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आर्थिक पलटवार का जरिया होगी एनआईपी योजना

विनायक चटर्जी /  April 29, 2020

इस बात को लेकर कोई संदेह नहीं है कि कोरोनावायरस से उपजी महामारी का अर्थव्यवस्था पर गहरा असर पड़ा है और आगे भी यह लंबे समय तक इसे प्रभावित करती रहेगी। अगर अगले दो महीनों में यह महामारी पूरी तरह खत्म हो जाए तो भी भारतीय अर्थव्यवस्था को फिर से पटरी पर लाने में कहीं लंबा समय लगेगा। यह संकट ऐसे समय आया है जब हमारी अर्थव्यवस्था पहले से ही कमजोर चल रही थी। ऐसे में समय आने पर भारतीय अर्थव्यवस्था, खासकर ढांचागत क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निवेश करने की जरूरत पड़ेगी ताकि फिर से अर्थव्यवस्था को पैरों पर खड़ा किया जा सके। इस संदर्भ में राष्ट्रीय ढांचागत पाइपलाइन (एनआईपी) योजना बेहद जरूरी नजर आती है।

पिछले साल के अंतिम दिनों में घोषित इस योजना के तहत 2020 से लेकर 2025 तक 111 लाख करोड़ रुपये का व्यापक निवेश तमाम ढांचागत क्षेत्रों में किया जाना है। सड़क, शहरी विकास एवं आवास और रेलवे को इस राशि में से करीब 50 फीसदी हिस्सा मिलने की संभावना है। इस योजना के कुल पूंजीगत व्यय का करीब 80 फीसदी केंद्र एवं राज्यों की सरकारों के अलावा उनके सार्वजनिक उपक्रमों के हिस्से में जाएगा। इसी वजह से यह आलोचना भी हुई कि इस योजना में निजी क्षेत्र को कहीं बड़ी भूमिका देने की नीति से एक कदम पीछे खींचा गया है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में निजी क्षेत्र की मौजूदा वित्तीय कमजोरियों को देखते हुए यह फैसला व्यावहारिक नजर आता है। फिलहाल निजी क्षेत्र के पास ऐसी क्षमता नहीं है कि बड़े आकार वाली परियोजनाओं में वह कम-से-कम शुरुआती स्तर पर अधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सके।

एक और चिंता इस योजना के आकार को लेकर ही थी और क्या अर्थव्यवस्था की हालत और कमजोर कर राजस्व वृद्धि को देखते हुए सरकारें (केंद्र एवं राज्य) इतने बड़े पैमाने पर निवेश का बोझ उठा सकती हैं? वित्त जुटाने में केंद्रीय एवं राज्यों के उपक्रमों की बड़ी संलिप्तता का मतलब है कि ऐसी चिंताएं कुछ हद तक दूर रहेंगी। लेकिन यह आलोचना इस बड़ी तस्वीर को नजरअंदाज करती है कि यह संकट कोरोनावायरस महामारी से पैदा हुआ है। एनआईपी को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए- एक विशाल राहत पैकेज के तौर पर जो अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के लिए है।

दुनिया भर में अब यह माना जा चुका है कि कोरोनावायरस संकट के आर्थिक प्रभाव 2008 के वित्तीय संकट को भी मात दे सकते हैं। पिछले दिनों अमेरिका ने बेरोजगारी भत्ते के लिए किए जाने वाले दावों में अब तक की सबसे बड़ी उछाल देखी है। इसकी वजह है कि अमेरिका में लाखों लोग महामारी के चलते अपनी नौकरी गंवा चुके हैं।

चीन का औद्योगिक उत्पादन इस साल के पहले दो महीनों में 13.5 फीसदी तक गिर गया। आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन पहले ही कह चुका है कि विश्व अर्थव्यवस्था 2009 के बाद से सबसे धीमी रफ्तार से बढ़ सकती है।

