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कोविड-19 के सबक से बनानी होगी नई दुनिया

जमीनी हकीकत
सुनीता नारायण /  May 04, 2020

गत 22 अप्रैल को जब पूरी दुनिया ने पृथ्वी दिवस मनाया तब हम प्रकृति के सबसे भयानक प्रतिशोध के दौर से गुजर रहे थे। कोविड-19 महामारी ने दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं को बंद कर रखा है। लेकिन यह भी सच है कि दिल्ली के आसमान में छाई रहने वाली धुंध अब साफ हो चुकी है और यहां की हवा बेहतरीन है। आज नीले आसमान को निहार सकते हैं और पक्षियों को यह बहुत पसंद आ रहा है। पक्षियों के कलरव ने गाडिय़ों के शोर की जगह ले ली है। पूरी दुनिया लॉकडाउन की शरण में जाने को मजबूर हो गई है तब उसके सभी शहरों में प्रकृति अपनी खोई हुई जगह को फिर से हासिल करती नजर आ रही है। पहले भारत की जो नदियां गंदा नाला कही जाती थीं, आज उन्हीं में साफ पानी और जलीय जीव-जंतुओं की भरमार है। ऐसी तस्वीरें भी देखने को मिली हैं कि गुजरात के जूनागढ़ में आसपास के जंगलों से निकलकर शेर बंदरगाह के खुले इलाके में विचरण कर रहे हैं। इसी तरह केरल के एक छोटे कस्बे में गंधबिलाव सड़कों पर टहलते हुए नजर आए। इस समय फ्लेमिंगो की बड़ी तादाद तटीय भारत के खारे पानी की झीलों में लौटने लगे हैं और डॉल्फिन फिर से नदियों में अठखेलियां करती दिख जा रही हैं। ऐसे तमाम उदाहरण दिए जा सकते हैं।

लेकिन एक बात तो साफ है कि प्रकृति का यह जश्न पूरी दुनिया में बहुत बड़ी एवं अस्वीकार्य कीमत पर आया है। इस महामारी की चपेट में आकर लाखों लोग जान गंवा चुके हैं और करोड़ों लोगों की आजीविका चली गई है।

मैं पूरे भरोसे से यह कह सकती हूं कि हम हवा या पानी को इस तरह साफ नहीं करना चाहते हैं लेकिन शिद्दत से इसके घटित होने की भी जरूरत है। हमें कोविड-19 संकट से उबरने के बाद दो बातें याद रखनी चाहिए। पहली, हमें साफ हवा, साफ नदियां और हरी-भरी प्रकृति का जो नजारा देखने को मिला है हमें उसकी कद्र करनी होगी। हमें याद रखना होगा कि हम प्रकृति को इसी रूप में देखना चाहते हैं जिसमें हमारे फेफड़ों में जहरीली हवा न जाए। दूसरी बात इससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण है। हमें याद रखना होगा कि प्रदूषण को मौजूदा स्तर पर रखने का मतलब है कि सारी गतिविधियां रोकने पर ही आसमान को नीला रखा जा सकता है। यानी इस साल सर्दियों के मौसम में जब दिल्ली के आसमान पर धुंध छाने लगेगी तो हमें याद रखना होगा कि इसे हटाने के लिए सारी गाडिय़ों को सड़कों से हटाना होगा और केवल ऑड-इवन से काम नहीं चलेगा। इसका मतलब है कि रोजमर्रा के सारे काम-धंधों को भी बंद करना होगा ताकि किसी भी ट्रक को शहर में आने की जरूरत न पड़े। पिछले अप्रैल महीने में ट्रकों की रोजाना आवाजाही 4,000 से घटकर 400 से भी कम रही। इसका मतलब है कि सारे उद्योगों को भी बंद करना होगा, यहां-वहां कुछ कारखाने बंद करने से काम नहीं चलेगा। हमें सभी तरह के निर्माण कार्य भी रोकने होंगे। इसी तरह हम काले, धुंध भरे आसमान से नीले आसमान और साफ हवा की तरफ जा सकते हैं।

