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दर्शक बढ़ रहे लेकिन विज्ञापन संख्या में आ रही गिरावट

मीडिया मंत्र
वनिता कोहली-खांडेकर /  04 24, 2020

टेलीविजन दर्शकों के साप्ताहिक आंकड़े जारी करने वाली संस्था बार्क के मुताबिक लॉकडाउन लागू होने के बाद के चार हफ्तों में टीवी दर्शक 38 फीसदी बढ़े हैं। लेकिन दर्शक संख्या में इतनी उच्च वृद्धि के बावजूद विज्ञापनों की संख्या 26 फीसदी गिर गई है। हालांकि हमें यह बात ध्यान में रखनी होगी कि विज्ञापनों की संख्या के बजाय विज्ञापन मूल्य वृद्धि कहीं बेहतर संकेतक है। यह मार्केटिंग कंपनी या एजेंसी और मीडिया के बीच हुए करार पर निर्भर करता है। यह करार कई कारकों पर निर्भर करता है- उस चैनल या नेटवर्क की ताकत कितनी है, एजेंसी का विज्ञापन बजट कितना है, विज्ञापन का मकसद क्या है, उत्पाद किस तरह का है, लक्षित बाजार कौन है और तात्कालिक समय कैसा है?

आम तौर पर, अधिक विज्ञापन सेकंड वाले चैनल अपनी दरें सस्ती रखते हैं और उन्हें शायद ही मुनाफा होता है। समाचार चैनल इसी श्रेणी में आते हैं। दूसरी तरफ, कम विज्ञापन होने के े  बावजूद कुछ चैनलों का अर्जित राजस्व एवं मुनाफा दोनों ही अधिक होता है। बच्चों के चैनल इस दूसरी श्रेणी में शामिल हैं। मौजूदा संदर्भ में अगर विज्ञापनों की संख्या गिर रही है तो क्या इसका यह मतलब है कि विज्ञापन मूल्य में वृद्धि हुई है? वित्त वर्ष 2020-21 की पहली तिमाही के लिए विश्लेषकों ने देश के अग्रणी प्रसारकों में से एक ज़ी एंटरटेनमेंट के विज्ञापन राजस्व में 40 फीसदी की बड़ी गिरावट आने का अनुमान जताया हुआ है। लगभग इसी तरह का अनुमान सोनी, डिज्नी-स्टार, सन और वायकॉम18 के लिए भी लगाया गया है। इससे साफ है कि 62.7 करोड़ भारतीय इन दिनों रोजाना साढ़े चार घंटे से अधिक समय टीवी देखने में लगा रहे हैं लेकिन कंपनियों की नजर में अब वे सामान्य दिनों जैसे मूल्यवान नहीं रह गए हैं। इसकी वजह यह है कि घरों के भीतर रहने से वे जरूरी वस्तुओं के अलावा कुछ नहीं खरीद सकते हैं। वे न तो कारें, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण या वित्तीय सेवाएं खरीद रहे हैं और न ही कहीं घूमने या खाने-पीने जा रहे हैं। कोई भी ब्रांड ऐसे दर्शकों के लिए विज्ञापन क्यों देना चाहेगा?

अधिकता की इस समस्या से दो बातें साफ होती हैं। पहली, एक अर्थव्यवस्था जीडीपी और ब्याज दरों के आंकड़े भर नहीं होती, इसका ताल्लुक उन लोगों से है जो धन एवं वस्तुओं के सहज प्रवाह वाले एक देश में काम करते हैं, कमाते हैं, बचत करते हैं, खर्च करते हैं और निवेश करते हैं। यह कहता है कि स्वास्थ्य देखभाल, अर्थव्यवस्था और समाज कोई अमूर्त संकल्पनाएं न होकर किसी वर्षा-वन की तरह जीवंत एवं जिंदा पारिस्थितिकी है। अगर आपने इनमें से किसी के भी साथ गड़बड़ की तो सबकुछ अस्त-व्यस्त हो जाएगा।

भारत कोविड महामारी के पहले से ही आर्थिक सुस्ती के दौर से गुजर रहा था। वर्ष 2016 में हुई नोटबंदी के बाद से ही शुरू सुस्ती अब तक कायम  थी। ऐसी स्थिति में महामारी जैसे बड़े झटके को झेल पाने की ताकत हमारी व्यवस्था में बहुत कम ही बची है।

