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पहल करने का वक्त

संपादकीय /  May 04, 2020

भारतीय विनिर्माण क्षेत्र का पर्चेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (पीएमआई) अप्रैल महीने में अप्रत्याशित रूप से गिर गया। मौसमी समायोजन के बाद यह मार्च के 52 के स्तर से गिरकर अप्रैल में 27.4 रह गया। सूचकांक का संयोजन करने वाली आईएचएस मार्किट के मुताबिक सन 2005 में सर्वे की शुरुआत होने के बाद यह सबसे बड़ी गिरावट है। एजेंसी ने कहा कि अप्रैल में कर्मचारियों की तादाद में भी नाटकीय गिरावट देखने को मिली और यह भी सर्वे की शुरुआत के बाद से अब तक की सबसे बड़ी गिरावट है। तमाम रियायतों की घोषणा की गई। इससे यह संकेत निकलता है कि क्रय शक्ति और अपस्फीतिकारी दबाव में कमी आई है। ऐसा तब हुआ है जबकि कच्चे माल और अन्य सामग्री की आपूर्ति शृंखला में अप्रत्याशित विसंगतियां उत्पन्न हुई हैं। आशंका यही है कि बुधवार को जारी होने वाले सेवा क्षेत्र के पीएमआई में भी गिरावट देखने को मिलेगी। देश के पीएमआई में आई गिरावट, एशिया के अन्य उभरते देशों में आई गिरावट के अनुरूप ही थी। इंडोनेशिया का पीएमआई अप्रैल में 27.5 रहा जो भारत के आसपास ही था। मलेशिया का 31.3 और वियतनाम का 32.7 था।

सवाल यह है कि अप्रत्याशित हालात के बीच सरकार के पास अर्थव्यवस्था के सबसे संवेदनशील हिस्से को बचाने के लिए क्या योजना है? अब तक जो इकलौता पैकेज घोषित किया गया वह काफी पहले सामने आया था और कल्याण योजनाओं के मौजूदा लाभार्थियों के लिए था। भारतीय रिजर्व बैंक ने भी दखल दिया और नकदी की स्थिति सुधारी। परंतु पीएमआई सूचकांक में गिरावट के रुझान से स्पष्ट हो रहा है कि छोटे कारोबार मौजूदा हालात में सबसे अधिक प्रभावित होने वाले हैं। ऐसे में प्रश्न है कि उनका क्या? बीते एक पखवाड़े के दौरान बार-बार ऐसी खबरें सामने आई हैं कि प्रधानमंत्री अन्य नेताओं के अलावा केंद्रीय वित्त मंत्री और गृहमंत्री से अर्थव्यवस्था को दूसरा राहत पैकेज देने के लिए लगातार बैठकें कर रहे हैं लेकिन इस दिशा में कोई घोषणा सुनने को नहीं मिली है।

इस बात को लेकर काफी आशाएं थीं कि अगला राहत पैकेज छोटे कारोबारियों के बचाव के लिए पेश किया जाएगा ताकि उन्हें इस महामारी के झटके से बचाया जा सके। इसके बावजूद अब तक कोई पैकेज सामने नहीं आया है। क्या किन्हीं सुधारात्मक उपायों पर चर्चा की गई है? इस बारे में भी कोई बात सामने नहीं आई है।

ऐसी योजनाओं की घोषणा में देरी समझ से परे है। खासकर तब जबकि हमें पता है कि ये घोषणाएं कैसी होंगी। सरकार की ओर से छोटे कारोबारों के वेतन भत्तों और ऋण को समर्थन दिया जाएगा ताकि नियोक्ता पूरा वेतन दें और बैंक आसानी से ऋण मुहैया कराएं। यह सब इसलिए ताकि आर्थिक गतिविधियां नए सिरे से शुरू हो सकें। लोगों को अधिक से अधिक नकदी मुहैया कराना एक और बड़ा कदम है। ऐसा करने से कम से कम बुनियादी चीजों की मांग में सुधार होगा। ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना में नई जान फूंकनी होगी ताकि इस कठिन समय में यह कारगर बनी रहे। जहां तक सुधारों की बात है, पूरा ध्यान रोजगार पर लगाना होगा। संगठित खुदरा कारोबार और ई-कॉमर्स के खिलाफ पूर्वग्रह खत्म करना होगा क्योंकि इससे आपूर्ति क्षेत्र तैयार होता है और स्थानीय विनिर्माण को बढ़ावा मिलता है। श्रम बाजार संगठित और असंगठित क्षेत्र में बंटा हुआ है। कानूनों में बदलाव के जरिये इसका एकीकरण करना होगा। ऐसा करने से बड़े नियोक्ता भी बड़ी तादाद में अस्थायी और अनुबंधित कर्मचारियों को काम पर रखने के लिए प्रोत्साहित होंगे। रोजगार अनुपात में तीव्र गिरावट की स्थिति को पलटना होगा। इन लक्ष्यों को हासिल करने केे तरीके सबको पता हैं। अब इनके क्रियान्वयन का वक्त है।

Keyword: PMI, Manufacturing Sector, IHS Markit, Jobs, विनिर्माण पीएमआई, लॉकडाउन, सूचकांक, सर्वे, सेवा क्षेत्र, वेतन,
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