बिजनेस स्टैंडर्ड - शक्तिशाली केंद्र की वापसी का दौर!
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शक्तिशाली केंद्र की वापसी का दौर!

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  April 26, 2020

चार दशक के दौरान संघवाद के उभार ने देश को अधिक सुरक्षित बनाया लेकिन कोरोनावायरस के कारण यह स्थिति बदल रही है। मोदी की केंद्र सरकार ने एक बार फिर ताकत का स्वाद चख लिया है।

जब आपके आसपास पाखंड और ढोंग से भरी बातों की अति होने लगे तो आपको एक सच्चे पंजाबी की तरह सच बोलना पड़ता है, एकदम जैसा का तैसा। पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने गत सप्ताह ऐसा ही किया।

उन्होंने कोरोनावायरस के कारण हमारी व्यापक राष्ट्रीय राजनीति और शासन में आने वाले सबसे बड़े बदलावों को भी रेखांकित किया। वह बदलाव है 35 वर्ष की कमजोरी के बाद केंद्र की शक्तिशाली वापसी।

एक पंजाबी समाचार चैनल से बात करते हुए उन्होंने केंद्र सरकार द्वारा शराब की बिक्री पर देशव्यापी रोक लगाए जाने के एकतरफा निर्णय पर सवाल उठाए। उन्होंने पूछा कि शराब का कोरोनावायरस से क्या संबंध है? कोरोनावायरस संक्रमित व्यक्ति के थूक और बलगम से फैलता है। सरकार ने सब्जियां और फल बेचने की इजाजत दे दी है जबकि ये चीजें आसानी से थूक और बलगम के संपर्क में आ सकती हैं लेकिन सील लगी बोतल में बंद बियर की बिक्री पर रोक लगा दी गई जबकि वहां थूक और बलगम कोई आशंका नहीं।

अमरिंदर सिंह शराब पीते हैं लेकिन वह इसलिए शिकायत नहीं कर रहे हैं क्योंकि उनका बार खाली हो गया है या उन्हें शराब की कमी हो रही है। उनकी चिंता यह है कि राज्य का खजाना खाली हो रहा है। पारंपरिक रूप से अल्कोहल और पेट्रोलियम ईंधन दो ऐसी वस्तुएं हैं जिन पर राज्य सीधे कर लगा सकता है। पेट्रोलियम पर केंद्र ने पहले ही काफी कर लगा रखा है। ऐसा तब है जबकि वस्तु एवं सेवा कर लागू हो चुका है जहां राजस्व पहले केंद्र के पास जाता है और उसके पास राज्यों का हिस्सा उन्हें दिया जाता है। शराब पूरी तरह राज्य के दायरे में आती है। यही कारण है कि यह एकदम दिवालिया राज्यों के राजस्व का भी अहम जरिया है।

कोविड महामारी असाधारण उपायों और देशव्यापी प्रतिक्रिया की मांग करती है। मोदी सरकार ने 1897 का महामारी अधिनियम और 2005 का आपदा प्रबंधन अधिनियम लागू कर दिया ताकि उसे लॉकडाउन लागू करने के लिए जरूरी अधिकार मिल सकें और वह तय कर सके कि क्या खुलेगा और क्या बंद होगा। सरकार ने जिन गतिविधियों को प्रतिबंधित किया उनमें शराब की बिक्री प्रमुख थी। इससे पहले से दिवालिया राज्यों के लिए और संकट उत्पन्न हो गया। इतना ही नहीं इसने राज्यों को केंद्र के समक्ष पैसे के लिए हाथ फैलाने पर विवश कर दिया।

अन्य राज्यों के मुख्यमंत्रियों की भी यही शिकायत है लेकिन शराब के बारे में कोई बात नहीं करना चाहता। अमरिंदर सिंह ऐसे पाखंड में यकीन नहीं करते। अहम बात यह है कि आज सिंह को केंद्र के सामने उस अधिकार के इस्तेमाल की गुजारिश करनी पड़ रही है जो राज्यों के पास पहले से था। इसलिए हम कह रहे हैं कि कोरोनावायरस ने केंद्र की उस शक्तिशाली सत्ता की वापसी करा दी है जिसे हम सन 1989 में पीछे छोड़ आए थे। केंद्र की शक्तिशाली टीमें अलग-अलग राज्यों में जा रही हैं। वे ऐसा किसी बाढ़, चक्रवात या सूखे से हुए नुकसान के आकलन के लिए नहीं कर रही हैं बल्कि वे यह निगरानी और आकलन करने जा रही  हैं कि विभिन्न राज्य कोविड से कैसे निपट रहे हैं। यह भी कि वे केंद्र के आदेशों का पूरी तरह पालन कर भी रहे हैं या नहीं। ये टीम सवाल कर रही हैं, सूचनाएं मांग रही हैं और राज्य सरकारों को उलाहना भी दे रही हैं।

राज्य सरकारें बात मान रही हैं। शुरुआत करते हैं महाराष्ट्र से। शायद वह राज्यों में सबसे अधिक मित्रवत रहा है। राजस्थान का प्रदर्शन भी बेहतर रहा है। अब तक अवज्ञा करने वाला पश्चिम बंगाल भी साथ दे रहा है। केंद्र सरकार उसके चिकित्सकीय रिकॉर्ड मांग रही है, सभी मौतों की जांच कर रही है ताकि पता लग सके कि आंकड़ों से छेड़छाड़ तो नहीं कर रही।

