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एमएफ के चूक मूल्यांकन मानकों में ढील

जश कृपलानी / मुंबई 04 23, 2020


भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने कोविड महामारी से उपजे हालात में म्युचुअल फंड (एमएफ) उद्योग के मूल्यांकन मानकों को शिथिल कर मूल्यांकन एजेंसियों को अपवाद के तौर पर दर्ज करने की मंजूरी दे दी है। किसी कॉर्पोरेट बॉन्ड जारीकर्ता के लॉकडाउन के चलते या भारतीय रिजर्व बैंक (आरबाआई) की तरफ से किस्त भुगतान में दी गई छूट से परिसंपत्ति और देनदारी के बीच असंतुलन होने पर ऐसा होगा।

बाजार प्रतिभागियों के मुताबिक, महामारी की वजह से लागू लॉकडाउन में सेबी के इस कदम से डेट योजनाओं के पोर्टफोलियो पर मार्क-टु-मार्केट प्रभाव स्थगित करने में मदद मिलेगी। इसके अलावा गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) से संबंधित एमएफ कंपनियों को भी इससे राहत मिलने की संभावना है।

एक फंड प्रबंधन ने कहा, सेबी के इस फैसले से पोर्टफोलियो पर मार्क-टु-मार्केट प्रभाव कम करने में कुछ हद तक शुरुआती दौर में मदद मिलेगी। अब मूल्यांकन एजेंसियां इस बात को संज्ञान में रखेंगी कि आरबीआई से मिली मियाद की वजह से एनबीएफसी भुगतान में चूक कर रही हैं।

हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले के बाद भी परिचालन संबंधी कुछ चुनौतियां हो सकती हैं। एक फंड हाउस के वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, सेबी का परिपत्र यह भी कहता है कि एमएफ उचित मूल्यांकन के लिए जिम्मेदार बने रहेंगे। लिहाजा कुछ एमएफ कंपनियां अब भी आगे बढ़कर चूक के मामलों को बट्टे-खाते में डाल सकती हैं जबकि अन्य कंपनियां अलग रुख अपना सकती हैं। किसी भी एमएफ कंपनी के लिए यह नजरिया रखना खासा मुश्किल होगा कि भुगतान में चूक वाकई में लॉकडाउन या मोरेटोरियम के ही कारण हुई है। उन्होंने कहा कि ऐसे मूल्यांकन के चूक मूल्यांकन में नहीं जोड़े जाने पर एमएफ के उसे साइड-पाकेट में डालने को लेकर भी अस्पष्टता है।

एनबीएफसी पर दबाव इस वजह से भी बढ़ा है कि बैंक अपने कर्जदारों को मोरेटोरियम देने को लेकर अनिच्छा जता रहे हैं। इसके अलावा एनबीएफसी के उधार-पत्रों को लक्षित ऋण सावधि रीपो परिचालन (टीएलटीआरओ) के माध्यम से तरलता देने को लेकर भी आशंकित हैं।

गुरुवार को आरबीआई के टीएलटीआरओ के पहले हिस्से के लिए केवल 12,850 करोड़ रुपये की बोलियां लगीं जबकि केंद्रीय बैंक ने 25,000 करोड़ रुपये की पेशकश की थी।

सेबी ने एमएफ को राहत देने के लिए जारी परिपत्र में कहा है कि देशव्यापी तालाबंदी और किस्तों के भुगतान में तीन महीने की छूट को देखते हुए चूक के हरेक मामले को अलग आधार पर देखा जाएगा। 

बाजार नियामक ने कहा कि अगर भुगतान में देरी या परिपक्वता अवधि बढ़ाए जाने की स्थिति मोरेटोरियम देने के फैसले के कारण हुई है तो मूल्यांकन एजेंसियां उन्हें अपने मूल्यांकन में चूक के तौर पर न दर्ज करें। हालांकि मूल्यांकन नियमों में यह शिथिलता आरबीआई की तरफ से दी गई किस्त मियाद के साथ ही चलेगी।

हाल ही में ऋण-पत्रों के न्यासियों ने म्युचुअल फंड कंपनियों और अन्य बॉन्डधारकों की तरफ से सेबी से संपर्क कर मूल्यांकन मानकों में ढिलाई बरतने की मांग की थी। एक फंड प्रबंधक ने कहा, कुछ फंड हाउस इस बात को लेकर चिंतित थे कि डेट पोर्टफोलियो में मार्कडाउन होने से शुद्ध परिसंपत्ति मूल्य पर चोट पहुंचेगी जिससे निवेशकों में बेचैनी बढ़ सकती है।

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