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सुविचारित नीति दिलाएगी लॉकडाउन से निजात

अभीक बरुआ /  04 27, 2020

अर्थशास्त्रियों ने कोविड-19 के आर्थिक प्रभावों के बारे में खुलकर और नाराजगी के साथ अपनी बात कहनी शुरू कर दी है। इस बारे में यह दलील दी जा सकती है कि यह उनकी सलाह सुनने का उचित समय नहीं है। बल्कि इस समय सारी चीजें चिकित्सा समुदाय और महामारी विशेषज्ञों पर छोड़ दी जानी चाहिए। बहरहाल, कोविड के आर्थिक प्रभाव के बारे में सामने आ रही जानकारी कुछ दिलचस्प मसले उठाती है जिन पर सरकार को निर्णय लेना होगा। इस दौरान उसे ऐसी नीति बनानी होगी जो लोगों के जीवन और उनकी आजीविका बचाने पर जोर दे।

आइए देखते हैं इन विशेषज्ञों ने नीतिगत समस्याओं को किस तरह सामने रखा है। लॉकडाउन के दौरान सबसे प्रमुख बाधा श्रमिकों की आपूर्ति में आई दिक्कत की है क्योंकि इस दौरान 'सामाजिक दूरी' के नियम का पालन करना है। ऐसे में संक्रमण चक्र में ऐसा बिंदु तलाश करना होगा जहां श्रम शक्ति बिना किसी बाधा के उत्पाद गतिविधियां बहाल कर सके। जाहिर है, जांच का दायरा यथासंभव बढ़ाने की आवश्यकता है लेकिन सरकार इन आंकड़ों का इस्तेमाल आक्रामक रोकथाम नीति से निकलने में किस तरह कर सकती है?

देश की मौजूदा जांच नीति में दो कमियां हैं। पहली बात आईसीएमआर ने अब तक जितनी जांच की हैं वह भारत जैसी बड़ी आबादी वाले देश के लिए बहुत छोटा आंकड़ा है। बुनियादी ढांचा कमजोर होने के कारण जांच ऐसे लोगों तक सीमित है जिनमें लक्षण दिखाई दे रहे हैं या जो विदेश से आने वालों या संक्रमित लोगों के संपर्क में आए हैं। यह ऐसे लोगों के समूह में जांच करता है जिनमें कोविड-19 संक्रमण का खतरा बहुत अधिक है। जाहिर है यह सैंपल को लेकर अत्यधिक पूर्वग्रह दर्शाता है। इस तरह की जांच से नीति निर्माताओं को अंदाजा ही नहीं लग रहा है कि आबादी में संक्रमण किस हद तक फैला है। ऐसे लोग जांच से बाहर हैं जिनमे मामूली संक्रमण और लक्षण हैं। ऐसे में बीमारी से होने वाली मौत का भी सही अनुमान नहीं लग रहा।

इस अहम सूचना के अभाव में गृह मंत्रालय द्वारा चरणबद्ध तरीके से बाहर निकलने की नीति समझदारी भरी प्रतीत हो रही है। इसमें खास क्षेत्रों को आपूर्ति क्षेत्र के झटके से बचाने के लिए जरूरी आर्थिक मानकों की बात कही गई है। उदाहरण के लिए खानेपीने की चीजों की कमी। इसके अलावा कुछ हद तक रोजगार की वापसी की बात भी शामिल है। कृषि, विनिर्माण और मनरेगा के तहत काम इसमें प्राथमिकता वाले हैं। संक्रमण चक्र को रोकने के चिह्नित इलाकों में आर्थिक गतिविधियां रोकी जा सकती हैं और कामगारों के आवागमन को सीमित किया जा सकता है।

भविष्य में और अधिक क्षेत्रों को खोला जा सकता है। इससे तयशुदा ढंग से आर्थिक गतिविधियां आरंभ होंगी लेकिन इसमें कुछ दिक्कतें भी हैं। रोकथाम वाले इलाकों में आर्थिक गतिविधियों पर रोक आपूर्ति शृंखला को भी बाधित कर सकती है। हरित क्षेत्र में उत्पादन कार्यों से जुड़े लोगों की फैक्टरी या उन्हें कच्चा माल मुहैया कराने वाला अगर रेड जोन में आ जाता है तो उसे भी भी कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है।

