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कोविड-19 ने छीन लिया तेल कीमतों में गिरावट का लाभ

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  04 23, 2020

कच्चे तेल की कीमतों में तेज गिरावट आ रही है। जनवरी के अंत में ब्रेंट क्रूड की कीमत 58 डॉलर प्रति बैरल थी। फिर यह 65 फीसदी गिरकर 20 डॉलर प्रति बैरल रह गई। कोविड-19 महामारी के कारण आर्थिक गतिविधियों में आई गिरावट के कारण ऐसा हुआ क्योंकि दुनिया के बड़े हिस्से में तेल की मांग बुरी तरह प्रभावित हुई है।

ऐसे में तेल निर्यातक देशों के समूह (ओपेक) ने उत्पादन में 10 फीसदी कटौती का जो प्रस्ताव रखा था वह भी बहुत प्रभावी नहीं होगा। यह कटौती मई से होनी थी। इस बीच अमेरिकी तेल वायदा गिरकर ऋणात्मक क्षेत्र में चला गया। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि लॉकडाउन की वजह से अमेरिका में भंडारण की क्षमता ही नहीं बची।

तेल बाजार की इन घटनाओं का भारत के लिए क्या महत्त्व है? आमतौर पर होता यह है कि जब भी तेल कीमतें घटती हैं तो भारत को लाभ होता है क्योंकि हमारी कुल खपत का 85 फीसदी तेल आयात होता है।

कोविड-19 और उसे नियंत्रित करने के लिए देश की अर्थव्यवस्था पर लगे लॉकडाउन के कारण यह शायद पहला अवसर होगा जब देश की अर्थव्यवस्था तेल कीमतों में गिरावट का लाभ नहीं ले पाएगी।

देश में पेट्रोलियम उत्पादों की खपत पहले ही बुरी तरह प्रभावित है। कई वर्षों में पहली बार देश में पहली बार पेट्रोलियम उत्पादों की खपत स्थिर बनी रही। गत वर्ष के 21.36 करोड़ टन के साथ इसमें 0.22 फीसदी की वृद्धि देखने को मिली।

सच तो यह है कि पेट्रोलियम उत्पादों की घरेलू खपत में मंदी की शुरुआत 2018-19 में ही हो गई थी। उस वर्ष यह केवल 3.4 फीसदी बढ़ी थी जो उससे पिछले वर्ष यानी 2017-18 के 6 फीसदी की तुलना में करीब आधी थी। परंतु 2020-21 में मंदी की गति यकीनन तेज रहेगी और कुल खपत की गति बढऩे के बजाय धीमी भी पड़ सकती है। अप्रैल के शुरुआती 15 दिनों में पेट्रोल-डीजल की खपत 60 फीसदी घट गई। अगर हम अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की भारत के लिए अनुमानित 1.9 फीसदी की आशावादी वृद्धि दर को स्वीकार कर लें तो मई के उत्तराद्र्ध में इसमें कुछ सुधार हो सकता है लेकिन खपत में बढ़ोतरी की गति धीमी बनी रहेगी।

तेल कीमतों में गिरावट के भारतीय अर्थव्यवस्था और सरकार की वित्तीय स्थिति पर पड़ रहे प्रभाव को लेकर कम से कम तीन व्यापक रुझान ऐसे हैं जो दिन पर दिन स्पष्ट होते जा रहे हैं।

पहला, भारत का तेल आयात बिल काफी कम हो सकता है। वर्ष 2019-20 में भारत का तेल आयात बिल 8 फीसदी घटकर 129 अरब डॉलर रहा। परंतु हम इससे लाभान्वित इसलिए नहीं हो सके क्योंकि देश का पेट्रोलियम उत्पाद निर्यात भी 8 फीसदी घटकर बमुश्किल 43 अरब डॉलर रह गया। यह रुझान इस वर्ष भी बरकरार रहेगा। यानी चालू खाते में कोई बहुत बड़ा लाभ होता नहीं दिख रहा।

