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देश में नया सामाजिक समझौता आवश्यक

श्याम सरन /  April 23, 2020


कोविड-19 महामारी ने भारतीय अर्थव्यवस्था के उन छिपे कारकों को उजागर कर दिया है जिनमें संपत्ति और आय की असमानता गहरे तक छिपी है। यह सही है कि ऐसी गतिविधियां आर्थिक गतिविधियों के पहिये को चलाने के लिए जरूरी स्नेहक मुहैया कराती हैं। इससे तमाम इलाके और कारोबारी क्षेत्र सहजता से काम करते हैं। हमें यह दर्दनाक सच पता चला है कि हमारे उद्योग, कृषि, सेवा और यहां तक कि घरेलू कामकाज तक किस हद तक गरीब-प्रवासी कामगारों पर निर्भर हैं। ये वे लोग हैं जो अत्यंत कम दैनिक वेतन पर गुजारा करते है। उनके परिवार उनसे सैकड़ों मील दूर रहते हैं और उनके द्वारा भेजे जाने वाले पैसे की प्रतीक्षा करते हैं।

वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार देश की कुल आबादी में प्रवासी कामगारों की तादाद 36 प्रतिशत थी। आज यह तादाद और अधिक होगी। यह कामगार वर्ग ज्यादातर देश के बड़े शहरों में स्थित है जो देश की कुल आबादी का 30 फीसदी समेटे है। शहरी भारत में इसकी आबादी बहुत अधिक है।

बीते कुछ सप्ताह के दौरान लोगों का ध्यान उन प्रवासी श्रमिकों की समस्याओं पर केंद्रित रहा जो भूख, थकान और पुलिस हिंसा बरदाश्त करते हुए अपने घरों को लौट रहे थे। उन्हें भीड़भाड़ वाले गंदे स्थानों पर लॉकडाउन किया गया। परंतु एक अनकही बात यह है कि लोगों को पता चल गया है कि भारतीय अर्थव्यवस्था बिना इन वंचित, अद्र्धकुशल या अकुशल लोगों की मदद के नहीं चल सकती। उनके बिना खेतों में खड़ी पकी फसल नहीं काटी जा सकती। चूंकि देश का अधिकांश औद्योगिक उत्पादन छोटे और मझोले क्षेत्रों में होता है इसलिए इन प्रवासी श्रमिकों के न होने पर वह ठप हो जाएगा। चूंकि सेवा क्षेत्र मसलन वितरण और खुदरा क्षेत्र आदि में भी ऐसे ही श्रमिकों की प्रचुरता है तो उनकी अचानक अनुपस्थिति से ठहराव आना तय है।

ये प्रवासी आमतौर पर युवा हैं और अपने परिवारों और जीवनसाथियों से वे मोबाइल फोन के माध्यम से जुड़े रहते हैं। उन्हें आय की असमानता का सामना करना पड़ता है और उनके चारों और संपत्ति का जलवा बिखरा रहता है।

यह महामारी लगातार इस बात को उजागर कर रही है कि देश का आर्थिक अस्तित्व इन लोगों पर किस कदर निर्भर है। ये जिन शर्तों पर काम करते थे वे पूरी तरह नियोक्ताओं के पक्ष में थीं। उन्हें उनकी सेवाओं के बदले बहुत कम भुगतान किया जाता। परंतु अब ये शर्तें बदल सकती हैं क्योंकि अब यह स्पष्ट हो चुका है कि इन युवा प्रवासियों के बिना हालात कितने खराब हो सकते हैं। जब महामारी का असर कम होने लगेगा, तो हमें कुछ अहम मुद्दों का सामना करना होगा और उन्हें तत्काल हल करना होगा। मसलन सेवा शर्तें, उनके साथ होने वाला व्यवहार और उन्हें बेहतर भविष्य उपलब्ध कराने की बातें।

हमारे आरंभिक नीतिगत कदमों में इस बात का ध्यान नहीं रखा गया कि हमारे करोड़ों साथी नागरिक किस तरह संकटपूर्ण जीवन बिता रहे हैं। सामाजिक दूरी एक ऐसी चीज है जिसका लाभ अमीर और मध्य वर्ग के लोग ही उठा सकते हैं। वे कामगार नहीं जो छोटे-छोटे कमरों में बिना अपने परिवार के रहते हैं।

