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क्या और अधिक विदेशी पूंजी की होगी जरूरत?

अजय शाह /  May 06, 2020

देश में आने वाला पूंजी प्रवाह दरअसल निवेश और बचत के बीच का अंतर है। आने वाले एक-दो वर्ष में निवेश और बचत दोनों में भारी बदलाव आ सकता है। काफी संभावना है कि चालू खाते के घाटे में भारी इजाफा होगा। ऐसे में शेष विश्व और देश की वित्तीय संबद्धता की राह रोकने वाली तमाम नीतिगत बाधाओंं को दूर करना होगा।

चालू खाते के घाटे की बात करें तो यह घरेलू निवेश और घरेलू बचत के बीच के अंतर के रूप मेंं परिलक्षित होता है। यदि हम देश में 35 रुपये का निवेश करते हैं और 30 रुपये की बचत करते हैं तो पांच रुपये के अंतर की भरपाई विदेशी पूंजी से होती है। यानी चालू खाते के घाटे का आकलन उपरोक्त निवेश और बचत के अंतर से होता है। यह कोई सिद्धांत नहीं है बल्कि यह अंकेक्षण समरूपता (अकाउंटिंग आइडेंटिटी) है।

विदेशों से धन प्राप्ति के लिए किसी केंद्रीय योजना या सरकार के किसी कदम की आवश्यकता नहीं होती। पूंजी खाता एक ऐसा राजमार्ग है जिससे देश के लोग बाजार ताकतों पर आधारित विदेशी पूंजी हासिल करते हैं। इससे देश में  विदेशी वित्तीय प्रवाह सुनिश्चित होता है।


अगले एक या दो वर्ष के चालू खाते के घाटे का अनुमान

यह सवाल पूछना दिलचस्प है कि वर्ष 2020 और 2021 में निवेश और बचत तथा चालू खाता घाटे की स्थिति कैसी होगी? आम परिवारों की बचत में कमी आ सकती है क्योंकि तमाम परिवार कठिन समय के लिए पैसे बचाने की जुगत में लग जाएंगे। कॉर्पोरेट आय में कमी आएगी और कारोबारी समूहों की स्थापित आय भी घटेगी।

राजकोषीय घाटे में इजाफा हो सकता है। जब आम परिवारों की आय कम होगी तो आयकर भुगतान मेंं कमी आएगी। जब कंपनियों का राजस्व कम होगा तो वस्तु एवं सेवा कर भुगतान कम होगा। जब कंपनियों का मुनाफा कम होगा तो कॉर्पोरेट कर भुगतान में कमी आएगी। ऐसे में कराधान के तीनों घटकों में तेज गिरावट आएगी। इसके अलावा राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना जैसी सुविचारित सरकारी योजनाएं जिनमें लचीलेपन की क्षमता निहित है, उनका इस्तेमाल ऐसे बुरे समय में बढ़ेगा। ये सारे कारक मिलकर घाटे में काफी इजाफा करेंगे। 

आज देश मेंं कोलाहल है और सरकार से मांग की जा रही है कि वह घाटे को बढऩे दे। हालात को स्थिर करने के लिए कारक पहले ही काम पर हैं और राजकोषीय घाटे में भारी इजाफे का समर्थन किया जा रहा है।

इन सारी बातों को एक साथ रखकर देखें तो यह साफ है कि समग्र बचत में कमी आएगी लेकिन सवाल यह है कि आखिर निवेश का क्या होगा?

पारंपरिक तयशुदा निवेश में कमी आएगी। निजी सकल जमा पूंजी निर्माण अतीत में जीडीपी के 16 फीसदी तक मूल्य हासिल करता रहा है। परंतु महामारी के आगमन के पहले ही यह घटकर जीडीपी का 5 फीसदी हो चुका था। ऐसे में आगे अधिक गिरावट की गुंजाइश नहीं है। कंपनियों में कार्यशील पूंजी की मांग बढ़ेगी क्योंकि आपूर्ति शृंखला की अनिश्चितता से ज्यादा इन्वेंटरी की मांग उठेगी और कंपनियों को परिचालन घाटे की भरपाई करनी होगी। सरकार की बुनियादी निवेश प्रक्रिया मेंं सीमित गिरावट आएगी। इन्हें एक साथ रखकर देखा जाए तो निवेश में गिरावट का स्तर बचत में गिरावट के स्तर से कम रह सकता है।

अगर ऐसा हुआ तो चालू खाते के घाटे में इजाफा होगा। फिलहाल भारत आश्वस्त करने वाली स्थिति में रहा है जहां भारत में निवेश इसलिए होता था क्योंकि यहां चालू खाते का घाटा कम था और बाहरी वित्त की जरूरत भी बहुत अधिक नहीं थी। अब हालात बदल चुके हैं। अब नीति निर्माताओं, वित्तीय फर्म और गैर वित्तीय फर्म सभी को नए तरीके से सोचना होगा।


