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कोरोना के बाद लैंगिक समानता में पिछड़ जाएंगी महिलाएं

जिंदगीनामा
कनिका दत्ता /  05 03, 2020

जैसा कि माना जा रहा था कोविड-19 के कारण लागू देशव्यापी लॉकडाउन ने बेरोजगारोंं की तादाद में भारी इजाफा किया है, सीएमआईई डेटाबेस के मुताबिक बेरोजगारी दर बढ़कर 21.1 फीसदी पहुंच गई है। कोविड-19 के आगमन के पहले भी रोजगार की हालत बहुत अच्छी नहीं थी लेकिन अब हालात और बुरे हो गए हैं। चरणबद्ध ढंग से आर्थिक गतिविधियां शुरू करने की अनुमति के साथ इस अस्वाभाविक रूप से ऊंची बेरोजगारी दर में कमी आएगी लेकिन इतना कहा जा सकता है कि एक बार जब कोविड-19 का टीका बन जाएगा और सामाजिक दूरी जैसे नियमों का पालन करना जरूरी नहीं रह जाएगा बेरोजगारी एक बार फिर हमारी सबसे बड़ी समस्या बन जाएगी। इससे संबंधित एक और समस्या है जिस पर किसी का ध्यान नहीं है, वह यह कि कोविड-19 के कारण आई मंदी के बाद महिला-पुरुष या लैंगिक समानता पर बहुत बुरा असर होगा।

भारत लैंगिक समानता के मामले में कभी भी वैश्विक रैंकिंग में अग्रणी देशों में शामिल नहीं रहा लेकिन सन 2006 में विश्व आर्थिक मंच द्वारा वैश्विक लैंगिक अंतराल सूचकांक की शुरुआत के बाद से भारत की स्थिति लगातार कमजोर हुई है। दिसंबर 2019 में आई ताजा रिपोर्ट के मुताबिक भारत 153 देशों की सूची में चार स्थान फिसलकर 112वें स्थान पर पहुंच गया जबकि 2006 की रैंकिंग से यह 14 स्थान नीचे चला गया था।

यह सूचकांक जिन चार मानकों पर आधारित है वे हैं- स्वास्थ्य, शिक्षा, अर्थव्यवस्था और राजनीति। इनमें से पहले तीन मेंं भारत का प्रदर्शन कमजोर हुआ है। यह कमजोर प्रदर्शन भारतीय सामाजिक परिदृश्य पर नजर रखने वालों के लिए कोई बड़ा खुलासा नहीं है। परंतु चिंतित करने वाली बात यह है कि भारत महिलाओं को मिलने वाले आर्थिक अवसरों के मामलों में पाकिस्तान, यमन, सीरिया और इराक जैसे देशों के साथ निचले पांच देशों में शामिल है।

आर्थिक अवसरों तक कमजोर पहुंच को इस बात से समझा जा सकता है कि देश की श्रम शक्ति मेंं महिलाओं की हिस्सेदारी लगातार घट रही है। सन 2011-12 में यह अनुपात 33.1 फीसदी था जो कि अपने आप में बेहद कम था। लेकिन 2017-18 तक 7.8 फीसदी और घटकर 25.3 फीसदी रह गया। यह गिरावट पुरुषों की हिस्सेदारी मेंं आई गिरावट से दोगुना अधिक है। चूंकि यह गिरावट बेरोजगारी दर के 45 वर्ष के उच्चतम स्तर पर पहुंचने के साथ और नोटबंदी तथा जीएसटी के खराब क्रियान्वयन के कुछ समय बाद आई थी इसलिए यह कहना उचित होगा कि भारतीय महिलाओं को मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों का खमियाजा उठाना पड़ा।