देशव्यापी लॉकडाउन की घोषणा करते वक्त दैनिक मजदूरों या ठेके पर काम करने वाले मजदूरों के बारे मेंं नहीं सोचा गया। ये लोग अगर काम न करें तो इनको भोजन तक नहीं मिल पाता। यही कारण है कि हजारों लोगों ने अवहेलना करके सैकड़ों किलोमीटर दूर अपने गांवों की ओर लौटना शुरू कर दिया। उन्हें शहरी लोगों से सहानुभूति और सहायता की कतई अपेक्षा नहीं थी। अब उन्हें पहले जैसी निराशाजनक शर्तों पर वापस लाना मुश्किल है।

इनमें बड़ी तादाद युवाओं की है जो गरीब हैं और गरीबी और निराशा के भंवर में हैं। वे ऐसी सामाजिक परिस्थितियां बना सकते हैं जिनके गहन राजनीतिक और आर्थिक निहितार्थ होंगे। ऐसे हालात में हिंसा की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। समझदारी का तकाजा यही है कि हम विभिन्न परिस्थितियों में सामने आने वाले विभिन्न परिदृश्यों पर विचार करें। अगर महामारी को शुरुआत में थामा जा सकता तो शायद कम गंभीर परिणाम होते। संकट लंबा खिंचा तो राज्य व्यवस्था प्रबंधन नहीं कर पाएगी। खासकर मौजूदा परिदृश्य में। अशांति को थामने के लिए उपाय किए जा सकते हैं लेकिन बेहतर होगा कि ऐसी खतरनाक स्थिति से बचाव के उपाय किए जाएं। इन बातों को देखते हुए हमें नया सामाजिक समझौता कायम करना होगा जो इन युवाओं और हमारी अर्थव्यवस्था के बीच की सहजीविता को स्वीकार कर सके। इसमें निम्र घटक शामिल किए जाने चाहिए:

केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर सरकार को उन्हें मौजूदा संकट से निजात दिलाने के लिए वित्तीय तथा अन्य सहायता की पेशकश करनी चाहिए। इस दौरान लालफीताशाही न्यूनतम होनी चाहिए। हालांकि लीकेज तो होगी ही। यह तय किया जाना चाहिए कि लॉकडाउन के दौरान महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम के तहत लोगों को बिना अपेक्षित काम किए भी धन मिल सके। मोबाइल और स्मार्ट फोन की मदद से लोगों को राहत पहुंचाने में मदद मिल सकती है।

सरकार को सभी स्तरों पर काम करते हुए चरणबद्ध तरीके से यह सुनिश्चित करने की दिशा में काम करना चाहिए कि प्रवासी श्रमिक उद्योग और सेवा क्षेत्र के साथ तालमेल कायम करके अपने-अपने कार्यस्थल पर लौट आएं। हो सकता है इनमें से कुछ इकाइयां बंद हों और दोबारा शुरू नहीं की जा सकें। अन्य इकाइयों को सरकारी मदद की आवश्यकता हो सकती है। यदि प्रवासी श्रमिक शहरी क्षेत्रों में लौटते हैं और उन्हें कोई काम नहीं मिलता तो हालात बहुत बुरे होंगे।

राज्य को यह प्रतिबद्धता भी जतानी चाहिए कि वह प्रवासी श्रमिकों को न्यूतनम वेतन और न्यूनतम काम सुनिश्चित कराएगा। उनका बीमा भी होना चाहिए। प्रवासी श्रमिकों के लिए आयुक्त जैसा सक्षम नियामक प्राधिकार होना चाहिए जो उनके हितों की रक्षा कर सके। राज्यों को भी ऐसे नियामक बनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

राष्ट्रीय कौशल मिशन का पुनर्गठन करके उसे इन श्रमिकों को नए कौशल दिलाने के काम में लिया जा सकता है ताकि उनकी आय और उनकी आजीविका बढ़ सके। इसे उनकी रोजगार शर्तों में शामिल किया जाना चाहिए।

यदि ऐसी व्यवस्था बनती है और बिना देरी के उसकी घोषणा की जाती है तो यह हमारी आबादी के एक अहम हिस्से की आशाओं को जिंदा रखेगा। इससे उनके कल्याण को लेकर राज्य और समाज की चिंता भी सामने आएगी और उनकी आकांक्षाओं को भी पर लगेंगे।

(लेखक पूर्व विदेश सचिव और सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के सीनियर फेलो हैं)

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