भारत न केवल एकीकृत बाजार वाला देश है बल्कि हमारी उत्पादन प्रक्रिया भी एकीकृत है। कई क्षेत्रों में खुलापन लाने के लिए मौजूदा दिशानिर्देशों को संक्रमित बनाम सुरक्षित क्षेत्र का रुख अपनाना होगा और किसी वस्तु की उत्पादन शृंखला में तमाम बातों पर नजर डालनी होगी। बहरहाल अगर सरकार आपूर्ति शृंखला के बचाव के लिए अपनी नीति को शिथिल करती है तो संक्रमण की दर में इजाफा हो सकता है। तब नए सिरे से लॉकडाउन की परिस्थितियां बन सकती हैं।

क्या मध्यम अवधि में इसे करने का कोई बेहतर तरीका है? आर्थिक प्रभाव का आकलन करने वाले कुछ विचारोत्तेजक प्रश्न छोड़ते हैं? सरकार को किसी न किसी मोड़ पर तो संक्रमण को बढऩे देने का जोखिम उठाना ही होगा। ताकि हमारे कामकाजी तबके का प्रतिरक्षा तंत्र मजबूत हो सके और वे दोबारा कभी वायरस का हमला होने पर सुरक्षित हो सकें। क्या टीके अथवा प्रभावी उपचार की अनुपस्थिति में यही एकमात्र तरीका है?

जेम्स स्टॉक जैसे विद्वानों का कहना है कि कोविड के बिना लक्षण वाले मामले काफी अहम साबित हो सकते हैं। अगर ऐसे संक्रमण ज्यादा हुए तो हमारी श्रम शक्ति के बड़े हिस्से को काम पर लौटने की इजाजत दी जा सकती है। उस स्थिति में केवल बुजुर्गों और मधुमेह आदि बीमारियों के मरीजों को ही बचाने की आवश्यकता होगी। ऐसे में अगर संक्रमण के मामले बढ़ते भी हैं तो भी आर्थिक मोर्चे पर ज्यादा दिक्कत नहीं होगी। इस बीच बीमारी के शिकार लोगों में अपना मजबूत प्रतिरक्षा तंत्र विकसित हो जाएगा जो उन्हें दोबारा इसका शिकार होने से बचाएगा।

चीन का उदाहरण महत्त्वपूर्ण है। जानकारी के मुताबिक चीन में बिना लक्षण वाले संक्रमणों की तादाद 86 प्रतिशत है। हालांकि यह आंकड़ा चीन सरकार की ओर से जारी नहीं किया गया है लेकिन शायद इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि चीन सरकार में उत्पादन पर से प्रतिबंध हटाने का हौसला कहां से आया।

प्रथम दृष्टया यह मानने की पर्याप्त वजह है कि हमारे देश में बिना लक्षण वाले मामलों की तादाद अधिक होगी। जांच के मौजूदा आंकड़ों के आधार पर देखें तो संक्रमण की दर काफी कम है। प्रति 10 लाख आबादी में केवल 8 लोग इससे संक्रमित हैं। अमेरिका में यह दर 1,200, ब्रिटेन में 800 और चीन में 56 है। ऐसा कुछ हद तक मामलों के सामने न आने के कारण भी हुआ होगा। बहरहाल, अन्य अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में इतना अंतर तभी हो सकता है जब या तो बिना लक्षण वाले मामले ज्यादा हों या देश की आबादी वायरस को लेकर प्रतिरोधी हो।

बिना लक्षण वाले तर्क को आधार देने के लिए यह आवश्यक नहीं कि पूरी श्रमिक आबादी का परीक्षण किया जाए। ऐसा करना व्यावहारिक नहीं है। मजबूत सैंपलिंग करके भी इसका अच्छी तरह अनुमान लगाया जा सकता है।

पूरी बात का लब्बोलुआब यह है कि केवल परीक्षण की गति तेज करने की आवश्यकता नहीं है। बल्कि परीक्षण को और अधिक रैंडम यानी यादृच्छिक करना होगा। सरकार को जांच के लिए और अधिक वित्तीय आवंटन करना होगा। बिना परीक्षण वाली आबादी का अनुपात हासिल करने के लिए सैंपल सर्वे और उसके विश्लेषण को तेज करना होगा। शायद उच्च और बाधारहित वृद्धि पथ पर वापसी का यही एक तरीका है।

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