बिजनेस स्टैंडर्ड - दूर करनी होगी जोखिम से बचने की प्रवृत्ति
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दूर करनी होगी जोखिम से बचने की प्रवृत्ति

आकाश प्रकाश /  May 07, 2020

 

फ्रैंकलिन टेंपलटन द्वारा छह डेट फंड को बंद करना कई स्तरों पर दुर्भाग्यपूर्ण है। इन छह फंड की समेकित प्रबंधन योग्य परिसंपत्ति (एयूएम) 25,000 करोड़ रुपये से अधिक थी। परिसंपत्ति गुणवत्ता और उनकी नकदी की मौजूदा स्थिति को देखते हुए इस बात की संभावना कम है कि फंड का उल्लिखित शुद्ध परिसंपत्ति मूल्य वसूला जा सकेगा। गैर एएए कॉर्पोरेट डेट के लिए सफलतापूर्वक बाजार तैयार करने के बाद फ्रैंकलिन टेंपलटन ने अब भारत में ऋण जोखिम वाले फंडों के ताबूत में आखिरी कील ठोक दी। डर यह है कि अन्य फंड हाउस भी बंद हो सकते हैं। इनमेंं से कई 15 से 25 फीसदी नीचे कारोबार कर रहे हैं।

फंडों के बंद होने से गैर एएए बॉन्ड से बड़े खिलाड़ी को बाहर कर दिया और बॉन्ड बाजार को प्रभावी तरीके से चुनिंदा एएए श्रेणी वालों के लिए सीमित कर दिया। बॉन्ड बाजार का विस्तार नाटकीय अंदाज में बढ़ा और अधिकांश बॉन्ड नकदीकृत हो गए। इसकी जटिलताएं जाहिर हैं।

पहली बात, यह मध्यस्थहीनता को रेखांकित करता है। अब तार्किक ऋण बैंकों से परे सीधे पूंजी बाजार नहीं पहुंचेगा। एएए श्रेणी के चंद संस्थानों को छोड़कर बाकियों के लिए केवल बैंक ही एकमात्र जरिया रह जाएगा। यानी बैंकों के पास मूल्य निर्धारण शक्ति होगी लेकिन हम एक बार फिर संकेंद्रित जोखिम और भारतीय वित्तीय बाजारों की बीते वर्षों की निर्णय प्रक्रिया की ओर लौट जाएंगे।

एक जीवंत कॉर्पोरेट डेट बाजार तैयार करने का विचार इसलिए आया ताकि ऋण के जोखिम और निर्णय क्षमता को विकेंद्रीकृत किया जा सके और जोखिम आधारित कीमत में सुधार कर नवाचार को सक्षम बनाया जा सके। एक बार पुन: बैंक अहम भूमिका में आ जाएंगे। प्रभावी तौर पर वही यह तय करेंगे कि कौन बचेगा और कौन नाकाम हो जाएगा।

गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियां (एनबीएफसी) अब स्थायी तौर पर विफल हो गई हैं। यदि एनबीएफसी ऋण बाजार तक नहीं पहुंच सकतीं और उसे केवल बैंकों पर निर्भर रहना पड़े तो उनका विकास अवरुद्ध होगा। इक्विटी बाजार तक उनकी पहुंच भी फिलहाल कोई विकल्प नहीं है। बैंक अपने दम पर एनबीएफसी की वृद्धि का जरिया नहीं बन सकते। वे उनकी मदद एक सीमा तक ही कर सकते हैं। डेट बाजार तक पहुंच न होने के कारण एनबीएफसी का कारोबार कम होगा। आईएलएफएस संकट के बाद से यह गिरावट नजर भी आने लगी है। आगे इसमेंं इजाफा ही होगा। एनबीएफसी उन कर्जदारों पर ध्यान केंद्रित करती हैं जिन्हें बैंक से ऋण नहीं मिल पाता। उनका कारोबार कम होने का अर्थ यह होगा कि ऋण वितरण में कमी आएगी। खासतौर पर छोटे और मझोले उपक्रमों और अधिक जोखिम वाले कर्जदारों को। इससे अर्थव्यवस्था और कमजोर होगी।

