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कोरोना से टीकाकरण अभियान अटका

सोहिनी दास /  April 23, 2020

अंशिता खन्ना (बदला हुआ नाम) की तीन महीने की बेटी है। वह नवी मुंबई में रहती हैं और उनके आसपास कई बड़े कॉरपोरेट अस्पताल हैं। लेकिन अंशिता अपनी बेटी को नियमित जांच और टीकाकरण के लिए बाल रोग विशेषज्ञ के पास नहीं ले जा पा रही हैं। उन्हें डर है कि ऐसा करने से बच्ची कोरोनावायरस की चपेट में आ सकती है। बच्ची की नियमित जांच करने वाले डॉक्टर का क्लीनिक भी बंद है लेकिन उसने अंशिता को भरोसा दिया है कि जल्दी ही टीकाकरण का अभियान शुरू होगा।

खतरनाक बीमारियों से बचाव के लिए बच्चों में टीके लगाए जाते हैं और टीकाकरण की प्रक्रिया टेली-मेडिसन के जरिये संभव नहीं है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों को चिंता है कि भारत जैसे देश को इस प्रक्रिया से पीछे नहीं हटना चाहिए, अन्यथा देश में खसरा जैसी बीमारियां सिर उठा सकती हैं।

राजस्थान के 30 गांवों में किए गए एक सर्वेक्षण में चिंताजनक आंकड़े सामने आए हैं। देशभर में स्वास्थ्य और इलाज से संबंधित गतिविधियों के बीच समन्वय के लिए बनाए गए राष्टï्रीय प्लेटफॉर्म जन स्वास्थ्य अभियान (जेएसए) की सदस्य छाया पचौली ने कहा कि केवल मार्च में ही करीब 250 बच्चों को नियमित टीका नहीं लग पाया। 2011 की जनगणना के मुताबिक भारत में करीब 6.5 लाख गांव हैं। करीब 50 लाख बच्चों को मार्च में टीका नहीं लग पाया और अप्रैल में यह संख्या और बढ़ रही है। छाया ने कहा कि देश के दूरदराज के इलाकों में आशा कार्यकर्ता टीकाकरण अभियान चलाती हैं।

उन्होंने कहा, 'आशा कार्यकर्ता घर-घर जाकर बच्चों को टीका देती हैं और गांववालों को इसके लिए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र नहीं जाना पड़ता है। अब चूंकि कोविड-19 के प्रकोप के कारण आशा कार्यकर्ता इससे जुड़े कामों में व्यस्त हैं इसलिए यह व्यवस्था ध्वस्त हो गई है।' स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव और राष्टï्रीय स्वास्थ्य मिशन की मिशन डाइरेक्टर वंदना गुरनानी ने 20 अप्रैल को एक नोट में स्वीकार किया कि आशा कार्यकर्ताओं पर कोविड-19 का अतिरिक्त बोझ है। उन्हें लोगों को इस बारे में जागरूक बनाने और जांच तक उनकी पहुंच सुनिश्चित करने के अलावा गैर-कोविड-19 की जरूरी सेवाओं को भी देखना पड़ रहा है। गुरनानी ने राज्यों से आशा कार्यकर्ताओं को मासिक प्रोत्साहन का भुगतान करने का अनुरोध किया।