आर्थिक वृद्धि एवं गतिविधि और विज्ञापन के बीच बेहद सशक्त एवं सकारात्मक सह-संबंध है। और विज्ञापनों की संख्या एवं उनके मूल्य दोनों में आई गिरावट इसी बात को रेखांकित करती है।

दूसरी बात, अधिकतर महामारी-विशेषज्ञों का  मानना है कि कोरोनावायरस आखिर तक किसी देश की करीब 30-60 फीसदी आबादी को अपनी चपेट में ले चुका होगा। हालांकि इन संक्रमित लोगों में मरने वालों की दर वहां की जनांकिकी स्थिति और स्वास्थ्य देखभाल व्यवस्था पर निर्भर करती है। इसका मतलब है कि लॉकडाउन हटने के बाद भी संक्रमण का खतरा बना रहेगा और लोग सिनेमाघरों, विमानों, रेस्टोरेंट या किसी भी भीड़ वाली जगह पर जाने को लेकर सतर्कता दिखाएंगे। ऐसी स्थिति में शारीरिक दूरी रखना लंबे समय तक चलन में रहेगा, कम-से-कम इसकी वैक्सीन बनने तक। 

वैसे तमाम कारोबारों ने इस आकलन को देखते हुए अपनी तैयारी शुरू भी कर दी है। सिनेमाघरों के मालिक सीटों के बीच दूरी रखने की बात कर रहे हैं। दो लोगों के बीच में एक सीट खाली रखने की चर्चा है। ऐसा होने पर सिनेमाघरों की क्षमता घट जाएगी, उनके राजस्व में कमी आएगी और उसकी भरपाई के लिए टिकटों के दाम बढ़ाने पड़ेंगे। साफ-सफाई के बेहतर इंतजामों की लागत भी दाम बढ़ाने को मजबूर करेगी।

ऐसा नहीं है कि सिर्फ सिनेमाघर ही व्यवस्था बदलने की सोच रहे हैं, चर्चा अब मीडिया के हरेक माध्यम में होने लगी है। समाचारपत्र, टेलीविजन और रेडियो के दफ्तरों में भी बैठने के लिए इंतजाम दूर-दूर किए जाने की चर्चा है। इससे उत्पादकता पर असर पडऩे के साथ ही लागत भी बढ़ेगी और तमाम दूसरी समस्याएं पैदा होंगी।

जरा इस पर सोचें। टीवी चैनलों के दर्शक बढऩे की तरह ओवर-दी-टॉप (ओटीटी) प्लेटफॉर्म भी अपनी दर्शक संख्या में बढ़ोतरी के दावे कर रहे हैं। लेकिन दोनों के लिए राजस्व के सबसे बड़े स्रोत विज्ञापन तो लगातार कम ही हो रहे हैं। इसका क्या मतलब है? लगभग सभी टीवी एवं ओटीटी चैनलों में भुगतान का एक पहलू जरूर है। इसके अलावा दर्शकों की संख्या बढऩे से दर्शकों के व्यवहार एवं सैंपलिंग के लिए बड़ा आधार है जो रचनात्मक उत्पादों के लिए अच्छी बात है।

हालांकि फिल्म निर्माण स्टूडियो के बंद पड़े होने और फिल्म या सीरीज की शूटिंग न होने से दर्शकों की संख्या में यह तेजी कब तक बनी रहेगी? किसी टीवी चैनल या ओटीटी प्लेटफॉर्म को पुराने एवं नए कार्यक्रमों के बढिय़ा मेल की जरूरत है। रामायण या किसी अन्य लोकप्रिय कार्यक्रम के पुनर्प्रसारण से कुछ समय तो शोर होगा लेकिन आखिरकार उस प्रसारक या स्ट्रीमिंग ब्रांड को खेलकूद, फिल्मों या ड्रामा के नए कार्यक्रमों की जरूरत पड़ेगी। और इसके लिए एक ऐसे देश की जरूरत होगी जहां लोग काम कर रहे हैं, खरीद रहे हैं, खर्च कर रहे हैं और अपनी जिंदगी का लुत्फ उठा रहे हैं। ऐसा होने पर ही विज्ञापनदाता उनके पास पहुंचना चाहेंगे।

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