बिजनेस स्टैंडर्ड - जोखिम भरा कदम
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जोखिम भरा कदम

संपादकीय /  April 28, 2020

आर्थिक नीति में ऑनलाइन खुदरा कारोबार के साथ लंबे समय से सौतेला व्यवहार किया जाता रहा है। देशव्यापी लॉकडाउन के दौरान यह तथ्य और अधिक स्पष्ट ढंग से उजागर हुआ। गत 24 मार्च से ऑनलाइन खुदरा कारोबार को नीतिगत निर्णयों के बेहद खराब संवाद का सामना करना पड़ा। यहां तक कि उनसे संबंधित एक अधिसूचना जारी करने के बाद उसे वापस ले लिया गया। निर्णय में यह बदलाव आम खुदरा कारोबारी संगठनों की लॉबीइंग के कारण लिया गया। समस्याओं की शुरुआत तो अचानक की गई देशव्यापी लॉकडाउन की घोषणा के साथ ही हो गई थी। विभिन्न राज्यों में पुलिस ने ऑनलाइन कंपनियों के डिलिवरी कर्मचारियों की पिटाई शुरू कर दी जबकि केंद्र सरकार ने आरंभ में ई-कॉमर्स कंपनियों को यह इजाजत दी थी कि वे अनिवार्य वस्तुओं की आपूर्ति करें। हालांकि राज्य सरकारों ने नीति को स्पष्ट किया लेकिन इसके बावजूद सीमा पर मनमानी जांच और पूछताछ के रूप मेंं पुलिस की प्रताडऩा जारी रखी। इससे डिलिवरी कर्मचारी हतोत्साहित हुए और उन्होंने काम पर आना बंद कर दिया। रोजगार पहले ही संकट में हैं और ऐसे में यह बात मुसीबत बढ़ाने वाली है।

लॉकडाउन का दूसरा चरण 3 मई तक बढ़ा दिया गया। इससे दिक्कतें और बढ़ गईं। प्रधानमंत्री ने 20 अप्रैल के बाद संक्रमण मुक्त क्षेत्रों में और सील किए गए इलाकों के बाहर चुनिंदा आर्थिक गतिविधियां शुरू करने की घोषणा की। गृह मंत्रालय ने एक अधिसूचना जारी करके कहा कि 20 अप्रैल से ई-कॉमर्स कंपनियां अनिवार्य और गैर अनिवार्य वस्तुओं की आपूर्ति शुरू कर सकेंगी। परंतु इससे एक दिन पहले गृह मंत्रालय घोषणा कर दी कि ई-कॉमर्स कंपनियों को उन वस्तुओं के निर्यात की इजाजत नहीं होगी जो अनिवार्य नहीं हैं। यह कब चालू होगी, इस बारे में कुछ भी स्पष्ट नहीं कहा गया। इससे ऑनलाइन खुदरा कारोबारियों मेंं असहजता पैदा हुई क्योंकि उन्होंने तैयारी शुरू कर दी थी।

अंतिम क्षणों में यह बदलाव इसलिए किया गया क्योंकि छोटे कारोबारियों की दो स्थापित संस्थाओं ने प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और रक्षामंत्री के समक्ष इसके लिए लॉबीइंग की। उनकी दलील यह थी कि खुदरा कारोबारियों ने पहले ही गर्मियों के लिए गैर जरूरी चीजों का स्टॉक एकत्रित कर रखा है और ऑनलाइन कंपनियों को कारोबार की इजाजत देने से उनको भारी नुकसान होगा। खुदरा कारोबारियों को जब-जब संकट महसूस होता है वे बराबरी का माहौल मुहैया कराने की यह दलील सामने रखते हैं। स्टॉक तैयार होने की मौजूदा दलील में इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं है कि अगर लॉकडाउन नहीं होता तो वे किस प्रकार प्रतिस्पर्धा करते? यह पहला मौका नहीं है जब ऑनलाइन कंपनियों के साथ ऐसा व्यवहार हुआ हो। उन्हें बार-बार कारोबारी नियमों में बदलाव का सामना करना पड़ता है। ऐसा ही एक मौका तब था जब देश के सबसे बड़े प्रत्यक्ष विदेशी निवेश सौदे के तहत वालमार्ट ने फ्लिपकार्ट में निवेश किया था।

गत वर्ष फरवरी में नए नियम प्रभावी हुए। इनके तहत कंपनियों को उन फर्म के माध्यम से उत्पाद बेचने से रोक दिया गया जिनमें उनकी शेयर हिस्सेदारी हो। उन्हें विक्रेताओं के साथ ऐसा सौदा करने से रोक दिया गया जिसके तहत वे अपने उत्पाद किसी खास ऑनलाइन विक्रेता के प्लेटफॉर्म पर बेचते थे। ये नियम आम खुदरा कारोबारियों पर लागू नहीं होते। सरकार ने आम खुदरा कारोबारियों के कहने पर ऑनलाइन कंपनियों की छूट देने की नीति की जांच शुरू की। आम कारोबारियों को यह वरीयता न केवल अतार्किक है बल्कि जोखिम भरा कदम भी है। अर्थव्यवस्था में रोजगार बढ़ाने, आपूर्ति मजबूत करने और देश को चीन का विकल्प बनाने की आवश्यकता है लेकिन ऐसे कदम उसमें मदद नहीं करेंगे। लॉकडाउन ने भी हमें यही दिखाया है कि दोनों तरह के कारोबार के बने रहने के पर्याप्त अवसर हैं। यह समय संरक्षणवादी संकेत देने के लिए उपयुक्त नहीं है।

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