्य तय किया है। परंतु याद रहे कि कुल पूंजी आवंटन का आधा से भी कम हिस्सा बुनियादी परियोजनाओं में जाता है। केंद्र का बुनियादी निवेश 3.77 लाख करोड़ रुपये अनुमानित था जबकि कार्य बल का अनुमान 5.62 लाख करोड़ रुपये का है। निजी क्षेत्र के निवेश का कोई आधिकारिक अनुमान नहीं है। परंतु कमी का अनुमान लगाएं तो पहले वर्ष में ही यह बहुत ज्यादा हो सकती है। यह सब ऐसे वर्ष के अनुमान हैं जिसे अभी लॉकडाउन से प्रभावित होना था।

अब जरा 2020-21 और 2021-22 के बुनियादी निवेश की परियोजना पर विचार कीजिए। ऐसे में भारी भरकम लक्ष्य तय करने की अव्यावहारिकता सामने आ जाएगी। राज्यों को बुनियादी क्षेत्र में अपना निवेश बढ़ाकर 2020-21 तक 8 लाख करोड़ रुपये करना होगा और केंद्र सरकार को भी इसे 2019-20 में व्यय राशि की तुलना में दोगुना करना होगा। निजी क्षेत्र को भी चालू वर्ष में इसे बढ़ाकर 4.5 लाख करोड़ रुपये से अधिक करना होगा।

ऐसे वर्ष में जबकि भारतीय अर्थव्यवस्था कोविड-19 और लॉकडाउन के असर से बचने की जी तोड़ कोशिश में है, बुनियादी निवेश पर ध्यान हकीकत के करीब होना चाहिए और इसे निजी क्षेत्र तथा राज्यों की ओर से मिली इन सूचनाओं के आधार पर तय किया जाना चाहिए कि वे मौजूदा एवं आने वाले वर्षों में ऐसे आवंटन में क्या योगदान कर पाएंगे।

Keyword: Infrastructure, Investment, Report, Covid-19, बुनियादी ढांचा, निवेश, योजना, लॉकडाउन, अध्ययन, पूंजीगत आवंटन,
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