बिजनेस स्टैंडर्ड - विवेकाधीन निर्णयों का बढ़ रहा है दबदबा
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विवेकाधीन निर्णयों का बढ़ रहा है दबदबा

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  April 28, 2020

करीब 10 दिन पहले केंद्र सरकार ने कोविड-19 महामारी को देखते हुए आर्थिक नीति से जुड़े दो अहम निर्णय लिए। इन पर करीबी नजर डालने से पता चलता है कि उनका साझा लक्ष्य देश में आने वाला विदेशी निवेश है। एक निर्णय देश में होने वाले विदेशी निवेश पर दूरगामी प्रभाव डाल सकता है, दूसरा निर्णय अस्थायी प्रभाव वाला है लेकिन कुछ क्षेत्रों में विदेशी निवेश पर इसका असर भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं होगा।

पहला निर्णय कुछ अन्य बातों के अलावा 15 अप्रैल के एक आदेश मेंं संशोधन का था। इस आदेश में कहा गया था कि ई-कॉमर्स कंपनियां 20 अप्रैल से उन वस्तुओं की आपूर्ति शुरू कर सकेंगी जो अत्यावश्यक वस्तुओं की श्रेणी में नहीं आतीं। यह घोषणा देशव्यापी लॉकडाउन को चरणबद्ध तरीके से हटाने की प्रक्रिया का हिस्सा थी। परंतु चार दिन बाद 19 अप्रैल को सरकार ने स्पष्ट किया कि यह छूट वापस ले ली गई। खुदरा कारोबार की प्रतिनिधि संस्था कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (सीएआईटी) ने इस निर्णय का स्वागत किया। यदि शुरुआती आदेश का लक्ष्य लॉकडाउन को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करना था तो ई-कॉमर्स कंपनियों को वस्तुओं की आपूर्ति शुरू करने देना एक अच्छा कदम था। परंतु शायद अधिकांश ई-कॉमर्स कंपनियों का विदेशी कंपनियों का अनुषंगी होना उनके आड़े आ गया। सीएआईटी इस बात से नाराज था कि आम किराना दुकानें बंद रहेंगी जबकि विदेशी स्वामित्व वाली ई-कॉमर्स कंपनियां काम शुरू करेंगी।

इन घटनाओं ने ई-कॉमर्स क्षेत्र की बड़ी कंपनियों के मन में यह धारणा उत्पन्न की होगी कि भारत में कारोबार केे दौरान नीतिगत माहौल उनके खिलाफ है। इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि ऐसे निर्णय देश में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के माहौल को प्रभावित करेंगे। दूसरा निर्णय 18 अप्रैल को लिया गया। इसमें कहा गया कि जो देश भारत के साथ जमीन के रास्ते जुड़े हुए हैं, वहां से होने वाले प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को सरकार से विशिष्ट पूर्व मंजूरी लेनी होगी। अधिसूचना में स्पष्ट किया गया कि इसका लक्ष्य कोविड-19 महामारी के बीच भारतीय कंपनियों के अधिग्रहण की अवसरवादी कोशिशों को रोकना है। पाकिस्तान और बांग्लादेश के निवेश प्रस्तावों के लिए पहले से ही भारत सरकार की विशेष मंजूरी जरूरी है। नया आदेश भूटान, नेपाल, अफगानिस्तान, म्यांमार और चीन के निवेश को प्रभावित करेगा। परंतु चीन को छोड़ दिया जाए तो इन देशों से आने वाला समग्र एफडीआई बीते दो दशक मेंं नगण्य रहा है। इस अवधि में भूटान से कोई निवेश नहीं आया, बांग्लादेश से 80,000 डॉलर, अफगानिस्तान से 24.4 लाख डॉलर, नेपाल से 32.5 लाख डॉलर और म्यांमार से 89.7 लाख डॉलर का विदेशी निवेश आया। जबकि समान अवधि में चीन से 2.34 अरब डॉलर मूल्य का विदेशी निवेश आया। देश के कुल 457 अरब डॉलर के विदेशी निवेश में इसकी हिस्सेदारी करीब आधा प्रतिशत से अधिक है।