पश्चिम बंगाल की सरकार को न केवल कई सवालों के जवाब देना पड़ रहा है बल्कि उनको आंकड़ों में संशोधन भी करना पड़ रहा है। गत गुरुवार और शुक्रवार के बीच राज्य ने मृतकों केे आंकड़े को बढ़ाकर 15 से 57 किया। ऐसा नहीं कि इतने सारे लोगों की रातोरात मौत हो गई। ये वे मृतक थे जो कोविड संक्रमित थे लेकिन उनकी मौत में अन्य बीमारियों का भी योगदान था।

हम इस बात को लेकर निश्चित नहीं हैं कि पश्चिम बंगाल के साथ ऐसा व्यवहार पहले कब हुआ था। 34 वर्ष तक वाम दलों के शासन में और उसके बाद ममता बनर्जी के शासन में वह अलग गणराज्य की तरह व्यवहार करता रहा है।

अगर आपको यह बदलाव अहम नहीं लगता तो याद कीजिए कि ममता बनर्जी प्रधानमंत्री की बैठकों में शामिल होने और मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक करने से इनकार करती रही हैं। उन्होंने हवाई अड्डे पर उनका स्वागत करने से इनकार कर दिया और उनके साथ शहर तक गाड़ी में आने से भी वह मना करती रही हैं।

अपनी पसंदीदा आईपीएस अधिकारी को सीबीआई से बचाने के लिए वह लड़ीं और जीतीं भी। यह पूरा बदलाव महामारी की वजह से और केंद्र द्वारा खुद को दी गई विशिष्ट शक्तियों की वजह से आया। इन अधिकारों को स्वीकारने की वजह आर्थिक है। लॉकडाउन के कारण सभी स्थानीय कारोबार बंद हैं, संपत्ति से जुड़े लेनदेन ठप हैं, पेट्रोल और डीजल की बिक्री नहीं हो रही है। शराब की बिक्री पर भी प्रतिबंध है यानी राज्यों के पास राजस्व का कोई जरिया नहीं है। वे पहले ही भारी घाटे से जूझ रहे हैं। अनेक राज्यों को जल्दी ही वेतन चुकाने मेंं भी दिक्कत होगी।

तीन दशक के कांगे्रस शासन, खासकर इंदिरा गांधी के कार्यकाल में हम केवल नाम के गणराज्य रहे। अधिकांश प्रांत कांग्रेस शासित थे और कोई मुख्यमंत्री डीएम या एसपी तक का स्थानांतरण करने से पहले केंद्र की सहमति लेते थे। कांग्रेस के मुख्यमंत्रियों को पार्टी प्रमुख हवाई अड्डे पर अंगुली के एक इशारे से पद से हटाया जा सकता था। सन 1990 में राजीव गांधी ने कर्नाटक के वीरेंद्र पाटिल को ऐसे ही हटाया था। विपक्षी सरकारों को हटाने के लिए वह अनुच्छेद 356 की मदद लेती थी।

आपातकाल के बाद इसमें कुछ बदलाव आया। सन 1980 में इंदिरा गांधी सत्ता मेंं वापस आगई हैं लेकिन पंजाब तथा कुछ अन्य राज्यों में स्वायत्तता की मांग ने उन्हें थोड़ा कमजोर किया। सन 1983 में उन्होंने केंद्र राज्य संबंधों की समीक्षा के लिए न्यायमूर्ति सरकारिया आयोग का गठन किया। मैंने उस पर खबर लिखी और इंडिया टुडे के लिए सरकारिया का साक्षात्कार किया। हालांकि इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के पास इतनी ताकत थी कि वह इसकी अवहेलना कर सकते।

कांगे्रेस का दबदबा समाप्त होने के साथ ही देश की राजनीति बदली। इन दशकों में भारत वास्तविक संघवाद की ओर बढ़ा और यह कारगर भी रहा। भारत अब समृद्ध या कहें कम गरीब है। आर्थिक वृद्धि दर निरंतर सुधरी है। कांग्रेस को एक डर हमेशा सताता रहा कि क्षेत्रवाद के उभार से देश टूट जाएगा। यह डरा निर्मूल साबित हुआ। देश में संघवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा और एकता का भाव साथ-साथ पनपा। यही वजह है कि आज भारत आंतरिक और बाहरी तौर पर ज्यादा सुरक्षित है।

अब इसे बदला जा रहा है। मोदी की कार्यशैली इसमें मददगार है। महामारी इसे उचित ठहराने की वजह बनी। ऐसा अमेरिका में भी हो रहा है। वहां रिपब्लिकन और डेमोक्रेट शासित राज्य संघीय फंड के लिए जूझ रहे हैं और ट्रंप को लगता है कि वे राज्यों को आदेश दे सकते हैं कि कब और कितना खोलना है। उन्होंने जॉर्जिया के रिपब्लिकन गवर्नर के 1 मई को बंदी खोलने के निर्णय को बदल भी दिया।

यह अस्वाभाविक समय है जो गुजर जाएगा। परंतु क्या ये बदलाव पलटे जा सकेंगे? अमेरिका में संस्थागत ढांचे अधिक मजबूत हैं। क्या हमारे यहां केंद्र वापस पुरानी व्यवस्था पर लौटेगा। हमारा राजनीतिक अतीत बहुत आशा नहीं जगाता।

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