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एनबीएफसी को कर्ज देने से कतरा रहे बैंक

सुब्रत पांडा और अनूप रॉय / मुंबई April 23, 2020

ऐसा प्रतीत हो रहा है कि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की तमाम कोशिशों के बावजूद बैंक गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) को उधार देने के लिए तैयार नहीं हैं। हाल ही में आरबीआई ने छोटी एनबीएफसी की मदद के लिए संशोधित लक्षित दीर्घावधि रीपो परिचालन (टीएलटीआरओ) के तहत 25,000 करोड़ रुपये रकम की पेशकश की थी। लेकिन आरबीआई को आधी रकम के लिए ही बोलियां मिलीं। केंद्रीय बैंक ने अपने संशोधित टीएलटीआरओ में यह सुनिश्चित करने की कोशिश की थी कि आधी रकम छोटी एनबीएफसी की झोली में जाए।

बैंकों ने तीन वर्ष की अवधि की इस रकम के लिए कुल 12,850 करोड़ रुपये मूल्य की 14 बोलियां ही लगाईं। 9 अप्रैल को हुई नीलामी में भी 25,000 करोड़ रुपये की रकम थी मगर उसके लिए 1.14 लाख करोड़ रुपये कीमत की 18 बोली आई थीं। टीएलटीआरओ के पहले संस्करण में आरबीआई ने कोई शर्त नहीं लगाई थी। आरबीआई ने केवल 30 दिनों के भीतर रकम निवेश करने के लिए कहा था। बाद में यह समय सीमा बढ़ाकर 45 दिन कर दी गई।

दूसरे टीएलटीआरओ के तहत नीलामी के जरिये आरबीआई ने 50,000 करोड़ रुपये मूल्य की नकदी उपलब्ध कराने की बात कही थी। केंद्रीय बैंक ने कहा था कि इसकी आधी रकम छोटी एनबीएफसी को जानी चाहिए। यह शर्त इसलिए रखी गई क्योंकि इससे पहली नीलामी में 1 लाख करोड़ रुपये की टीएलटीआरओ राशि का इस्तेमाल बैंकों ने 'एएए-' रेटिंग वाली कंपनियों के बॉन्ड खरीदने में कर लिया। इनमें कुछ सरकारी कंपनियों के बॉन्ड भी शामिल थे। आम तौर पर शीर्ष रेटिंग प्राप्त कंपनियों को आपात रकम की जरूरत नहीं होती है। इस तरह आरबीआई का टीएलटीआरओ का मकसद पूरा नहीं हो पाया।

17 अप्रैल को दूसरे टीएलटीआरओ की घोषणा के वक्त आरबीआई ने साफ कर दिया था कि 10 प्रतिशत रकम का इस्तेमाल सूक्ष्म वित्त संस्थानों (एमएफआई) और 15 प्रतिशत रकम का इस्तेमाल 500 करोड़ रुपये आकार वाली एनबीएफसी द्वारा जारी प्रतिभूतियों में होना चाहिए। आरबीआई ने 25 प्रतिशत रकम का प्रावधान 500 करोड़ से 5,000 करोड़ रुपये के आकार वाली एनबीएफसी के लिए किया था।

सूत्रों के अनुसार निजी क्षेत्र के बैंक  दूसरे टीएलटीआरओ से दूर रहे हैं। एक विदेशी बैंक  में कॉर्पोरेट बैंकिंग एवं रिस्क प्रमुख ने कहा, 'बैंक इस समय जोखिम लेते नहीं दिख रहे। फिलहाल वे अपने पास अधिक से अधिक नकदी रखना और जोखिम से बचना चाहते हैं। इस तरह वे नई उधारी देने से बच रहे हैं।'


आईएलऐंडएफएस संकट के बाद मोटे तौर पर एनबीएफसी को लेकर बैंकों का रवैया नकारात्मक हो गया है। ईवाई में वित्तीय सेवा प्रुख अबिदजर दीवानजी ने कहा, 'जब तक बैंकों के मन से एनबीएफसी को लेकर जोखिम की आशंका कमजोर नहीं पड़ती तब तक टीएलटीआरओ से एनबीएफसी को विशेष मदद नहीं मिल पाएगी। कई लोग टीएलटीआरओ पर सवाल भी उठा रहे हैं। माइक्रोफाइनैंस इंस्टीट्यूशंस नेटवर्क (एमएफआईएन) में मुख्य कार्याधिकारी हर्ष श्रीवास्तव कहते हैं,'एनबीएफसी और एमएफआई को आवश्यक रकम मुहैया कराने के लिए टीएलटीआरओ सहज माध्यम नहीं था। एमएफआई, एनबीएफसी आदि को रकम देने के लिए आरबीआई 50,000 करोड़ रुपये सिडबी, नाबार्ड और एनएचबी को दे चुका है। उन्हें टीएलटीआरओ की बाकी रकम का इस्तेमाल ऐसे अखिल भारतीय वित्तीय संस्थानों को देने के लिए करना चाहिए था।'

एनबीएफसी क्षेत्र के अधिकारी कम बोलियों को लेकर विस्मित नहीं दिखे। बजाज फिनसर्व के प्रबंध निदेशक संजीव बजाज ने ट्वीटर पर लिखा,'एनबीएफसी एवं एमएफआई को रकम देने के लिए आरबीआई की पहल पर बैंकों ने केवल 50 प्रतिशत बोलियां लगाईं। जाहिर है, वे जोखिम बिल्कुल नहीं लेना चाहते हैं। आरबीआई को निश्चित तौर पर इन क्षेत्रों को सीधा नकदी समर्थन देना चाहिए और वित्त मंत्रालय को पहला नुकसान सहने का आश्वासन देना चाहिए। उन्हें छोटे लेकिन अर्थव्यवस्था के लिहाज से अहम इन ऋणदाताओं की मदद के लिए आगे आना चाहिए।'

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