दूसरा, सरकार का तेल राजस्व प्रभावित होगा। केंद्र पर उतना असर नहीं होगा क्योंकि पेट्रोलियम पर लगने वाले अधिकांश कर विशिष्ट होते हैं और उनका उत्पाद के मूल्य से कोई संबंध नहीं होता। इसका राजस्व अधिक प्रभावित होगा क्योंकि खपत कम हो रही है। सन 2019-20 के लिए तेल क्षेत्र का उत्पाद राजस्व 12 फीसदी कम होने का अनुमान है जबकि 2020-21 में 22 फीसदी वृद्धि हासिल करना लगभग असंभव होगा।

राज्यों के लिए पेट्रोलियम उत्पादों पर बिक्री कर का संग्रह और मूल्यवद्र्धित कर (वैट) अधिक प्रभावित होगा क्योंकि ये दरें उत्पाद मूल्य से संबद्ध हैं। राज्यों द्वारा तेल उत्पादों पर लगाए जाने वाले बिक्री कर या वैट के माध्यम से 2018-19 में करीब 2 लाख करोड़ रुपये का राजस्व हासिल हुआ। यह राशि उनके कुल कर राजस्व की 16 फीसदी थी। चूंकि कीमतों में कमी आई इसलिए आगे राजस्व और घटेगा। जाहिर है केंद्र और राज्यों के वित्त पर इसका बुरा असर होगा।

तीसरा, तेल रिफाइनरी और विपणन कंपनियों के लिए अपेक्षाकृत बेहतर समय है क्योंकि मार्जिन ज्यादा है। ध्यान देने वाली बात है कि भारतीय रिफाइनरियों के लिए कच्चे तेल के भारतीय बास्केट की कीमत फरवरी के 54 डॉलर प्रति बैरल से घटकर मार्च में 33 डॉलर प्रति बैरल होने के बाद भी मार्च के मध्य से पेट्रोल और डीजल का खुदरा बिक्री मूल्य शायद ही कुछ खास बदला। दिल्ली में एक महीने से पेट्रोल 69 रुपये प्रति लीटर की दर पर बिक रहा है जबकि डीजल का दाम 62 रुपये प्रति लीटर पर बना हुआ है।

अप्रैल में कच्चे तेल की कीमतों में और गिरावट आई इससे रिफाइनरी को और अधिक लाभ होगा। परंतु काफी संभव है कि तेल रिफाइनरों और और बाजारविदों को पूरा लाभ न मिले क्योंकि केंद्र सरकार उत्पाद शुल्क बढ़ा सकती है और तेल कंपनियों का लाभ राजकोष के खाते में जा सकता है। मार्च में सरकार ने ऐसा ही किया और राजकोषीय दबाव बढऩे पर वह दोबारा ऐसा कर सकती है।

सरकार ने पहले ही एक नया कानून पारित कर दिया है जिसके तहत वह पेट्रोल और डीजल पर मौजूदा 10 रुपये और 5 रुपये लीटर के उत्पाद शुल्क के अलावा विशेष तौर पर 8 रुपये का अतिरिक्त शुल्क लगा सकती है। चूंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें गिर रही हैं इसलिए ये अतिरिक्त शुल्क अंतिम बिक्री मूल्य में कोई अंतर नहीं डालेंगी। हालांकि सरकार को अधिक राजस्व मिलेगा और तेल रिफाइनरिंग कंपनियों का अतिरिक्त मार्जिन उनके हाथ से निकल जाएगा जो अन्यथा उनको मिलता।

संक्षेप में कहें तो कोविड-19 का अर्थव्यवस्था पर इतना गहरा असर हुआ है कि तेल कीमतों में भारी गिरावट जो आमतौर पर खुश होने की वजह बनती थी, वह भी सरकार के सामने चुनौतियां लेकर आई है।

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