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मांग की कमी से गिरेंगे खाद्य तेल के दाम

दिलीप कुमार झा / मुंबई May 04, 2020

वैश्विक स्तर पर कारखाने, होटल और रेस्तरां बंद होने के बाद सभी प्रमुख उपभोक्ता क्षेत्रों में खाद्य तेलों की मांग घट गई है, जिससे अगले कुछ महीनों में इनके दाम बहुत नीचे जा सकते हैं। इसकी एक और वजह कच्चे तेल की कीमतों में तेज गिरावट है, जिससे बायोडीजल खपत के लिए पाम तेल की मांग को भी झटका लगा है।

इस कैलेंडर वर्ष में अब तक कच्चे पाम तेल के वायदा भाव (जनवरी से अप्रैल तक की डिलिवरी) में 28 प्रतिशत तक की गिरावट आई है जो बेंचमार्क बर्सा मलेशिया पर फिलहाल 2,088 रिंगिट के स्तर पर चल रहा है, जबकि 1 जनवरी को यह भाव 2,897 रिंगिट था। गोदरेज इंटरनैशनल के निदेशक दोराब मिस्त्री ने एक ऑनलाइन सम्मेलन में कहा है कि दुनिया चिकित्सा के आपातकाल से गुजर रही है जिसमें उपभोग प्रभावित होता है। इसके परिणामस्वरूप बायोडीजल और खाद्य तेल दोनों ही क्षेत्रों की ओर से खाद्य तेल की मांग 30 प्रतिशत तक खत्म हो चुकी है। जलवायु की अनुकूल स्थिति अमेरिका के किसानों को मक्के से सोयाबीन की खेती में वापस ला रही है।

इसी तरह का परिदृश्य दुनिया के अन्य हिस्सों में है जिसके परिणामस्वरूप वनस्पति तेल का अधिक उत्पादन हो रहा है। पाम तेल के दामों का परिदृश्य अनुकूल नहीं है। यह अपनी उत्पादन लागत के निकट भारी मंदी के दौर की ओर बढ़ रहा है। इसके दाम अक्टूबर 2019 में बढऩे शुरू हुए थे और जनवरी मध्य में यह दाम वृद्धि रुक गई थी। इसका मुख्य कारण अमेरिका में सोयाबीन की खेती का रुख मक्के की ओर होने, यूरोप में सूखा पडऩे और इंडोनेशिया सरकार द्वारा बायोडीजल की अनिवार्यता का कड़ाई से पालन करना था। अमेरिका और चीन के बीच व्यापार युद्ध के मद्देनजर चीन की मजबूत मांग से भी इस मजबूत आशावादी धारणा को समर्थन मिला था।

चीन ने अमेरिका को असहाय छोड़ते हुए अर्जेन्टीना, ब्राजील और अन्य उपलब्ध स्रोतों से सोयाबीन का आयात करना शुरू कर दिया। तभी फरवरी में नए साल की छुट्टियों से पहले चीनी व्यापारियों ने अपना स्टॉक बेचना शुरू कर दिया। इस कारण 14 जनवरी के बाद एक सप्ताह में ही कच्चे पाम तेल की कीमतों में 10 प्रतिशत तक की गिरावट आ गई।

मिस्त्री ने कहा कि यूरोप, ऑस्ट्रेलिया और अन्य देशों में पर्याप्त बारिश होने के कारण पाम की बुआई के लिए आनुवंशिक रूप से संशोधित बीज के उपयोग से अच्छा उत्पादन होता है। मांग में कमी की वजह से इस कैलेंडर वर्ष की दूसरी छमाही में दामों में सुधार दूर की बात ही लगती है।

पिछले साल (नवंबर 2019 से अक्टूबर 2020 के दौरान) भारत ने कुल 1.55 करोड़ टन वनस्पति तेलों में से लगभग 95 लाख टन कच्चे पाम का आयात किया था। लेकिन देशव्यापी लॉकडाउन के परिणामस्वरूप परिवहन और कारखाने पूरी तरह से बंद हो गए जिससे जनवरी से मार्च 2020 की अवधि में वनस्पति तेल के आयात में तीव्र गिरावट आई।

सनविन ग्रुप के मुख्य कार्याधिकारी संदीप बाजोरिया ने कहा कि देशव्यापी लॉकडाउन के दौरान उद्योग ने खाद्य तेल की आपूर्ति को व्यवस्थित बनाए रखा जो सस्ती दामों पर निर्बाध रूप से जारी रही। लेकिन होटल, रेस्तरां आदि बंद होने के कारण पिछले तीन महीनों के दौरान वनस्पति तेल की मासिक मांग औसतन 20 लाख टन से 30 प्रतिशत तक गिरकर 14 लाख टन रह गई। हमें लग रहा है कि देश में कच्चे पाम तेल का आयात इस साल करीब 20 लाख टन तक घटकर 75 लाख टन ही रह जाएगा। देश में पहले हर महीने औसतन 7.5 लाख से 8 लाख टन पाम तेल आयात होता था, जो कोरोना संकट के बाद घटकर 3.5 लाख से 4 लाख टन ही रह गया है।

फॉच्र्यून ब्रांड के तहत खाद्य तेल विनिर्माण करने वाली अदाणी विल्मर के मुख्य कार्याधिकारी अंशु मलिक का मानना है कि पूरी दुनिया में फैल चुकी कोविड-19 महामारी ने देश भर में ब्रांडेड तेल की खपत को नुकसान पहुंचाया है। ऐसा इसलिए है क्योंकि उपभोक्ताओं ने अपने पसंदीदा ब्रांडों का इंतजार करने के बजाय दुकानों में उपलब्ध पैक चुन लिए।

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