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लॉकडाउन से निकासी के बहाने राजनीति की वापसी

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  May 02, 2020

मार्च से शुरू लॉकडाउन को लेकर एक अफसरशाह दोस्त ने भविष्यवाणी करते हुए कहा था, 'लॉबी और निहित स्वार्थ वाले लोगों के अपने खोल से बाहर आने का इंतजार करो। राजनीति तो उस समय शुरू होगी।' जहां लॉकडाउन की स्थिति से बचा नहीं जा सकता है, वहीं इसे हटाने के समय और उसके तरीकों से जुड़ा फैसला विशुद्ध राजनीतिक है। शायद यही वजह है कि अनुभवी नेता भी बेचैन नजर आ रहे हैं और अपने तात्कालिक भावी कदमों को लेकर अपना मन बदल रहे हैं। उत्तर प्रदेश सरकार का प्रवासी मजदूरों को अपने यहां बुलाने के मसले पर फैसला बदलना इसकी एक बानगी है। इसी तरह लॉकडाउन से निकासी के अनुक्रम (छत्तीसगढ़ और तेलंगाना ने केंद्र से एक योजना रखने की मांग की है) और यह दौर खत्म होने के बाद अवश्यंभावी नजर आने वाली आर्थिक पीड़ा के लिए अपने मतदाताओं को तैयार करने का मसला भी नेताओं को बेचैन कर रहा है। केरल तो अभी चेतावनी दे रहा है कि वह दिवालिया हो चुका है जिसका मतलब है कि वह राज्य सरकार के अफसरों के वेतन में भारी कटौती कर सकता है।

अगर राजनीति ही भारत में कोविड-19 महामारी के प्रबंधन की बागडोर संभालने वाली है तो फिर इसके पड़ोस में भी ऐसा ही है। संविधानवाद के जरिये राजनीति करना श्रीलंका में सार्वजनिक जीवन की एक पहचान रही है और कोविड संकट एक संवैधानिक संकट के दरम्यान ही आ खड़ा हुआ है। पिछले छह महीनों में इस द्वीपीय देश की राजनीति पर नजर नहीं डाल पाए लोगों के लिए एक त्वरित तस्वीर पेश है: गोटभाया राजपक्षे नवंबर 2019 में श्रीलंका के राष्टï्रपति चुने गए। उन्हें विरासत में ऐसी संसद मिली जिस पर विपक्ष का दबदबा था लेकिन राष्टï्रपति ने अपने भाई महिंदा राजपक्षे को नए चुनाव होने तक प्रधानमंत्री नियुक्त कर दिया। वैधानिक तौर पर मौजूदा संसद का कार्यकाल खत्म होने की समयसीमा खत्म होने के छह महीने पहले यानी जल्द से जल्द 2 मार्च को ये चुनाव कराए जा सकते थे। बहरहाल श्रीलंका में 25 अप्रैल को संसदीय चुनाव कराने की घोषणा की गई जिसके लिए 19 मार्च तक नामांकन दाखिल किए जा सकते थे। नई संसद की पहली बैठक 14 मई को बुलाई जानी थी। यह सब कुछ उस संवैधानिक बाध्यता के अनुरूप ही था कि संसद भंग किए जाने के तीन महीने के भीतर नई संसद आहूत करनी होती है। पिछली संसद के 2 मार्च को भंग किए जाने का मतलब था कि 2 जून के पहले नई संसद का अधिवेशन हो जाना चाहिए।

लेकिन इसी दौरान कोविड-19 ने दस्तक दे दी। पहले तो राष्टï्रपति ने कहा कि चुनाव पूर्व-निर्धारित कार्यक्रम के मुताबिक ही होंगे। लेकिन चुनाव आयोग और खुद राष्टï्रपति को भी यह अहसास हो गया कि स्वास्थ्य संकट के दौरान चुनाव अभियान की अनिवार्य अवधि का निर्वहन कर पाना और मतदान करा पाना संभव नहीं है। ऐसे में तमाम विचार-विमर्श के बाद मतदान की नई तारीख 20 जून घोषित कर दी गई।

