बिजनेस स्टैंडर्ड - पूंजी निर्माण की प्रक्रिया बनानी होगी आसान
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पूंजी निर्माण की प्रक्रिया बनानी होगी आसान

बाअदब
सोमशेखर सुंदरेशन /  April 30, 2020

कोविड-19 महामारी से निपटने के लिए की गई कवायद के आर्थिक प्रभाव ने पीड़ा देना शुरू कर दिया है। यह समय प्रतिभूति बाजार नियामक के लिए पूंजी जुटाने के समूचे ढांचे को तिलांजलि देने और अपना मकसद पूरा कर चुके प्रावधानों की समीक्षा का बेहतरीन मौका लेकर आया है। यह निवेशकों की सुरक्षा के साथ कोई समझौता किए बगैर पूंजी जुटाने की प्रक्रिया को सुगम बनाने का मौका भी है।

इन सभी बिंदुओं पर सहमत होना आसान है। यह पूंजी जुटाने की राह में असुविधाएं पैदा करने वाले तत्त्वों और एक निवेशक को कमजोर बनाने वाले कारकों से ही ताल्लुक रखता है। भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने हाल में राइट्स इश्यू की प्रक्रिया को सरल और त्वरित बनाने के लिए कई नए कदम उठाए हैं। कोशिश यह है कि व्यापक उद्देश्य पर नजर रखी जाए और गैर-जरूरी एवं पुराने हो चुके प्रावधानों की पहचान के दायरे को बढ़ाया जाए।

इस वित्त वर्ष और शायद अगले साल में भी तमाम कंपनियां अपना वजूद बचाए रखने की जद्दोजहद में लगी रहेंगी। उनके सामने कर्जों के भुगतान, कर्मचारियों की देनदारियों को पूरा करने और अपनी तरलता बनाए रखने की चुनौतियां होंगी। बैंकिंग क्षेत्र तो कोविड महामारी के पहले भी संकट के दौर से गुजर रहा था, लिहाजा डेट के तौर पर नई रकम आने की संभावना भी अधिक नहीं होगी। कर्ज देने के मामले में भरोसा खो चुके बैंकर कोविड संकट के दौर में अचानक ही उधारकर्ताओं को कर्ज बांटना नहीं शुरू कर देंगे। फिर कंपनियों को पैसा इक्विटी बाजारों से जुटाना होगा। निवेशक किसी कंपनी को चालू स्थिति में रखने के लिए स्वीकार्य कीमत पर जोखिम-भरे निवेश का फैसला कर सकते हैं। इस तरह सूचीबद्ध कंपनियों के लिए कीमत-निर्धारण संबंधी पाबंदियां लगाते समय ध्यान रखा जाना चाहिए। नई सूचीबद्धता एवं राइट्स इश्यू के समय कीमत-निर्धारण संबंधी कोई प्रावधान नहीं हैं और असली बाधा एक पेशकश दस्तावेज तैयार करने और ढेर सारी सूचनाओं के खुलासे में लगने वाला समय है। यह एकदम माकूल वक्त है कि इन जरूरी खुलासों की हरेक पंक्ति को ठीक से पढ़ा जाए और उन्हें वाकई में ठोस सूचनाएं जुटाने का जरिया बनाया जाए। इश्यू लाने वाली कंपनी की अनुषंगी इकाइयों, समूह कंपनियों एवं प्रवर्तक समूह के बारे में जानकारी देने की शर्तों के अनुपालन से किसी भी निवेशक के लिए उसे खरीदने के पहले तमाम जानकारियां जुटाई जा सकती हैं।

एक राइट्स इश्यू के खुलासे इसके स्वाभाविक परिणाम हैं कि पहले से ही सूचीबद्ध कंपनियों के लिए खुलासे की बाध्यता कितनी असरदार है। अगर एक कंपनी की प्रतिभूतियां पहले ही सूचीबद्ध हैं तो मौजूदा खुलासों का नियमन करने वाले प्रावधान द्वितीयक बाजार में जानकारी-परक मूल्य जानने के लिए काफी माने जाते हैं। अगर यह बात सही थी तो एक सूचीबद्ध कंपनी को एक राइट्स इश्यू के लिए खुलासा दस्तावेज तैयार करने में अधिक कठिनाई नहीं आनी चाहिए थी।

