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अस्पष्ट राह

संपादकीय /  May 03, 2020

देशव्यापी लॉकडाउन में दो सप्ताह का इजाफा करने का केंद्र सरकार का निर्णय बेहद खराब है। इस निर्णय ने उन लाखों उपक्रमों के भविष्य को अधर में डाल दिया है जो देश में रोजगार का बड़ा जरिया हैं। इतना ही नहीं, ज्यादा बुरी बात यह है कि वाणिज्यिक गतिविधियों को चुनिंदा ढंग से खोलने का आर्थिक गतिविधियों को नए सिरे से शुरू करने पर कोई सकारात्मक असर पड़ता नहीं दिखता। लॉकडाउन लगाने का उद्देश्य था कोविड-19 के प्रसार को धीमा करना। हमें उसमें कामयाबी मिली और यह स्पष्ट नहीं है कि एक और विस्तार से देश को क्या हासिल होगा। जिलों को रंग के आधार पर बांटने की जगह अगर उन इलाकों में रोकथाम और ट्रैकिंग पर ध्यान दिया जाता जहां ज्यादा मामले सामने आ रहे हैं तो शायद हम हालात से बेहतर ढंग से निपट सकते थे। आवागमन को धीमा करने से कोविड-19 का प्रसार जरूर कमजोर पड़ा लेकिन आजीविका पर हो रहे असर को देखते हुए कहा जा सकता है कि यह उपयुक्त हल नहीं है।

लॉकडाउन से संबंधित संशोधित दिशानिर्देश अस्पष्ट हैं और वे जमीनी हकीकत को हल नहीं करते। एक जोन में उत्पादन शुरू करने का लाभ नहीं होगा क्योंकि आपूर्ति में समस्या बरकरार रहेगी। अगर कच्चा माल रेड जोन से आता हो तो ग्रीन जोन में उद्यमों को खोलने का कोई लाभ नहीं होगा। रेड जोन में आने वाले जिले ऐसे हैं जहां आर्थिक गतिविधियां अपेक्षाकृत ज्यादा होती हैं। हाल के दिनों में उद्योग जगत ने आपदा प्रबंधन अधिनियम के प्रावधानों को लेकर भी चिंता जताई है क्योंकि ये शोषण का जरिया भी बन सकते हैं। ऐसे में यह समझदारी की बात है कि केंद्र सरकार राज्य सरकारों से यही अपेक्षा करे कि वे उसके दिशानिर्देशों का वास्तविक समझ के साथ पालन करें। चाहे जो भी हो, जिला प्रशासन को दिशानिर्देशों को लागू करना होगा और जैसा कि पुराने अनुभव ने दिखाया है इनकी मनमानी व्याख्या की जा सकती है क्योंकि ये दिशानिर्देश अपने आप में काफी अस्पष्ट हैं। उदाहरण के लिए रेड जोन में आपके पास-पड़ोस की दुकानों पर जहां गैर जरूरी चीजें भी बिक सकेंगी, वहीं ई-कॉमर्स कंपनियों को ऐसा करने की इजाजत नहीं होगी। ऐसे वक्त में भी नीतिगत ध्यान ई-कॉमर्स को रोकने और आम किराना व्यापारियों को लाभान्वित करने पर केंद्रित है। यह अच्छा संकेत नहीं है और ऐसे वक्त में निवेश को प्रभावित करेगा जब देश को आर्थिक गतिविधियां सुधारने के लिए ढेर सारी पूंजी की आवश्यकता है।

यह भी स्पष्ट नहीं है कि सरकार कंपनियों और सरकार के स्तर पर वित्तीय संकट से कैसे निपटेगी। राजस्व समाप्त होने से कई कंपनियां बच नहीं पाएंगी। हालांकि रिजर्व बैंक ने दरों में कटौती की है और नकदी की स्थिति सुधारी है लेकिन नकदी वहां नहीं पहुंच रही है जहां उसे पहुंचना चाहिए। गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियां जो छोटे और मझोले उपक्रमों का वित्त पोषण करती हैं, वे खुद दिक्कत में हैं और उन्हें नीतिगत मदद चाहिए। ऐसे में सरकार उनका जोखिम साझा कर सकती है इससे बैंक ऋण देने को प्रोत्साहित होंगे। सरकार को कारोबार बचाने होंगे। खासकर स्वागत उद्योग में जो लंबे समय तक दबाव में रहने वाला है। इसके अलावा राज्य सरकारें भी दबाव में हैं और उन्हें भी व्यय में कटौती करनी होगी। इससे न केवल वायरस की रोकथाम प्रभावित होगी बल्कि आर्थिक सुधार पर भी असर होगा।

सरकार ने वायरस को रोकने के लिए अन्य देशों की तुलना में कड़े कदम उठाए हैं लेकिन आर्थिक मोर्चे पर उठ रहे प्रश्नों को उसने अनुत्तरित ही छोड़ दिया है। इससे अनिश्चितता बढ़ी है और नुकसान ही होगा। यदि सरकार आर्थिक पहलू को भी ध्यान में रखती तो महामारी को लेकर उसकी प्रतिक्रिया ज्यादा बेहतर मानी जाती।

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