वित्तीय क्षेत्र की सबसे बड़ी समस्या है जोखिम से बचना। बैंकों में नकदी की कोई कमी नहीं है। फिलहाल उनकी 7 लाख करोड़ रुपये की राशि आरबीआई के पास 3.75 फीसदी की रिवर्स रीपो दर पर जमा हैं। ऐसे में बैंक 4.4 फीसदी की दर पर उधारी क्यों लेंगे? जोखिम से बचने की भावना विश्वास के टूटने से उत्पन्न हुई। आईएलएफएस, येस बैंक और डीएचएफएल के मामले के बाद कोई रेटिंग या ऑडिट फर्म पर भरोसा नहीं करता। यहां तक कि एएए की दुनिया में भी एक समूह ऐसा है जो उचित दरों और अवधि के लिए ऋण तक पहुंच बना सकता है। बाजार ने अपनी अलग रैंकिंग बना ली है।

येस बैंक के एटी-1 बॉन्ड और जमा के स्थगन के बाद म्युचुअल फंड और छोटे निजी बैंकों की ओर से सरकारी उपक्रमों और शीर्ष तीन निजी बैंकों की ओर नकदी की बाढ़ आ गई। जाहिर है यह पैसा जोखिम लेने से बचने वालों की ओर से सरकारी बैंकोंं की ओर स्थानांतरित हो रहा है। स्टेट बैंक के अलावा सरकारी बैंकों जोखिम से दूर रहने के ढांचागत कारण हैं। जो ऋण का जोखिम उठाने को तैयार हैं उनके पास नकदी नहीं है जबकि नकदी से भरपूर बैंक जोखिम लेना ही नहीं चाहते।

इस गतिरोध को रोकने का इकलौता तरीका यही है कि ऋण जोखिम लिया जाए। बैंकों को अगर ऋण संबंधी दुष्परिणाम से बचना है तो उन्हें कर्ज देना होगा। आरबीआई को प्रत्यक्ष रूप से या सिडबी, नाबार्ड अथवा एनएचबी के माध्यम से अपत्यक्ष रूप से ऋण बढ़ाने की व्यवस्था करनी होगी या बैंकों द्वारा गैर एएए कर्जदारों को दिए गए कर्ज पर ऋण गारंटी प्रदान करनी होगी फिर वे एसएमई हों, एमएसएमई हों या एनबीएफसी।

केवल तभी नकदी वहां पहुंचेगी जहां उसकी सबसे अधिक आवश्यकता है। कुछ लोग ऋण की इस उपलब्धता का दुरुपयोग कर सकते हैं। परंतु व्यवस्था को आगे चलकर दुरुस्त किया जा सकता है। फिलहाल सबसे अहम है ऋण का प्रवाह सुनिश्चित करना। एक बार फिर, बैंकों को आरबीआई से और नकदी की आवश्यकता नहीं है। अगर उन्हें ऋण जोखिम लेने को नहीं कहा गया तो वे केवल गैर एएए संस्थानों को ऋण देंगे या उनके प्रपत्र खरीदेंगे।

म्युचुअल फंड्स को यह क्षमता प्रदान करनी होगी कि वे व्यवस्थित तरीके से बॉन्ड की बिक्री कर सकें। बैंक इनके स्वाभाविक खरीदार हैं। उनमें यह क्षमता है कि वे इन कॉर्पोरेट बॉन्ड को खरीद सकें, उनके पास नकदी भी है। यह बात स्पष्ट है कि म्युचुअल फंड्स को बचाने की किसी भी योजना में इस बात को समझना और हल करना होगा कि बैंक म्युचुअल फंड्स के खातों में बॉन्ड खरीदने के इच्छुक नहीं हैं। हम इस हकीकत को नकार नहीं सकते कि आज व्यवस्था में ऋण जोखिम से बचने की प्रवृत्ति बहुत ज्यादा है। कॉर्पोरेट बॉन्ड बाजार निष्क्रिय हैं, छोटे निजी बैंक देनदारी के मामले में भारी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। जैसा कि हम जानते हैं कि एनबीएफसी का कारोबारी मॉडल अब कारगर नहीं है। ऐसे स्थानों पर नकदी एकत्रित होती जा रही है जहां जोखिम लेने की कोई मंशा नहीं है।

सॉवरिन समर्थन के बिना अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान होगा। हम पहले ही 18 महीने के ऋण की तंगी के दौर से गुजर चुके हैं और अब अगर बैंकों को उचित कर्जदारों को ऋण देने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया गया तो हालात और खराब होंगे। ऐसा केवल तभी होगा जब ऋण जोखिम बैंकों की बैलेंस शीट से एक संप्रभु संस्था के पास पहुंचेगा। आरबीआई और वित्त मंत्रालय को इस हकीकत को समझते हुए समस्या को दूर करना होगा।

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