बीते 20 वर्ष में इतना कम विदेशी निवेश करने वाले देश को लेकर यह कैसी चिंता? इसके दो संभावित कारण हैं। पहली बात यह निर्णय शायद सामरिक हितों को ध्यान में रखकर लिया गया। ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, इटली और स्पेन ने पहले ही अपने देश में चीन के निवेश को लेकर सतर्कता बढ़ा दी है। भारत भी चीन के खिलाफ ऐसे ही कदम उठाना चाहता था।

दूसरा कारण, चीन से आधिकारिक एफडीआई आवक बहुत छोटी नजर आ सकती है लेकिन ऐसी रिपोर्ट हैं जिनके मुताबिक चीन के अलावा अन्य देशों से भारत में भारी राशि एफडीआई के रूप में आती है। परंतु इन निवेशक फर्म का लाभकारी स्वामित्व चीनी मूल के लोगों के पास है या चीन में है। ऐसे में उद्योग मंत्रालय की अधिसूचना ने स्पष्ट किया कि ऐसे सभी निवेश जिनका लाभकारी स्वामित्व चीन में है, उन्हें भी विशेष अनुमति लेनी होगी। एक अनुमान के मुताबिक देश की स्टार्टअप कंपनियों में 4 अरब डॉलर तक का निवेश चीनी फंडों से आया है। उनकी हिस्सेदारी फिलहाल 30 यूनिकॉर्न (ऐसा स्टार्टअप जिसका मूल्यांकन एक अरब डॉलर से अधिक) में से 18 में है। यदि विदेशी फंड की आवक में कमी आती है तो सरकार की स्टार्ट अप इंडिया पहल को झटका लग सकता है। सामरिक हित सरकार के लिए सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण हैं लेकिन स्टार्टअप क्षेत्र की वित्तीय जरूरतें भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं हैं।

एफडीआई नियमों में बदलाव देश के स्टार्टअप कारोबार को जिस तरह प्रभावित करने वाला है, सरकारी नीतियों को उसकी भी अनदेखी नहीं करनी चाहिए। सरकार को एक फास्ट ट्रैक व्यवस्था कायम करनी चाहिए ताकि चीन से आने वाले तमाम एफडीआई प्रस्तावों को तेज गति से निपटाया जा सके। खासतौर पर स्टार्टअप कंपनियों में आने वाले निवेश प्रस्तावों को। बशर्ते कि इनका लक्ष्य मौजूदा कंपनियों का अधिग्रहण करने का न हो। भारत को विदेशी पूंजी की जरूरत है। खासकर उन उपक्रमों में जो रोजगार पैदा कर सकते हैं। यदि चीन से आने वाले निवेश को लेकर किसी तरह की सामरिक चिंता है तो उसे हल किया जाना चाहिए। परंतु सरकार को साथ ही ऐसे कदम भी उठाने चाहिए ताकि मौजूदा स्टार्टअप कंपनियों पर कोई बुरा प्रभाव न पड़े। खासतौर पर ऐसी कंपनियों पर जो विदेशी निवेश पर निर्भर हैं। ऐसा कम से कम तब तक किया जाना चाहिए जब तक कि वैकल्पिक फंड का इंतजाम नहीं हो जाता। देश की एफडीआई नीति में वर्षों तक धीमे और चरणबद्ध सुधार हुए हैं। परंतु निर्णय प्रक्रिया में एक बार फिर विवेकाधीन निर्णय जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं। इसकेलिए कोविड-19 महामारी के प्रसार और चीन के बढ़ते दबदबे को बहाना बनाया जा रहा है। इस रुख पर नजर रखनी होगी और इसे बदलना भी होगा।

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