यह एक वाजिब सवाल है कि क्या राइट्स इश्यू को वाकई में भारी-भरकम ऑफर दस्तावेज की जरूरत होनी चाहिए? यह बात सच है कि अगर हरेक कंपनी की सालाना रिपोर्ट या वार्षिक प्रतिभूति नियामक रिटर्न में विवरण-पुस्तिका जैसी सूचनाएं ही दी जाती हैं तो फिर ऑफर दस्तावेज में लिखने के लिए कुछ भी नया नहीं होना चाहिए, यह बताने के सिवाय कि पैसा किस उद्देश्य के लिए जुटाया जा रहा है। सेबी के हालिया कदम के बाद राइट्स इश्यू के जरिये जुटाए जाने वाले फंड की सीमा महज 25 करोड़ रुपये ही रह गई है। इससे कम राशि जुटाने के लिए किसी भी ऑफर दस्तावेज की जरूरत नहीं है। समय आ गया है कि इसे 100 करोड़ रुपये के साहसिक स्तर पर ले जाया जाए। सेबी ने राइट्स इश्यू को 'फास्ट-ट्रैक' करने की दिशा में कुछ बेहद वाजिब कदम उठाए हैं। बाजार पूंजीकरण शर्त को 250 करोड़ रुपये से घटाकर 100 करोड़ रुपये पर लाना और प्रक्रिया लंबित होने पर योग्यता पर रोक लगाने वाले प्रावधान में संशोधन ऐसे ही कदम हैं। यह अच्छी शुरुआत है लेकिन आदर्श लक्ष्य यह होना चाहिए कि सभी सूचीबद्ध कंपनियों के सारे राइट्स इश्यू को ही फास्ट-ट्रैक किया जा सके। इसके लिए राइट्स इश्यू को लेकर हमें अपनी सोच में बदलाव करने होंगे।

कीमत नियमन उस स्थिति में होता है जहां पूंजी का नया इश्यू विशिष्ट पूर्व-चिह्नित निवेशकों को किया गया हो, न कि मौजूदा शेयरधारकों या आम जनता के लिए अधिकार के तौर पर जारी हो। एक सूचीबद्ध कंपनी के ऐसे वरीय इश्यू की कीमत का नियमन अनिवार्य तौर पर आधार मूल्य का प्रावधान करता है ताकि मौजूदा शेयरधारकों के हितों को सुरक्षित रखा जा सके। सेबी ने तनावग्रस्त कंपनियों के लिए इक्विटी के जरिये नई पूंजी जुटाने की प्रक्रिया आसान बनाने को लेकर एक परामर्श पत्र भी जारी किया है। इस दिशा में काम करने और उसे सही मुकाम तक पहुंचाने की जरूरत है।

मौजूदा संस्थागत निवेशकों द्वारा नई पूंजी लगाए जाने पर किसी तरह की सीमा तय किए जाने के बारे में भी गंभीरता से सोचा जाना चाहिए। मसलन, एक वैकल्पिक निवेश फंड में यह प्रावधान है कि व्यक्तिगत निवेश का संकेंद्रण न हो और किसी एक निवेश के लिए अधिकतम 25 फीसदी फंड की सीमा भी तय है। क्या उस सीमा में एक वाजिब छूट एक साल के लिए दी जा सकती है? इस वित्त वर्ष में पूंजी निर्माण पर केंद्रित नीति की जरूरत पड़ेगी। हमें इसका भी ध्यान रखना होगा कि दिवालिया कानून को निलंबित करने की मांग स्वीकार न की जाए। अर्थव्यवस्था को व्यवहार्य बने रहने के लिए प्रवेश एवं निकास दोनों के ही रास्ते बाधा-मुक्त होने चाहिए।

(लेखक अधिवक्ता एवं स्वतंत्र परामर्शदाता हैं)

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