टीका बनाने वाली कंपनियों का कहना है कि जन्म के तुरंत बाद दिए जाने वाले टीकों (जैसे बीसीजी) को छोड़कर सारे टीके कोविड-19 के कारण प्रभावित हुए हैं। फाइजर लिमिटेड के प्रबंध निदेशक एस श्रीधर ने बिज़नेस स्टैंडर्ड से कहा, 'जन्म के तुरंत बाद दिए जाने वाले टीकों (बीसीजी) को छोड़कर सारे टीकों के प्रभावित होने की आशंका है। इंडियन एकैडमी ऑफ पीडिएट्रिशंस (आईएपी) ने हाल में अपने सदस्यों को कोविड महामारी के दौरान टीकाकरण की प्रक्रियाओं के बारे में दिशानिर्देश जारी किए हैं। आईएपी अपने सदस्यों को इस बारे में जागरूक करने के लिए वेबिनार का आयोजन कर रहा है।' श्रीधर ने कहा कि पूरी दुनिया में निजी-सरकारी साझेदारी से टीकाकरण को बढ़ावा देने वाली संस्था जीएवीआई की वेबसाइट में कहा गया है कि कोविड-19 महामारी के कारण टीकाकरण अभियान में देरी हुई है जिससे दुनिया से 13 गरीब देशों में कम से कम 1.35 करोड़ लोगों पर खसरा, पोलियो और ह्यूमन पैपिलोमावायरस (एचपीवी) जैसी बीमारियों का खतरा मंडरा रहा है। सीरम इंस्टीट्यूट के अदर पूनावाला ने कहा कि ढुलाई के समस्या के कारण टीके की मांग प्रभावित हुई है क्योंकि अधिकांश देश इसकी खरीद नहीं कर पा रहे हैं। उन्होंने कहा, 'कुछ देशों में स्वास्थ्यकर्मियों की कमी से ऐसा हो रहा है जबकि कुछ देशों में सीमाशुल्क और कार्गो से जुड़े लोग उपलब्ध नहीं हैं। हवाई सेवा भी बंद है और अधिकांश मांएं कोविड-19 के डर से अपने बच्चों को टीका लगाने के लिए नहीं ले जा रही हैं।'

अनुमानों के मुताबिक दुनिया के 65 फीसदी बच्चों को जिंदगी में सीरम इंस्टीट्यूट का कम से कम एक टीका लगता है। पूनावाला ने चेताया कि टीका नहीं लगाना स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा है क्योंकि दुनिया में कई बीमारियां कोविड-19 से भी ज्यादा खतरनाक हैं। उन्होंने कहा, 'सभी टीके लगाए जाने चाहिए, खासकर जन्म से दो साल की उम्र तक लगने वाले टीके लगाना बहुत जरूरी है। ये टीके इसलिए दिए जाते हैं ताकि बच्चे न्यूमोनिया, खसरा और रोटावायरस जैसी बीमारियों से दूर रहें। अगर टीकाकरण के सभी कार्यक्रम शुरू नहीं होते हैं तो इससे जन स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा पैदा हो सकता है। माताओं को बच्चों के क्लीनिक ले जाने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।' सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि टीकाकरण का अभियान फिर से शुरू करने के लिए एक दिशानिर्देश की जरूरत है।

पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया (पीएचएफआई) के अध्यक्ष के श्रीनाथ रेड्डी ने कहा कि फिर से टीकाकरण शुरू करने के लिए शहरी इलाकों में क्लीनिकों और ग्रामीण इलाकों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के लिए एक तय प्रोटोकॉल होना चाहिए। कुछ राज्य अपने प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को साप्ताहिक टीकाकरण शिविर आयोजित करने के लिए तैयार कर रहे हैं। गुजरात में राष्टï्रीय स्वास्थ्य मिशन के मिशन डाइरेक्टर जेडी देसाई ने कहा कि करीब 1400 ग्रामीण प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र हर हफ्ते शिविर का आयोजन कर रहे हैं जबकि पूरे राज्य में करीब 10,000 उपकेंद्र रोजाना शिविर लगा रहे हैं और नए लोगों को प्रशिक्षण दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह सब केंद्र सरकार के दिशानिर्देशों के मुताबिक हो रहा है।

पचौली ने कहा कि उन्होंने इस बारे में राजस्थान सरकार को पत्र लिखा है और वह राज्य में घर-घर जाकर बच्चों को टीके देने की प्रक्रिया फिर से शुरू करने के लिए मुख्यमंत्री को पत्र लिखेंगी। उन्होंने कहा, 'अगर मनरेगा का काम शुरू हो सकता है तो फिर टीकाकरण का काम शुरू क्यों नहीं हो सकता है।' हालांकि सरकारी सूत्रों का कहना है कि जल्दी ही देशभर में टीकाकरण अभियान शुरू करने के लिए परामर्श जारी किया जाएगा।

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