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क्यों लगते रहेंगे फ्रैंकलिन टेम्पलटन जैसे झटके?

देवाशिष बसु /  April 28, 2020

फ्रैंकलिन टेम्पलटन इंडिया म्युचुुअल फंड ने पिछले सप्ताह अचानक छह डेट योजनाओं को समेटने की घोषणा कर दी, जिनमें 27,000 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश था। इन योजनाओं में लो ड्यूरेशन फंड, डायनैमिक अक्रूअल फंड, क्रेडिट रिस्क फंड, शॉर्ट टर्म इनकम प्लान, अल्ट्रा शॉर्ट बॉन्ड फंड और इनकम अपाच्र्यूनिटी फंड शामिल हैं। फ्रैंकलिन न ताजा निवेश स्वीकार करेगा और न ही निकासी की मंजूरी देगा। यह ऋण प्रतिभूतियों के परिपक्व होने या संभव होने पर जल्द पोर्टफोलियो को बेचेगा। इससे फंड को प्राप्त होने वाली राशि निवेशकों को लौटाई जाएगी। यह राशि कितनी होगी, कोई नहीं जानता। निवेशक फंसे हुए हैं। जिन लोगों ने अन्य म्युचुअल फंड योजनाओं में पैसा लगाया था, वे भी चिंतित हैं। ऐसा क्यों हुआ? क्या इसमें व्यवस्था का दोष है? क्या यहां नियामक की कोई भूमिका है? क्या ऐसा फिर हो सकता है? आपको ऐसी घटनाओं से बचने के लिए क्या करना चाहिए?

1. ऐसा क्यों हुआ? जब कोरोनावायरस का हमला हुआ तो फ्रैंकलिन को निकासी (रिडेंपशन) का दबाव झेलना पड़ा। अगर निकासी आवक के बराबर रहती है तो कोई दिक्कत नहीं है। अगर आवक की तुलना में निकासी थोड़ी अधिक भी रहती है तो इतनी बड़ी समस्या नहीं होती है। इस निकासी को पूरा करने के लिए कुछ समय के लिए धन उधार लिया जाता है। फ्रैंकलिन भी उधारी ले रहा था, मगर निकासी बहुत अधिक थी। इस वजह से उसे फंडों को बंद करना पड़ा। यह धन जुटाने के लिए अपना निवेश क्यों नहीं बेच सका? क्योंकि इसके लिए अपने निवेश को बेचकर धन जुटाना मुमकिन ही नहीं था। फ्रैंकलिन की फिक्स्ड इनकम डेस्क लिक्विड स्कीम जैसी उन योजनाओं में भी अतिरिक्त जोखिम (ढांचागत, जटिल सौदे और कमजोर गुणवत्ता क प्रतिभूतियां)  लेने की कोशिश कर रही है, जिन्हें सुरक्षित माना जाता है। इसका मकसद अपने प्रतिफल को बढ़ाना है ताकि वह स्थितियों को संभालने के लिए और निवेश खींच सके।

2. क्या इसमें व्यवस्था के स्तर पर खामी है? यदि आप मुझसे पूछते हैं तो हां। मगर आप फंड कंपनियों, फंड प्रबंधकों, वितरकों, सलाहकारों और नियामक समेत पूरे म्युचुअल फंड क्षेत्र से पूछेंगे तो नहीं। जैसा कि मीडिया ने प्रसारित किया है कि समूह का कहना है कि यह समस्या मुख्य रूप से बाहरी (कोविड-19 से आई आफत) और आंशिक रूप से आंतरिक (फ्रैंकलिन द्वारा अतिरिक्त जोखिम लिया जाना) है। मुझे पूरा भरोसा है कि यह फंड भी इस बात को नहीं मानेगा कि उसके अतिरिक्त जोखिम लेने से यह संकट पैदा हुआ है। इन तर्कों पर संदेह है। मेरा मानना है कि फंड उद्योग और उत्पाद श्रेणियों दोनों में समस्या है। न केवल फ्रैंकलिन बल्कि विभिन्न म्युचुअल फंडों में फिक्स्ड इनकम डिवीजन अधिक जोखिम लेकर अधिक प्रतिफल अर्जित करने की कोशिश कर रही हैं। पिछले 18 महीनों के दौरान इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग ऐंड फाइनैंशियल सर्विसेज, जी/एस्सेल, दीवान हाउसिंग फाइनैंस लिमिटेड (डीएचएफएल) और येस बैंक जैसे जितने बड़े घोटाले सामने आए हैं, उनमें म्युचुअल फंडों की भागीदारी रही है। कुछ समय पहले फ्रैंकलिन ने वोडाफोन की एक प्रतिभूति में अपने 100 फीसदी निवेश को बट्टे खाते में डाला था। वोडाफोन पर फंड उद्योग के कुल 4,500 करोड़ रुपये बकाये थे, जिसमें सबसे अधिक 2,047 करोड़ रुपये फ्रैंकलिन के थे।

मैंने सबसे पहले मनीलाइफ में यह खुलासा किया था कि कैसे डीएचएफएल के प्रवर्तकों की व्यक्तिगत होल्डिंग कंपनी वधावन ग्लोबल कैपिटल (डब्ल्यूजीसीएल) ने आदित्य बिड़ला एमएफ और फ्रैंकलिन से जीरो-कूपन बॉन्ड के जरिये 2,125 करोड़ रुपये जुटाए। फ्रैंकलिन ने राणा कपूर की होल्डिंग कंपनी येस कैपिटल को फिर जीरो-कूपन बॉन्ड के जरिये उधार दिया। कपूर की येस बैंक की हिस्सेदारी में येस कैपिटल का 3.27 फीसदी हिस्सा था। आईडीबीआई म्युचुअल फंड ने इस अधिक जोखिम वाले उत्पाद को अपने लिक्विड फंड में रखा। वहीं

