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मुआवजे की तय राशि में दशकों तक नहीं होता इजाफा

अदालती आईना
एम जे एंटनी /  04 21, 2020

पिछले तीन साल में संसद ने अंग्रेजों के जमाने के करीब 1,500 कानूनों को तिलांजलि दी है। लेकिन कुछ पुराने कानून अब भी बदस्तूर जारी हैं। उदाहरण के लिए संपत्ति हस्तांतरण कानून की धारा 59 के मुताबिक जहां मूलधन 100 रुपये या उससे अधिक है, वहां गिरवी की प्रक्रिया रेहन रखने वाले व्यक्ति द्वारा हस्ताक्षरित और कम से कम दो साक्षियों द्वारा अनुप्रमाणित पंजीकृत लिखत के द्वारा ही की जाएगी। जिन मामलों में यह राशि 100 रुपये से कम है वहां गिरवी की प्रक्रिया पंजीकरण या संपत्ति के परिदान के द्वारा की जा सकती है। भारतीय दंड संहिता की धारा 510 के मुताबिक अगर कोई व्यक्ति नशा करके सार्वजनिक तौर पर दुव्र्यवहार करता है तो उस पर 10 रुपये का जुर्माना लगाया जा सकता है।

कानून के द्वारा कोई राशि तय करने से मुआवजे के दावों में न्याय करने में दिक्कत आती है क्योंकि रुपये की कीमत में निरंतर कमी आती है और केवल गिरावट की दर में बदलाव होता है। कानून बनाने वालों की कानून की हर धारा पढऩे में दिलचस्पी नहीं होती है और जो कुछ राशि उन्हें बताई जाती है, उस पर मुहर लगा देते हैं। किसी शराबी व्यक्ति को वर्ष 1860 में तय की गई जुर्माने की 10 रुपये की राशि देने में कोई दिक्कत नहीं होगी लेकिन इस कानूनी खामी से दुर्घटना के शिकार लोगों और बीमा कंपनियों को खासी परेशानी का सामना करना पड़ा है।

उच्चतम न्यायालय ने पिछले महीने कर्मचारी मुआवजा कानून से जुड़े एक मामले में फैसला दिया जिसमें एक बार फिर यह खामी उजागर हुई है। अदालत के सामने उस प्रावधान का सवाल था जिसमें रोजगार से होने वाली मौत का मुआवजा तय करने की दर निर्धारित की गई है। 26 साल के एक युवक की ड्यूटी के दौरान एक दुर्घटना में मौत हो गई थी। उसका मासिक वेतन 32,000 रुपये था। वर्ष 2008 में इस हादसे के समय जो कानून लागू था, उसके मुताबिक उसका अधिकतम वेतन 4,000 रुपये हो सकता था। इसलिए कानून के मुताबिक आयुक्त ने उसके आश्रितों को 4.33 लाख रुपये का मुआवजा दिया। अपील पर उच्च न्यायालय ने मुआवजे की राशि दोगुना कर दी क्योंकि तब तक वेतन का वैधानिक अनुमान बढ़ाकर 8,000 रुपये कर दिया गया था। मामला फिर उच्चतम न्यायालय में पहुंचा। शीर्ष न्यायालय का फैसला आने तक मुआवजे की गणना के लिए वेतन की सीमा बढ़कर 15,000 रुपये हो गई थी। लेकिन न्यायालय ने कहा कि दुर्घटना के समय मान्य वेतन ही लागू होगा। न बढ़ा हुआ मुआवजा मिलेगा और न ही वास्तविक वेतन। इस तरह मृतक के परिवार को एक-तिहाई मुआवजे में ही संतोष करना पड़ा। वकील की फीस चुकाने के बाद परिवार को कितना मिला होगा, इसका अंदाजा लगाना आसान है।

मनमाने ढंग से मुआवजा तय करने से संवेदनशील न्यायाधीश मोटर वाहन कानून के तहत सड़क दुर्घटनाओं से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई से अलग हो सकते हैं। यह कानून हिट ऐंड रन मामलों में मुआवजा तय करता है। इसमें दूसरी अधिसूची में एक टेबल भी है जिसमें मौत और विकलांगता की स्थिति में मुआवजे की राशि का उल्लेख किया गया है। इसे 1994 में शुरू किया गया था ताकि साक्ष्य और दुर्घटना के कारणों में गए बिना तत्काल राहत दी जा सके। लेकिन तबसे इसे संशोधित नहीं किया गया है। उच्चतम न्यायालय ने कई फैसलों में इसकी आलोचना की है क्योंकि इसमें कई खामियां हैं और यह खराब गणित का उदाहरण है। इस टेबल के मुताबिक मुआवजा तय करने से पीडि़तों को बहुत कम मुआवजा मिलता है। उदाहरण के लिए 15 साल के लड़के के आश्रितों को 40 हजार रुपये मिलेंगे। इससे तो कानूनी लड़ाई का खर्च भी नहीं निकलेगा। इससे उदार न्यायाधीश मृतक के आश्रितों की मदद नहीं कर पाएंगे।

रेलवे दुर्घटना एवं अवांछित घटना (मुआवजा) नियमों में 2016 में संशोधन किया गया। इसके तहत यात्री की मौत या विकलांगता के मामले में मुआवजे की रकम 4 लाख रुपये से बढ़ाकर 8 लाख रुपये कर दी गई है। इस कानून में भी एक टेबल है। कूल्हा टूटने की स्थिति में 1.6 लाख रुपये, पेल्विस में फ्रैक्चर पर 80 हजार रुपये, एक आंख जाने पर 2.40 लाख रुपये मुआवजे का प्रावधान है। ये आंकड़े कई वर्षों तक इसी स्तर पर बने रहेंगे लेकिन रुपये की कीमत समय के साथ कम जरूर हो जाएगी। लेकिन न्यायाधीशों को  वही मुआवजा देना होगा जो कानून में है। जिन कानूनों से इन कानूनों की उत्पत्ति हुई है, उनमें मुआवजे की राशि तय करने का काम न्यायाधीशों पर छोड़ दिया गया था। लेकिन जब सामान्य कानून के सिद्धांतों को संहिताबद्ध किया गया था तो कड़े कानूनों के कारण पीडि़तों की परेशानी शुरू हो गई। कानून का मकसद पीडि़तों को यथासंभव मूल स्थिति में रखना है। यह एक व्यर्थ प्रयास है लेकिन कानून बनाने वाले कम से कम लोगों के जीवन और अंगों की कीमत लगाने से परहेज कर सकते हैं।

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