संकट के इस समय में दुनिया भर की सरकारों को विचारधारा से इतर बड़ा राहत पैकेज घोषित करने में तनिक भी देर नहीं करनी चाहिए। मसलन, अमेरिकी संसद के उच्च सदन सीनेट ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए 2 लाख करोड़ डॉलर के विशाल पैकेज की घोषणा की है। अमेरिका के राजनीतिक संदर्भ में देखें तो वहां  'बड़ी सरकार' के बारे में राय दलीय आधार पर बंटी हुई है लेकिन मौजूदा हालात में वहां पर भी इस राहत पैकेज को आम सहमति से पारित कर दिया गया।

इस तरह के विशाल राहत पैकेजों की जरूरत है। अगर 2008 के वित्तीय संकट का ही उदाहरण लें तो चीन ने अपनी अर्थव्यवस्था के लिए दो साल के दौरान 58.6 अरब डॉलर का विशाल राहत पैकेज देने की घोषणा की थी। इस पैकेज में दी गई राशि चीन के संकट-पूर्व सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 16 फीसदी के बराबर थी। अब इस बात को हर कोई मानता है कि इस बड़े राहत पैकेज की ही वजह से चीन के उद्योग अपेक्षाकृत जल्द वापसी कर पाए।

जहां चीन के प्रोत्साहन पैकेज के आकार एवं प्रकार ने आगे चलकर स्थानीय सरकारों पर कर्ज का भारी बोझ पडऩे जैसी समस्याएं पैदा की, वहीं इसने यह भी सुनिश्चित किया कि चीन बाकी देशों की तुलना में कहीं तेजी से रिकवरी कर पाया। इसकी तुलना में सख्त राजकोषीय नियमों पर चलने वाले यूरोपीय संघ को कुछ वर्षों तक कमजोर वृद्धि का दौर देखना पड़ा जबकि कुछ देशों में संकट देर तक चला।

इस लिहाज से देखें तो एनआईपी वाकई में अति महत्त्वाकांक्षी योजना है जिसमें वार्षिक जीडीपी का करीब 7-10 फीसदी हिस्सा जाना है। इसके अलावा योजना राशि का करीब 40 फीसदी पहले से ही क्रियान्वयन के दौर में है। असल में, यह कहना वाजिब है कि सरकार मौजूदा संकट से अर्थव्यवस्था पर पडऩे वाली गहरी मार को देखते हुए आगे चलकर एनआईपी का आकार और भी बढ़ा सकती है।

लेकिन किसी भी ढांचागत निवेश योजना की सफलता उसके पूंजीगत व्यय के आकार से नहीं बल्कि उसके साथ किए जाने वाले सुधारों से तय होती है। क्षेत्र के स्तर के सुधार ही यह तय करेंगे कि खर्च की जाने वाली राशि का अधिकतम मूल्य मिले। इसके साथ ही इस ढांचागत पाइपलाइन में आगे चलकर निजी क्षेत्र को बड़ी भूमिका निभाने का मौका मिलने की संभावना भी तय होती है।

सुकून देने वाली बात यह है कि एनआईपी इस बात को समझता है और उन तमाम सुधारों का जिक्र करता है जिनका जिक्र निजी ढांचागत कंपनियां कई वर्षों से करती रही हैं। मसलन, जोखिम साझेदारी जिसमें निजी क्षेत्र उतना ही जोखिम लेगा जितना वह झेल सकता है, अंतरराष्ट्रीय अनुबंध मानकों को अपनाना और विवाद निपटान की प्रभावी व्यवस्था करना। यह ढांचागत वित्त परिदृश्य में नई जान फूंकने के साथ ही सरकारी स्वामित्व वाली मौजूदा एवं सक्रिय ढांचागत परिसंपत्तियों की बिक्री की बात भी करता है ताकि नए निवेश के लिए संसाधन जुटाए जा सकें।

एनआईपी में बड़े पैमाने पर निवेश की योजना रखने के साथ ही जिन ढांचागत सुधारों की बात भी की गई है, अगर वे लागू हो पाए तो यह योजना भारतीय अर्थव्यवस्था को महामारी की मार से उबारने एवं नई जान डालने में अहम भूमिका निभाएगी।

(लेखक ढांचागत परामर्शदाता फीडबैक इन्फ्रा के चेयरमैन हैं)

 
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