अब कोविड-19 के बाद आने वाली मंदी में महिलाएं और बड़ी शिकार बनकर उभरेंगी। फिलहाल किसी तरह के रुझान का पता लगाना मुश्किल है क्योंकि नौकरी जाने पर महिलाएं आसानी से पारिवारिक जीवन में खप जाती हैं। सीएमआईई के महेश व्यास कहते हैं कि शायद यह भी एक वजह है कि इन महिलाओं की बेरोजगारी के खिलाफ कोई सार्वजनिक विरोध प्रदर्शन नहीं होता है। अगर देश के गरीबों और निम्र मध्य वर्ग की सामाजिक रूढि़वादिता को ध्यान में रखें तो कह सकते हैं कि देश में लैंगिक अंतर कम होना दूर की कौड़ी है। जब आर्थिक विस्तार ने महिलाओं के लिए अवसर तैयार किए थे तो यह रुख कमजोर पड़ा था। महिलाओं द्वारा अर्जित अतिरिक्त आय की सराहना की गई।

बहुत संभव है कि लॉकडाउन हटाए जाने के बाद इस रुख में बदलाव आए। सबसे पहले रोजगार के वे अवसर तैयार होंगे जो पारंपरिक रूप से पुरुषों के दबदबे वाले रहे हैं। मिसाल के तौर पर विनिर्माण श्रमिकों का काम, भवन निर्माण और फैक्टरियों का काम। हम जानते हैं कि महिलाएं ये सारे काम करने में सक्षम हैं लेकिन नियोक्ता उनके साथ भेदभाव करते हैं। यही वजह है कि इंजीनियरिंग कंपनियों में पुरुष ज्यादा नजर आते हैं और इलेक्ट्रॉनिक्स और गारमेंट कारोबार में महिलाएं। आज तक यह बात स्पष्ट नहीं हुई कि बाकी दुनिया के उलट भारत मेंं महिलाओं को कार निर्माण और रक्षा उत्पादन उद्योगों में काम क्यों नहीं मिलता।

देश की फैक्टरियों की श्रम शक्ति में महिलाओं की कमी जैसे सबूत सेवा क्षेत्र में उस कदर नहीं नजर आते। परंतु वित्तीय क्षेत्र से लेकर लेखा तक और स्वागत से लेकर सूचना प्रौद्योगिकी तक इनमें गिरावट आई है। देश का विनिर्माण क्षेत्र बीते कुछ वर्षों से ठहरा हुआ है लेकिन सेवा क्षेत्र में नियमित रूप से वृद्धि देखने को मिल रही है। इस वृद्धि के कारण नियोक्ताओं ने लैंगिक भेदभाव को कम किया है जिसे शायद वे पहले दबे छिपे ढंग से पालपोस रहे थे। विमान चालक से लेकर वाइन परोसने तक और वॉलेट पार्किंग सेवा से लेकर खेलों में कमेंटेटर और डिलिवरी करने वालों तक भारतीय महिलाओं ने गैर पारंपरिक पेशों में जगह बनानी शुरू कर दी है।

अब इन क्षेत्रों में भी वृद्धि दर धीमी पड़ सकती है। विवेकाधीन सेवाओं मसलन होटल, पब, जिम मॉल और ब्यूटी पॉलर तथा विमानन कंपनियों तक में महिला कर्मचारियों की तादाद अपेक्षाकृत ज्यादा रही है लेकिन वहां भी भविष्य के हालात बहुत बेहतर नहीं दिखते। उन्हें लॉकडाउन का असर शेष अर्थव्यवस्था की तुलना में लंबे समय तक झेलना पड़ सकता है। जब ये सेवाएं दोबारा शुरू होंगी तब भी संक्रमण का खतरा लोगों को इनसे दूर रखेगा।

भारतीय अर्थव्यवस्था में गहरे तक बैठे पूर्वग्रह को देखते हुए यह अनुमान लगाना संभव है कि विनिर्माण, निर्माण तथा सेवा क्षेत्रों में रोजगार के अवसर कम होने पर लैंगिक पूर्वग्रह नए सिरे से सर उठा सकती हैं। जाहिर है अगले वर्ष भी लैंगिक अंतराल सूचकांक कोई सकारात्मक नतीजे नहीं देने वाला।

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