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मुश्किल में राज्य

संपादकीय /  May 05, 2020

देशव्यापी लॉकडाउन की अवधि बढ़ाने और कोविड-19 के मामलों में लगातार इजाफा होने से यही संकेत मिल रहा है कि विभिन्न राज्य और हमारी अर्थव्यवस्था एक बड़ी मुश्किल की ओर बढ़ रहे हैं। आने वाले दिनों में मुश्किलें बहुत अधिक बढ़ सकती हैं क्योंकि कोविड-19 महामारी से सीधी लड़ाई लड़ रहे राज्यों के संसाधन समाप्त हो रहे हैं। इसकी एक वजह यह भी है कि केंद्र सरकार की ओर से होने वाले राजस्व स्थानांतरण में देरी हो रही है।

भारतीय रिजर्व बैंक ने वेज ऐंड मींस एडवांसेस (राज्यों को प्राप्तियों और भुगतान की विसंगति से अस्थायी राहत) की सीमा बढ़ा दी है लेकिन केवल इतना पर्याप्त नहीं होगा। जैसे-जैसे ज्यादा जानकारी सामने आ रही है, निराशाजनक तस्वीर सामने आ रही है। सभी राज्य सरकारों का राजस्व उनके वेतन बिल से कम है। दिल्ली और राजस्थान के राजस्व में अप्रैल माह में पिछले वर्ष की तुलना में 90 फीसदी की गिरावट आई। राज्य सरकारों के राजस्व में गिरावट के लिए लॉकडाउन प्रत्यक्ष तौर पर उत्तरदायी है। वाहनों के न चलने के कारण पेट्रोलियम से आने वाले राजस्व का नुकसान हुआ और शराब की दुकानों के 40 दिन बंद रहने से भी कर की भारी हानि हुई। वाहनों और परिसंपत्ति की बिक्री नहीं होने से पंजीयन शुल्क और स्टांप शुल्क प्रभावित हुआ है। वस्तु एवं सेवा कर के साथ-साथ ये भी राज्य सरकारों के राजस्व का बहुत बड़ा हिस्सा हैं।

हालांकि लॉकडाउन के तीसरे चरण में शराब की दुकानें चुनिंदा जगहों पर खोल दी गई हैं और निजी वाहनों के आवागमन पर प्रतिबंध काफी हद तक हटा लिया गया है लेकिन कोविड-19 से संबंधित अनिश्चितता यही बताती है कि आने वाले महीनों में भी राजस्व पर दबाव बना रहेगा। राज्य सरकारें जिस व्यय की प्रतिबद्धता जता चुकी हैं, उसकी भरपाई करना भी उनके लिए मुश्किल होगा। दिल्ली की बात करें तो चालू वित्त वर्ष में उसके बजट में उल्लिखित व्यय का 74 प्रतिशत हिस्सा राजस्व व्यय है। इसकी कटौती आसान नहीं होगी। इस बीच महाराष्ट्र ने विकास संबंधी व्यय रोकने का निर्णय लिया है जबकि पंजाब पूंजीगत व्यय को टालने पर विचार कर रहा है। अन्य राज्यों की कहानी इससे अलग नहीं है। दिल्ली और आंध्र प्रदेश जैसे कुछ राज्यों ने शराब और पेट्रोल-डीजल पर कर बढ़ा दिया है लेकिन इससे बहुत अधिक मदद मिलती नहीं दिखती।

यकीनन केंद्र सरकार भी राजस्व के मोर्चे पर समस्याओं से दो चार है और उसके लिए भी राज्यों की मदद कर पाना मुश्किल नजर आ रहा है। वित्त आयोग केंद्रीय कर राजस्व में राज्यों की हिस्सेदारी घटाने का इच्छुक है। मौजूदा हालात में ऐसा करना सही नहीं होगा क्योंकि सरकारें पैसे की कमी से बुरी तरह लडख़ड़ा सकती हैं। ऐसे हालात से हर कीमत पर बचा जाना चाहिए।

जरूरत इस बात की है कि केंद्र और राज्यों में राजकोषीय चुनौती को तत्काल हल किया जाए। राजस्व की स्थिति देखते हुए और व्यय की बढ़ती आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए यह लगभग तय है कि केंद्र और राज्य चालू वर्ष में राजकोषीय लक्ष्य हासिल नहीं कर पाएंगे। चूंकि भारत कोविड-19 से लड़ाई के संवेदनशील दौर से गुजर रहा है और कुछ राज्यों को अब बाहर से लौटने वाले श्रमिकों का बोझ भी उठाना है तो ऐसे में वित्तीय चुनौती को हल करना जरूरी है। राज्य स्तर पर फंड की कमी वायरस से निपटने पर भी असर डाल सकती है। इससे आने वाले सप्ताहों में हालत बिगड़ सकती है। नीति निर्माताओं को कई प्रकार के विकल्पों पर विचार करना चाहिए। इसमें वेज ऐंड मींस एडवांस बढ़ाना, बाजार से ऋण लेना या सीधे केंद्रीय बैंक से ऋण लेना शामिल हैं। ये निर्णय आसान नहीं हैं लेकिन ज्यादा लंबा अनिर्णय भी गलत होगा।

Keyword: RBI, Coronavirus, Lockdown Extension, Covid-19, लॉकडाउन, कोरोनावायरस, अर्थव्यवस्था, राजस्व, शराब, राजकोष,
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