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घरेलू विनिर्माताओं ने चिकित्सा उपकरणों में किया तगड़ा निवेश

सोहिनी दास, विनय उमरजी और समरीन अहमद / मुंबई/अहमदाबाद/बेंगलूरु 05 05, 2020

गुजरात में वडोदरा की कंपनी श्योर सेफ्टी भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के लिए अंतरिक्ष पोशाक (स्पेस सूट) बनाया करती थी। कंपनी ने पांच वर्ष पहले 2015 में भारत में पहला स्पेस सूट तैयार करने का तमगा हासिल किया था। हालांकि अब भारत के कोविड-19 संक्रमण की चपेट में आने के बाद कंपनी ने दोबारा इस्तेमाल होने वाला व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (पीपीई) किट तैयार किया है।

श्योर सेफ्टी के प्रबंध निदेशक एवं संस्थापक निशिथ दांड ने कहा कि एक बार इस्तेमाल होने के बाद पीपीई किट पर्यावरण एवं स्वास्थ्य के लिहाज से जोखिम का सबब बन सकते हैं। दांड ने कहा कि उन्होंने 'एयर पास' सिस्टम का इस्तेमाल कर एक नया किट तैयार किया है और वडोदरा के अस्पताल में इसका प्रयोगिक परीक्षण भी शुरू हो चुका है। इस दोबारा इस्तेमाल होने वाले पीपीई के अलाव श्योर सेफ्टी केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय और गुजरात सरकार को 60,000 पीपीई की आपूर्ति कर चुकी है। श्योर सेफ्टी उन गिनी-चुनी कंपनियों में शामिल है, जिसे सरकार ने कोविड-19 से बचाव के लिए पीपीई तैयार करने के लिए चुना है।

कंपनी अब ऐसे किट का मासिक उत्पादन बढ़ाकर 1,80,000 तक करना चाहती है। कंपनी के इस कारनामे की चर्चा भारत के स्थानीय स्वास्थ्य उपकरण विनिर्माण क्षेत्र में जोर-शोर से हो रही है। कोविड-19 संक्रमण से जूझ रहे भारत में कई स्थानीय कंपनियां आगे आई हैं और वे सस्ते वैंटीलेटर से लेकर पीपीई, मास्क, सैनिटाइजर आदि के विनिर्माण में जुट गई हैं।

देश में वैंटीलेटर का निर्यात करने वाली सबसे बड़ी कंपनी स्कैनरे टेक्नोलॉजिज के संस्थापक विश्वप्रसाद अल्वा कहते हैं,'सामान्य दिनों में सरकार निविदा जारी कर स्वास्थ्य उपकरणों का आयात करती है और हम भी निजी क्षेत्र के कारोबारी सौदे और निर्यात के साथ खुश रहते हैं। कोविड-19 संक्रमण के बाद हालात बदल गए हैं और सरकार और निजी कंपनियां एक साथ खड़ी दिखाई दे रही हैं।' बाहर से आयात मुमकिन नहीं रह गया था और भारत सरकार ने निर्यात पर पाबंदी लगा दी थी। अल्वा ने बिजनेस स्टैंडर्ड को बताया,'हम राष्टï्रीय हित को ध्यान में रखकर एक साथ खड़े हैं। सरकार का रवैया खासा पेशेवर रहा है और इसने निर्णय भी तेजी से लिए हैं। सरकार ने संकट की इस घड़ी में आवश्यक स्वास्थ्य उपकरण तैयार करने के लिए सभी सरकारी तंत्र एवं ढांचे का पूरी ताकत से इस्तेमाल कर रही है।'

मध्य मार्च से स्थानीय स्तर पर स्वास्थ्य तकनीक एवं उपकरणों का विनिर्माण अभूतपूर्व गति से हुआ है। मोटे अनुमानों के अनुसार देश की स्वास्थ्य तकनीक कंपनियों एवं उपकरण विनिर्माताओं ने

