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सैन्य-असैन्य इस्तेमाल की दोहरी क्षमता विकसित करे सेना

दोधारी तलवार
अजय शुक्ला /  04 26, 2020

कोविड-19 महामारी ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर हमारे पारंपरिक आकलन को ध्वस्त कर दिया। थलसेना प्रमुख जनरल एम एम नरवणे ने 11 जनवरी को अपनी प्राथमिक चुनौतियों में सियाचिन ग्लेशियर की रक्षा, चीन सीमा पर बचाव, पाकिस्तान सीमा की रक्षा और उपद्रवी और आतंकी गतिविधियों से बचाव आदि को गिनाया था।

जब 4 मार्च को  कोविड-19 गति पकडऩे लगा तो जनरल ने कहा कि टैंक और लड़ाकू विमान जल्दी ही अप्रासंगिक हो जाएंगे और उनका स्थान नई तकनीक के लेजर और ऊर्जा आधारित हथियार ले लेंगे। आज सेना के तीनों अंगों का बड़ा हिस्सा कोविड-19 के चलते लॉकडाउन में है और यह स्पष्ट है कि रक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा की योजना बनाने वाले जिनका प्राथमिक दायित्व खतरे का अनुमान लगाना है, वे वैश्विक महामारी के बारे में अनुमान लगाने में चूक गए। ऐसी चूक करने वाले देश के योजनाकार अकेले नहीं हैं।

विश्व आर्थिक मंच ने 15 जनवरी को घटते क्रम में 2020 के 10 बड़े जोखिमों का अनुमान लगाया: मौसम में अतिरंजित बदलाव, जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक आपदाएं, जैवविविधता को नुकसान, मानवजनित पर्यावरण क्षति, डेटा से जुड़ी धोखाधड़ी और चोरी, साइबर हमले, जल संकट, वैश्विक स्तर पर शासन की विफलता और परिसंपत्ति का बुलबुला। इस सूची में संक्रामक बीमारियां शामिल नहीं थीं जबकि चीन इस संक्रमण से जूझ रहा था। आज कोविड-19 महामारी देश के समक्ष सबसे बड़ी सुरक्षा संबंधी, आर्थिक और सामाजिक  चुनौती है। तीनों सेनाएं अव्यवस्थित ढंग से कोविड-19 के खिलाफ देश के प्रयासों में लगी हुई हैं और रक्षा अर्थव्यवस्था का पूरा ध्यान वायरस से निपटने के लिए उपकरण तैयार करने पर केंद्रित है। चीन, जापान, ईरान और इटली जैसे देशों से भारतीयों को वापस लाना, क्वारंटीन सुविधाएं स्थापित करना, आईसीयू समेत चिकित्सा सुविधा का विकास और मरीजों के लिए वेंटिलेटर तैयार करना तथा रक्षा फैक्टरियों में चिकित्सा उपकरण बनाना जैसे काम किए गए। उत्तरी अमेरिका और यूरोप के तमाम देशों में ऐसा ही हो रहा है। उनके सशस्त्र बल ऐसी आपात परिस्थितियों के लिए विशिष्ट रूप से तैयार हैं। वे अप्रत्याशित हालात से निपटने के लिए लोगों और उपकरणों को तेजी से इधर-उधर कर सकते हैं।

सेना व्यवस्थित ढंग से संगठित है लेकिन उसमें इतना लचीलापन है कि वे आपात स्थितियों में काम कर सकें, भले ही कितना भी नुकसान हो रहा हो। विभिन्न सेनाओं के पास तमाम महंगी और उपयोगी परिसंपत्तियां हैं। उनके अपने चलित चिकित्सा विभाग होते हैं, पोतों पर तैरते हुए अस्पताल होते हैं, भारी परिवहन विमान और भारी इंजीनियरिंग विभाग होते हैं जो चंद रोज में अस्थायी अस्पताल बना सकते हैं तथा लॉकडाउन और क्वारंटीन लागू करने के लिए सैनिकों को यहां से वहां कर सकते हैं। युद्ध काल में आत्मनिर्भरता की दृष्टि से तैयार की गई सेना अन्य सरकारी शाखाओं से इतर हॉटस्पॉट के बीच तेजी से आवाजाही कर सकती हैं। कोविड-19 से निपटने में सेना पूरी तरह सक्रिय है। सबसे बड़ी चिंता आर्थिक मोर्चे पर है। रक्षा क्षेत्र के पास पहले ही सीमित फंड थे, अब उनकी भी तंगी हो सकती है। चालू वर्ष में जीडीपी वृद्धि दर के घटकर 0.4 फीसदी रह जाने की आशंका है। यदि लॉकडाउन बढ़ा या आगे दोबारा लगा तो यह दर ऋणात्मक भी हो सकती है।

