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लॉकडाउन खोलने पर एक संतुलित विचार

जैमिनी भगवती /  May 01, 2020

कोविड-19 वायरस के प्रसार के कारण 25 मार्च को लगाए गए देशव्यापी लॉकडाउन को एक महीना बीत चुका है। लॉकडाउन ने पहले से मंद पड़ रही देश की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है। हालांकि 20 अप्रैल से लॉकडाउन के कड़े नियमों को थोड़ा शिथिल किया गया। यह शिथिलता माल परिवहन, खेती, मछलीपालन, पौधरोपण, पशुपालन, विशेष आर्थिक क्षेत्रों में निर्माण, कोयला, खनिज और तेल उत्पादन तथा स्वरोजगार करने वाले प्लंबर, बढ़ई, वाहन मैकेनिकों और बिजली का काम करने वालों को दी गई। इससे कुछ लोगों को रोजगार मिलेगा और कर्जदारों को भी कुछ राहत मिलेगी।

गत 22 अप्रैल तक देश में कोविड-19 से 683 लोगों की मौत हुई थी। सन 2017-18 में देश में करीब पांच लाख मौतें ऐसी थीं जो बिना एचआईवी के टीबी या डायरिया से हुईं। शायद लॉकडाउन न लगने पर कोविड वायरस से ज्यादा लोगों की मौत होती लेकिन सवाल यह है कि क्या केंद्र सरकार लॉकडाउन को अधिक विशिष्ट तरीके से प्रयोग में ला सकती थी?

बीबीसी समेत मीडिया जगत से आई कई टिप्पणियों में कहा गया कि भारत में कोविड के वास्तविक मामले बहुत कम करके दर्शाए जा रहे हैं। भारत में सोशल मीडिया का अच्छाखासा प्रसार है, ऐसे में बड़ी तादाद में होने वाली मौतों को छिपा पाना लगभग असंभव है। बहरहाल, संक्रमितों की आधिकारिक तादाद इसलिए भी कम हो सकती है क्योंकि भीड़ भरे शहरों और झोपड़पट्टियों वाले हमारे देश में जांच की क्षमता बहुत सीमित है। जैसा कि अक्सर कहा जाता है कि किसी संकट को भी जाया नहीं होने दिया जाना चाहिए। ऐसे में संक्रमण और मौत के मामलों को बाद में होने वाले अध्ययनों के लिए दर्ज किया जाना चाहिए। यदि 2002 की सार्स महामारी को लेकर पर्याप्त शोध किया गया होता तो आज भारत कोविड-19 को थामने के मामले में बेहतर स्थिति में होता।

गत 20 अप्रैल से दी गई कुछ शिथिलताओं के बावजूद मौजूदा देशव्यापी लॉकडाउन ने देश की आर्थिक गतिविधियों को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। इससे असंगठित क्षेत्र में काम करने वालों की आय पर बहुत बुरा असर हुआ। इस बात की आशंका बहुत ज्यादा है कि असंगठित क्षेत्र के लोग कुपोषण और चिकित्सा सुविधाओं में कमी के चलते दूसरी बीमारियों से मर जाएंगे। आशंका इसलिए भी बढ़ती है क्योंकि अस्पताल कोविड के मरीजों के इलाज पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। इस संदर्भ में मुझे एक हिंदी फिल्म की याद आती है जिसमें उत्पल दत्त निजी क्षेत्र के एक वरिष्ठ अधिकारी की भूमिका में थे। दत्त का किरदार हड़ताल करने वाले कर्मचारियों की वेतन वृद्धि की मांग अहंकारपूर्वक इनकार कर देता है। पूरी फिल्म में एक पाश्र्व संगीत बजता है जिसमें श्रमिक गाते हैं, 'हम भूख से मरने वाले, क्या मौत से डरने वाले?'

सरकार ने देशव्यापी लॉकडाउन की घोषणा करने से पहले इस बात की अनदेखी कर दी कि इसका दैनिक मजदूरों और प्रवासी श्रमिकों पर कितना बुरा असर होगा। यह भी बाद के लिए एक अहम सबक है। सरकार को 15 करोड़ दैनिक मजदूरों और प्रवासी श्रमिकों की आय और उनकी जीवन परिस्थितियों को लेकर बड़ी मेहनत से सैंपल सर्वे का संग्रह करना होगा।