कोविड-19 से जुड़े रक्षात्मक उपकरणों के विनिर्माण पर ही 1,000 करोड़ रुपये से अधिक निवेश हुआ है। पीपीई बनाने वाली देश की बड़ी कंपनियों में एक मेडिक्लिन हेल्थकेयर ने मार्च से उत्पादन पांच गुना तक बढ़ा दिया है। कंपनी की प्रबंध निदेशक स्मिता शाह कहती हैं,'फरवरी में हम रोजाना 1,000 पीपीई बना रहे थे, लेकिन अब यह आंकड़ा बढ़कर 5,000 तक पहुंच गया है। कार्य तेजी से निपटाने के लिए मैं अपने कर्मचारियों को अतिरिक्त आर्थिक प्रोत्साहन भी दे रही हूं।'

दरअसल स्थानीय स्तर पर विनिर्माण में तेजी स्वत: नहीं आई है। भारत करीब 90 प्रतिशत स्वास्थ्य उपकरणों का आयात करता है, लेकिन यूरोप से आपूर्ति थमने के बाद सरकार को स्थानीय कंपनियों की ओर रुख करना पड़ा।

इस बारे में एक सरकारी अधिकारी ने कहा,'स्वास्थ्य उपकरणों का पर्याप्प्त आयात नहीं हो पा रहा था और इससे आवश्यकता की पूर्ति नहीं हो रही थी। इसे देखते हुए प्रधानमंत्री कार्यालय ने स्थानीय स्तर पर स्वास्थ्य उपकरणों के निर्माण को बढ़ावा देने का निर्देश दिया। फेस मास्क एवं सैनिटाइजर जैसे उत्पादों की भारत में कोई कमी नहीं थी, लेकिन कोविड-19 के बाद इनकी मांग भी कई गुना बढ़ गई।' सरकारी तंत्र के हरकत में आने के बाद देश में 7,000 करोड़ रुपये पीपीई उद्योग खड़ हो चुका है। चीन के बाद इस उद्योग में भारत का ही दबदबा है। अधिकारी ने कहा,'कपड़ा मंत्रालय, औषधि विभाग, स्वास्थ्य मंत्रालय, वाणिज्य मंत्रालय सहित कई अन्य विभागों ने मिलकर काम किया है। उत्पादों की मंजूरी से लेकर इनके परिवहन तक सब कुछ द्रुत गति से हुआ है।' अधिकारी ने कहा कि इससे इतना तो साफ हो ही गया है कि अगर लालफीताशाही दरकिनार कर दिया जा तो उद्योग एवं सरकार साथ काम कर कोई भी लक्ष्य कम से कम समय में प्राप्त कर सकते हैं। औषधि विभाग के सचिव और आवश्यक स्वास्थ्य आपूर्ति के लिए गठित विशेष अधिकार प्राप्त समूह के अध्यक्ष पी डी वाघेला ने पिछले सप्ताह कहा कि मोटे तौर पर भारत इन उत्पादों का आयात करता रहा है। उन्होंने कहा,'हमने कोविड-19 संक्रमण के बीच अपनी तकनीक एवं विनिर्माण क्षमताओं पर जोर देने की रणनीति बनाई है। यह समय संकट का है, लेकिन इसने देश को अवसर भी दिए हैं।'

रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) ने स्थानीय स्तर पर विनिर्माण को बढ़ावा देने में अहम भूमिका निभाई है। पीपीई के लिए नए माल विकसित करने से लेकर संपर्क रहित सैनिटाइजर डिस्पेंसर और वैंटीलेंटर के विनिर्माण में डीआरडीओ ने अमूल्य सहयोग दिया है। मिसाल के तौर पर डीआरडीओ ने हाल में ही नोएडा की एक कंपनी रियॉट लैब के साथ मिलकर ओकमिस्ट नाम की एक मशीन तैयार की है, जो बिना मानव संपर्क के सैनिटाइजर द्रव का छिड़काव करती है।

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