यह लगभग तय है कि इस वर्ष का रक्षा पूंजी आवंटन कम किया जाएगा क्योंकि लॉकडाउन ने सरकार के राजस्व पर बुरा असर डाला है और सरकार पर उद्योग जगत तथा गरीबी रेखा के नीचे फिसलने वाले 10 करोड़ लोगों की मदद का दबाव है। रक्षा व्यय में कमी का बोझ पूंजीगत बजट व्यय करेगा क्योंकि फिलहाल वेतन और पेंशन में कमी नहीं की जा सकती। यदि सेना के किसी हिस्से में, नियंत्रण रेखा पर या फिर किसी नौसैनिक युद्धपोत अथवा पनडुब्बी पर कोविड-19 फैला तो वहां तैनात सभी जवानों को क्वारंटीन करना होगा और उनकी जगह नए जवान तैनात करने होंगे। इसके अलावा अवकाश से लौटने वाले सभी जवानों को 14 दिन के लिए क्वारंटीन होना होगा। कोविड-19 महामारी को भले ही नियंत्रित कर लिया जाए लेकिन सेना को प्राथमिक चुनौतियों पर लंबा विमर्श करना होगा।

अब मानवीय सहायता और आपदा राहत पर काफी जोर देना होगा। तीनों सेनाएं पारंपरिक रूप से बाढ़, भूकंप, चक्रवात और सूनामी के वक्त ऐसी सहायता करती रही हैं लेकिन उनकी यह भूमिका द्वितीयक रही है। आने वाले दिनों में सेना अगर दोहरे प्रयोग वाली परिसंपत्तियां निर्मित करे तो बेहतर होगा। इसमें पोत अस्पताल और पानी और जमीन पर चलने वाले वाहन शामिल हैं ताकि देश की 7,500 किलोमीटर लंबी तटरेखा और द्वीपीय क्षेत्रों की रक्षा की जाए।

सैन्य चिकित्सा कोर की क्षमता में सुधार करना होगा और ऐसे अस्पताल तैयार करने होंगे जिन्हें जरूरत पडऩे पर हवाई मार्ग से यहां से वहां ले जाया जा सके और चंद घंटों में उन्हें काम लायक बनाया जा सके। मझोले से भारी परिवहन के लिए विमान और हेलीकॉप्टर ज्यादा तादाद में जुटाने होंगे ताकि दूरदराज इलाकों में मदद आसानी से पहुंच सके। शांतिकाल में देश की सहायता के लिए परिसंपत्तियां तैयार करने के लिए और अधिक रक्षा बजट की जरूरत होगी।

ऐसी तमाम सैन्य परिसंपत्तियां देश की शक्ति प्रदर्शन आकांक्षा, क्षेत्रीय कूटनीति और हिंद महासागर में सुरक्षा प्रदाता की उसकी क्षमता को परिलक्षित करेंगी। महामारी की प्रकृति ऐसी है कि यह भारत को पाकिस्तान समेत दक्षिण एशिया क्षेत्र में पहुंच बढ़ाने का अवसर प्रदान कर रही है। ऐसे वक्त में जब भारत पाकिस्तान के बीच संवाद ठप है, तब प्रधानमंत्री मोदी की पहल के अनुसार साझा रुख अपनाना आकर्षक होगा। औषधि क्षेत्र में देश की क्षमता को देखते हुए बेहतर होगा कि हम इस अवसर को क्षेत्रीय सहयोग के लिए इस्तेमाल करें।

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