कुछ लोगों ने चिंता जताई है कि अगर सरकारी व्यय में ज्यादा इजाफा किया जाता है तो मुद्रास्फीति में इजाफा होगा और भुगतान संतुलन का संकट पैदा हो जाएगा। वैश्विक मांग में भारी कमी के चलते ब्रेंट क्रूड की कीमत में भारी गिरावट आई और वह 20 डॉलर प्रति बैरल तक जा गिरा। पहली बार 20 अप्रैल को अमेरिकी तेल कीमतें ऋणात्मक हो गईं क्योंकि अमेरिकी तेल उत्पादकों के पास भंडारण की जगह नहीं बची। भारत तथा शेष विश्व में तेल की मांग में भारी कमी के चलते मुद्रास्फीतिक दबाव तो दूर की कौड़ी है। स्पष्ट है कि सरकार बिना मुद्रास्फीति की चिंता किए निचले स्तर पर खपत बढ़ाने के लिए व्यय में इजाफा कर सकती है। हां, रिजर्व बैंक को अवश्य अपने नियामकीय कदमों का पालन करते समय सहनशीलता का परिचय देना चाहिए और ऋणदाताओं के फरवरी 2020 से पहले के ऋणशोधन को कोविड के कारण लगे लॉकडाउन के बाद सामने आए मामलों से अलग रखना चाहिए।

यद्यपि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने वर्ष 2020-21 के दौरान भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 1.8 फीसदी की दर से विकसित होने के अनुमान जताए हैं। परंतु हकीकत में यह 5 फीसदी ऋणात्मक या उससे भी बुरी हो सकती है। सन 2020-21 में कुल घरेलू कर राजस्व, शुद्ध विदेशी निवेश की आवक और विदेशों से धन प्रेषण में जबरदस्त कमी आएगी। उच्च सार्वजनिक व्यय के लिए आरबीआई को केंद्र सरकार के डेट की प्रत्यक्ष खरीद करनी होगी। केंद्र और राज्य सरकारों का संयुक्त घाटा जीडीपी के 14 फीसदी के स्तर तक बढ़ सकता है। वर्ष 2019-20 में यह जीडीपी के तकरीबन 9 फीसदी के बराबर था। अगर हम तुलनातमक अध्ययन करें तो विकसित देशों ने जीडीपी के 10 फीसदी के बराबर या उससे अधिक के अतिरिक्त व्यय की घोषणा की है ताकि कोविड-19 का आर्थिक असर सीमित किया जा सके।

केंद्र सरकार और आरबीआई ने अर्थव्यवस्था को उबारने के लिए कदम उठाए हैं लेकिन फिर भी दैनिक मजदूरों और प्रवासी श्रमिकों तथा भूमिहीन श्रमिकों को तवज्जो दी जानी चाहिए। इस बात की पुष्ट रिपोर्ट सामने आईं कि अमीरों को विदेशों से वापस लाया गया और मध्य वर्ग के बच्चों को कोटा स्थित कोचिंग संस्थानों से उनके घरों को लाया गया। लेकिन केंद्र सरकार ने अपने घरों को लौटना चाह रहे श्रमिकों को वापसी के लिए ट्रेन मुहैया नहीं कराई जबकि उन्हें उनके घर पहुंचाकर 14 दिन के लिए क्वारंटीन किया जा सकता था।

यह स्वास्थ्य संकट 3 मई को लॉकडाउन समाप्त होने के बाद किस तरह के बदलाव लाएगा? इस बात को लेकर कोई निश्चितता नहीं है कि लॉकडाउन समाप्त होने के बाद संक्रमण किस हद तक फैलेगा। लॉकडाउन को 14 अप्रैल से आगे बढ़ाने का निर्णय शायद अमीर तबके के प्रभाव में लिया गया क्योंकि वे चाहते थे कि लॉकडाउन लागू रहे। परंतु 3 मई के बाद अर्थव्यवस्था को हुआ नुकसान तथा इसके चलते गरीबों को पहुंची क्षति के बारे में तार्किक ढंग से सोचते हुए लॉकडाउन हटाया जाना चाहिए। सारी बातों पर विचार करते हुए 3 मई के बाद लॉकडाउन हटाने के बारे में दिलोदिमाग का इस्तेमाल करते हुए फैसला लिया जाना चाहिए और विनिर्माण संबंधी आर्थिक गतिविधियों को पूरी तरह खोल दिया जाना चाहिए। कोविड-19 हॉटस्पॉट को छोड़कर देश के अन्य हिस्सों में आंतरिक आवागमन पूरी तरह शुरू कर दिया जाना चाहिए।

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