यहीं पर पेच है। नई तारीख के ऐलान से 2 जून तक नई संसद के गठन की संवैधानिक बाध्यता का उल्लंघन तो हो ही रहा है। आखिर चुनाव ही 20 जून को कराए जाएंगे। इसके साथ ही चुनाव आयोग ने यह भी कहा है कि अगर सार्वजनिक स्वास्थ्य की स्थिति स्थिर नहीं होती है तो वह चुनाव को इसके आगे भी खिसका सकता है। ऐसी स्थिति में श्रीलंका के संविधान विशेषज्ञ यह दलील दे रहे हैं कि संसद को भंग करने वाला आदेश गैरकानूनी है लिहाजा देश में संसद की मौजूदगी जरूरी होने से पुरानी संसद को ही बहाल कर दिया जाए।

इस बीच भंग संसद के स्पीकर कारु जयसूर्या ने कहा है कि कोविड संकट के समय श्रीलंका दुनिया का अकेला देश है जहां पर कोई संसद नहीं है। इससे भी बुरी बात यह है कि संसदीय चुनाव के लिए प्रचार अभियान उस समय चलेंगे जब श्रीलंका के कई हिस्सों में कफ्र्यू और पाबंदी लागू है। ऐसे में इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि राष्टï्रपति सारी शक्तियां आत्मसात करने की घोषणा कर दें और यह कहें कि लोकतंत्र को बचाने का यही एक तरीका रह गया था। ऐसा हो भी सकता है।

नेपाल में हालात थोड़े अलग हैं। प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली का हाल ही में दूसरी बार गुर्दा प्रत्यारोपण हुआ है, लिहाजा वह ऐसी हालत में नहीं हैं कि कोविड संकट से निपटने के प्रयासों की निगरानी कर सकें। वैसे नेपाल में अब तक इस महामारी से कोई मौत नहीं हुई है और पॉजिटिव मामलों की संख्या भी 60 से कम है। लेकिन कुछ पार्टी नेताओं समेत कई लोगों का मानना है कि ऐसे समय में ओली को आराम की जरूरत है। इन लोगों में पार्टी अध्यक्ष पुष्प कमल दहल प्रचंड भी शामिल हैं। ओली ने कोविड निगरानी के लिए उप प्रधानमंत्री एवं रक्षा मंत्री ईश्वर पोखरेल की अध्यक्षता में एक समिति गठित की है। लेकिन समिति के सदस्यों के आपसी झगड़े अखबारों में जगह पा रहे हैं।

श्रीलंका और नेपाल दोनों को कोविड संकट के बाद अपनी अर्थव्यवस्थाओं के पुनर्गठन का बेहद मुश्किल काम करना होगा। दोनों ही देश पर्यटकों पर आश्रित हैं। दोनों ही देश विदेशों में रह रहे अपने नागरिकों की तरफ से स्वदेश भेजी जाने वाली रकम पर काफी निर्भर हैं। नेपाल के जीडीपी में यह अंशदान 30 फीसदी है तो श्रीलंका में यह 8.25 फीसदी है। ओली सरकार पर भारी दबाव है कि विदेश से आने वाली उड़ानों को अनुमति दी जाए। लेकिन ओली कह चुके हैं कि इस संकट में अर्थव्यवस्था दूसरे स्थान पर है, पहली प्राथमिकता तो लोगों की जान बचानी है।

भारत जब लॉकडाउन हटाने के तौरतरीकों पर गौर कर रहा है और उस पर राजनीति शुरू हो चुकी है तब श्रीलंका एवं नेपाल अपने ही राजनीतिक अंतर्विरोधों में उलझे हुए हैं। कुछ नहीं कहा जा सकता कि संघर्ष खत्म होने के बाद क्या होने वाला है।

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