मैं उम्मीद करती हूं कि हमें मानव इतिहास में फिर कभी भी इस तरह लॉकडाउन के अंधेरे दिनों से न गुजरना पड़े। लेकिन अगर हम साफ आसमान चाहते हैं तो हमें स्वर्ग की तरफ बढऩा होगा और धरती पर जरूरी ध्यान दिया जा सके ताकि हम सबके पास आजीविका होने के साथ ही खुलकर सांस लेने का अधिकार भी हो।

अब छिटपुट प्रयासों से काम नहीं चलेगा। हमें इस दिशा में आक्रामक तरीके से कदम बढ़ाना होगा। कोविड-19 के इस भयावह दौर से हमें यही सबक लेना चाहिए, हम नहीं चाहते कि फिर से ऐसी स्थिति दोबारा पैदा हो।

सवाल यह है कि हवा को लॉकडाउन के समय जैसा विशुद्ध रखने के लिए हमें आगे भी क्या करना होगा? हमें यह मानना होगा कि सड़कों से वाहन हटाने हैं, लोग नहीं। इसका मतलब है कि हमें कारें नहीं, बल्कि अधिक संख्या में लोगों को तेजी, सुरक्षा और सुविधा के साथ ले जाने वाले वाहन चाहिए। सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था में व्यक्तिगत स्वच्छता और जन स्वास्थ्य से जुड़ी चिंताओं का भी ध्यान रखना होगा। अगले कुछ साल में ही हम अपनी परिवहन प्रणाली को इस तरह उन्नत करें कि रोज सफर करने वाले 70-80 फीसदी लोग तीव्र गति या कम उत्सर्जन वाले परिवहन साधनों- ट्रेन से लेकर साइकिल तक का इस्तेमाल करें।

दूसरी बात, इसका मतलब सारे उद्योगों को बंद करना नहीं बल्कि उन्हें स्वच्छ ईंधन के इस्तेमाल की तरफ धकेलना है। आज प्राकृतिक गैस की उपलब्धता नहीं बल्कि उसकी कीमत इस बदलाव की तरफ बढऩे में बाधा है क्योंकि गैस का मुकाबला सबसे गंदे एवं सस्ते ईंधन कोयले से है। लेकिन अगर सरकार को वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के दायरे में प्राकृतिक गैस को शामिल करना था (मैं सारे पेट्रोलियम उत्पादों की नहीं केवल प्राकृतिक गैस की बात कर रही हूं) तो इससे कोयले की स्थिति कमजोर होगी। फिलहाल कोयला या दूसरे खराब ईंधन जीएसटी के दायरे में हैं और उन पर स्वच्छ ईंधनों की तुलना में कम कर लगता है। लिहाजा हम ऐसा कर सकते हैं। लेकिन एक बार फिर बड़े समाधान के बारे में सोचने की जरूरत है, कुछ ऐसा जो तीव्र एवं बड़े पैमाने पर हो।

असल बात इस बदलाव की व्यापकता एवं तीव्रता है। महामारी के इस दौर में हमने अव्यवस्था एवं गतिरोध को अकल्पनीय स्तर पर घटित होते देखा है। लिहाजा अब हमें प्रकृति के साथ अपने रिश्ते में आई टूट को सही करने की जरूरत है। यह आने वाले दिनों की सबसे बड़ी चुनौती है। क्या हम कोविड के संदर्भ में चीजें अलग ढंग से करेंगे? या फिर हम अपनी अर्थव्यवस्थाओं को धुएं एवं प्रदूषण के ही सहारे फिर से खड़ा करना चाहेंगे? सच तो यह है कि हमारा भविष्य अब हमारे ही हाथ में है। प्रकृति ने अपनी बात कह दी है और अब हमें उस राह पर चलना चाहिए। धरती पर हल्के कदम ही रखें।

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