फ्रैंकलिन इंडिया डेट फंड ने अपनी परिसंपत्तियों का 8.27 फीसदी हिस्सा इन बॉन्डों में लगाया। इन सभी मामलों में म्युचुअल फंडों ने विवेकी निवेशकों की नहीं बल्कि लापरवाह ऋणदाताओं के रूप में काम किया। साफ तौर पर जिस तरह डेट फंडों को चलाया जा रहा है, वह एक व्यवस्था से जुड़ा मसला है।

3. क्या यहां नियामक की कोई भूमिका है? हां। यह दो काम कर सकता है। पहला, इसे क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों और फंड कंपनियों की जवाबदेही तय करने की जरूरत है। नियामक को कुछ ऐसे प्रावधान लागू करने चाहिए, जिनमें कंपनियों में कुछ दिक्कत सामने आने पर उनसे क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों को मिली फीस वापस ली जानी चाहिए। फंड अपनी जिम्मेदारी उन रेटिंग एजेंसियों पर डाल देते हैं, जिनकी उनके प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं होती है। यह अजीब बात है।

रेटिंग एजेंसियों को उन रेटिंग के लिए जिम्मेदार बनाया जाना चाहिए, जो बिना चेतावनी के ही पूरी तरह गलत साबित हो जाती हैं। अगर फ्रैंकलिन को फंड में वह फीस वापस डालने को कहा जाए, जो उसने इन छह योजनाओं से अर्जित की है तो इस कदम से फ्रैंकलिन और अन्य फंड हाउस निश्चित रूप से सीधे हो जाएंगे। वे उन रैकेट की पड़ताल करने को मजबूर होंगे, जो उनकी डेट फंड के इकाइयों के प्रमुख (जिन्हें जोखिम से दूरी बनाने वाले माना जाता है) चला रहे हैं। इससे अपने आप ही नियमन हो जाएगा। दूसरा नियामक को डेट फंड का वर्गीकरण फिर से करने की जरूरत है। जहां इक्विटी में 10 श्रेणी हैं, वहीं डेट में 16 श्रेणी हैं। हमें इतनी अधिक श्रेणियों की कोई जरूरत नहीं है। क्रेडिट रिस्क फंड और लॉन्ग टर्म डेट फंड जैसे कई फंड खुदरा निवेशकों को नहीं बेचे जाने चाहिए। इनकी बिक्री केवल कंपनियों को होनी चाहिए।

4. क्या फिर ऐसा हो सकता है? हां, निस्संदेह ऐसा हो सकता है। इसकी वजह यह है कि नियामक कभी समस्या की जड़़ तक नहीं पहुंचा है। फंड उद्योग की आमदनी उस कोष की एक निश्चित प्रतिशत है, जो वह संग्रहीत करता है। यह प्रोत्साहन की वजह से फंडों का मुख्य मकसद परिसंपत्ति एकत्रित करना बन जाता है और वे अन्य लोगों के पैसे के न्यासी होने की अपनी भूमिका को भूल जाते हैं। अगर उनकी फीस को प्रतिफल या अन्य किसी परिणाम से जोड़ दिया जाए तो उनके व्यवहार में बदलाव आएगा। मगर भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) इसके बारे में विचार तक नहीं कर रहा है।

5. ऐसी घटनाओं से बचने के लिए निवेशक क्या करें? पहले पैरा में जिन फंडों का जिक्र किया गया है, उन पर नजर डालें। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि वित्तीय पेशेवर भी यह नहीं बता पाएंगे कि ऐसे फंड कहां निवेश करते हैं और उनमें क्या जोखिम हैं। डेट निवेश वित्तीय पेशेवरों के एक छोटे समूह का विशेष अधिकार क्षेत्र है। मैं जिन बहुत से निवेशकों को जानता हूं, वे यह भी नहीं समझते हैं कि डेट योजनाओं पर फिक्स्ड इनकम स्कीम होने का मिथ्या ठप्पा लगा दिया जाता है। इससे निवेशकों को यह लगता है कि वे सावधि जमाओं के समान हैं। हकीकत में बहुत सी डेट योजनाओं में बड़े छिपे हुए जोखिम हैं।

यह सिद्धांत सीधा सा है कि पूंजी की सुरक्षा को सबसे अधिक अहमियत दी जानी चाहिए। आप इक्विटी में दांव लगाएं, डेट में कभी नहीं। इसलिए फिक्स्ड मैच्योरिटी प्लान, क्रेडिट रिस्क और डायनैमिक डेट को ना कहें। आपको अपना पैसा लगाने के लिए बचत खाते के एक विकल्प के रूप में केवल लिक्विड स्कीम रखनी चाहिए और संभव हो तो ये भी अल्पावधिक योजनाएं हों। निस्संदेह एक और महत्त्वपूर्ण कदम है। आपको पता लगाना होगा कि कौनसी लिक्विड या शॉर्ट टर्म डेट योजना ठीक है। यह पता लगाना किसी भी औसत निवेशक के लिए मुश्किल है। दूसरा विकल्प है कि ऐसा सलाहकार तलाशें, जिस पर भरोसा कर सकते हैं। आप देख सकते हैं कि यहां तक कि मेरे बुनियादी समाधान भी सरल नहीं हैं। ऐसे में समझा जा सकता है कि कि सेबी और फंड तंत्र ने आपके लिए फंडों की कार्यप्रणाली को समझना कितना पेचीदा बना दिया है।

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