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अदालतों को साइबर क्षमता संपन्न बनाने की अब भी कठिन है राह

अदालती आईना
एम जे एंटनी /  May 01, 2020

स्वास्थ्य सेवा तथा कई अन्य क्षेत्रों की तरह न्यायपालिका भी कोरोनावायरस से उपजी चुनौतियों से निपटने में खुद को आम पा रही है। स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में जहां सरकार दशकों के आलस्य से जागी है, वहीं न्यायिक क्षेत्र की समस्याओं का भी कोई आसान हल नहीं है। जबकि ये समस्याएं भी पिछले कई दशकों से बढ़ती चली जा रही हैं। यह कोई अप्रत्याशित घटना नहीं है बल्कि लंबे समय से चली आ रही दिक्कत है। न्यायपालिका और कार्यपालिका ने हालात को बिगड़ते रहने दिया। इसका नतीजा यह हुआ कि आज 3 करोड़ से अधिक मामले अदालतों में लंबित हैं।

तीन वर्ष पहले तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश ने प्रधानमंत्री की मौजूदगी में यह घोषणा की थी कि जुलाई 2017 से सर्वोच्च न्यायालय व्यावहारिक रूप से बिना कागज के कामकाज शुरू कर देगा। लेकिन साइबर तकनीक को अपनाने के मामले में आकांक्षा के अनुरूप प्रगति नहीं हुई है। अब तक महज कुछ हजार ई-याचिकाएं दाखिल हुई हैं। लॉकडाउन के कारण इस महीने यह आंकड़ा 305 तक बढ़ गया। इन याचिकाओं पर सुनवाई हुई भी या नहीं और हुई तो कैसे हुई यह आकलन कर पाना मुश्किल है क्योंकि कोई न्यायालय नहीं जा सकता है। दूसरी ओर,न्यायालय परिसर मेंं जाने पर देखा जा सकता है कि कैसे वहां के गलियारों में दोनों तरफ स्टील की आलमारियां रखी हैं। जिनमें फाइलों का अंबार है। अभी हाल ही में अदालत ने पास ही 12 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया है लेकिन इससे भी कागजों के ढेर में कोई कमी नहीं आई है।

न्यायालय परंपरावादी है इसलिए कुछ बुनियादी तकनीकों का प्रयोग करने में भी हिचक दिखाई गई। उदाहरण के लिए लाउडस्पीकर प्रणाली सन 1980 के दशक से ही चलन में थी लेकिन न्यायाधीशों ने शायद ही कभी उसका इस्तेमाल किया हो। परिणामस्वरूप न्यायालय और उनके गलियारों में लोग पुकार सुनने के लिए एकदम मशक्कत करते नजर आते हैं। याचिकाएं दायर करके यह मांग की गई कि न्यायिक सुनवाई का सीधा प्रसारण किया जाए लेकिन न्यायाधीशों द्वारा सहानुभूतिपूर्वक सुनवाई के सिवा इस दिशा में कुछ खास प्रगति नहीं हो सकी। अब अदालत की स्थिति ऐसी है कि वह वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग और व्हाट्सऐप के माध्यम से केवल आवश्यक मामलों की सुनवाई कर पा रही है। कोरोनावायरस के प्रसार के पहले न्यायिक प्रशासन में कृत्रिम मेधा के इस्तेमाल का जिक्र किया गया था। कहा जाता है कि कृत्रिम मेधा वाली तकनीक प्रति सेकंड 10 लाख शब्द पढ़ सकती है। इसका इस्तेमाल न्यायिक पेशे की प्रकृति को पूरी तरह बदल देगा, पारदर्शिता लाएगा और भ्रष्टाचार को समाप्त करेगा।

लॉकडाउन की अवधि केे दौरान न्यायालय ने वीडियो के माध्यम से करीब 400 मामलों की सुनवाई की। इस दौरान कई तरह की दिक्कतें भी सामने आईं क्योंकि सभी अधिवक्ता पेश नहीं हो सकते थे। कहा जा रहा है कि इन दिक्कतों के कारण न्यायालय सीमित लाइव वेबकास्टिंग और ई-फाइलिंग सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करना चाह रही है। परंतु ये उपाय बहुत छोटे हैं और इन्हें अपनाने में काफी देर हो चुकी है। ऐसे क्रांतिकारी कदम एक झटके में नहीं उठाए जा सकते। कोरोनावायरस ने न्यायपालिका को अत्यंत कठिन समय मेंं एक अहम सबक दिया है। चूंकि सर्वोच्च न्यायालय अधिकांश मामलों में उच्च न्यायालयों और पंचाटों की अपीलों पर ही सुनवाई करता है तो ऐसे में उनका भी इलेक्ट्रॉनिक रूप से जुड़ा होना आवश्यक है।

प्रधान न्यायाधीश एस ए बोबड़े के मुताबिक अकेले जनवरी में उच्च न्यायालयों के अधीन आने वाले 17,500 अधीनस्थ न्यायालयों से 26.84 लाख पन्नों के दस्तावेजों का ट्रांसमिशन किया गया। इनमें से कई समय आने पर उच्चतम न्यायालय के समक्ष भी पहुंचेंगे। अदालत में इनकी अपील की सुनवाई होने के पहले इनको डिजिटल तरीके से तैयार करना होगा। बहरहाल, अधीनस्थ न्यायालयों का बुनियादी ढांचा बहुत खराब है कि वहां न्यायाधीश तक बिना चैंबर, बिना पुस्तकालय और यहां तक कि बुनियादी सुविधाओं के अभाव में काम करते हैं। ये सारी बातें दस्तावेजों और न्यायाधीशों की रिपोर्ट में दर्ज हैं। इतना ही नहीं डिजिटल साक्षरता भी आसानी से हासिल नहीं होती। खासतौर पर बुजुर्ग होते न्यायाधीशों के लिए इसे हासिल करना मुश्किल है। इसकी तैयारी बहुत पहले शुरू हो जानी चाहिए थी।

कई उच्च न्यायालयों की वेबसाइट बहुत पुराने फॉर्मेट में हैं। लोगों के लिए उनका इस्तेमाल करना तक आसान नहीं रह गया है। यदि किसी व्यक्ति को किसी उच्च न्यायालय का सामाजिक या राजनीतिक प्रभाव वाला कोई अहम फैसला पढऩा हो तो उसे बहुत प्रयास करना होता है। उसे केस नंबर, डायरी नंबर, अधिवक्ताओं का नाम, न्यायाधीश का नाम आदि डालना पड़ता है। कुछ फैसलों में शीर्ष पर न्यायाधीशों के लिए कुछ टिप्पणियां होती हैं। मसलन स्थानीय अखबारों के पत्रकारों को नतीजा देखने की इजाजत दी जाए या नहीं।

इतना ही नहीं देश के 25 उच्च न्यायालयों की वेबसाइट में भी कोई एकरूपता नहीं है। ऐसा तब है जबकि इन सभी का निर्माण राष्ट्रीय सूचना-विज्ञान केंद्र ने किया है। ये कारण तथा ऐसे तमाम अन्य कारण पुरातन अदालतों के डिजिटलीकरण की राह को काफी मुश्किल और दुरूह बनाते हैं।

Keyword: Legal System, Court, Law, Cyber, Information Technology, अदालत, कानून, साइबर क्षमता, न्यायिक क्षेत्र, न्यायपालिका,
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