वृहद नीति पर प्रभाव

सन 1981 और 1991 में भारत संकट में आया और उसे बड़े पैमाने पर विदेशी पूंजी की आवश्यकता पड़ी। इस पूंजी को जुटाने का सही तरीका यह है कि विभिन्न बाजारों, परिसंपत्ति वर्गों, वित्तीय उपायों और वित्तीय फर्म की मदद ली जाए। ऐसी विविधता का फायदा मिलता है। कोई एक चैनल नाकाम होता है लेकिन जब ढेर सारे चैनल हों तो स्थिरता अधिक रहती है। भारत ने पूंजी खाते पर बहुत ठोस अवरोध स्थापित किए हैं। वित्तीय नियमन, कराधान, पूंजी नियंत्रण और प्रवर्तन एजेंसियां आदि ने साथ मिलकर शेष विश्व में भारत के प्रति दुराग्रह उत्पन्न किया है। अब वक्त आ गया है कि इस लाइसेंस/परमिट/छापेमारी के राज में सुधार किया जाए।

निवेश और बचत के बीच के अंतर की भरपाई विदेशी पूंजी से की जाएगी। यह अंकेक्षण से जुड़ी पहचान है जिसे कोई नहीं बदल सकता। जितने ठोस प्रतिबंध होंगे लेनदेन की लागत और जोखिम उतना ही अधिक होगा। विनिमय दर का उतना ही ज्यादा अवमूल्यन होगा ताकि भारतीय परिसंपत्तियों को अधिक आकर्षक बनाया जा सके।


वित्तीय फर्म पर प्रभाव

वित्तीय कंपनियों की बात करें तो वित्तीय बिचौलियों की भूमिका काफी अहम होती है। वे असीमित वैश्विक पूंजी को देश के अंतिम उपभोक्ता से जोड़ती हैं। विभिन्न परिसंपत्तियों की बात करें तो भारत में जहां अच्छा प्रतिफल उपलब्ध हों वहां काफी बड़े अवसर भी होते हैं। परंतु इसके लिए मानव रिश्तों और विदेशों की भारी पूंजी तक सूचना का प्रसार भी आवश्यक होता है। आने वाले दो वर्ष का समय कम जोखिम वाली परिवर्तनीय पूंजी के भारत में निवेश के लिए आदर्श हो सकता है।

सबसे सहज संपर्क वह होता है जहां विदेशों से आने वाली डेट और इक्विटी पूंजी नकदीकृत प्रतिभूति कारोबार वाली शीर्ष 200 फर्म तक पहुंचती है और बदले में ये फर्म वित्तीय बिचौलियों का काम करते हुए इस पूंजी को अपने लाखों आपूर्तिकर्ताओं, वितरकों और खुदरा कारोबारियों तक पहुंचाती हैं। वित्तीय बाजार सुधार इस तादाद को 200 से अधिक कर सकते हैं।

विदेशी पूंजी को देश के अन्य हिस्सों तक पहुंचाने के लिए वित्तीय नवाचार आवश्यक है। वित्तीय-आर्थिक नीति की नाकामी ने देश में वित्तीय-तकनीकी क्रांति को हताश किया है। प्रतिभूतिकरण एक अहम उपाय है जिसकी मदद से देश भर में तमाम नवाचार उत्पन्न होते हैं। इन्हें मुंबई के बॉन्ड बाजार से जोड़ा जा सकता है जहां अनिवासी भारतीय भी भागीदारी कर सकते हैं।


गैर वित्तीय कंपनियों पर प्रभाव

गैर वित्तीय कंपनियों को यह देखना चाहिए कि घरेलू वित्तीय तंत्र में पूंजी की पहुंच सीमित है। उन्हें वित्तीय बिचौलियों के साथ दिए जाने वाले समय और प्रयासों की प्राथमिकता तय करनी चाहिए और अनिवासी निवेशकों में भरोसा बढ़ रहा है। पूंजी का इस्तेमाल करने वालों को लाइसेंस/परमिट/छापेमारी की व्यवस्था से नुकसान पहुंचता है। अधिक जटिल ढांचों की स्थापना करना बेहतर है क्योंकि तार्किक कदम उठाने के लिए वे आवश्यक हैं।

(लेखक नैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनैंस ऐंड पॉलिसी, नई दिल्ली में प्रोफेसर हैं।)

Keyword: Foreign Currency, Reserve, Accounting Identity, Current Account Deficit, विदेशी पूंजी, निवेश, बचत, कॉर्पोरेट आय,
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