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अर्थव्यवस्था को चाहिए और सरकारी सहयोग

आकाश प्रकाश /  04 21, 2020

सरकार ने कोविड-19 महामारी से निपटने में तेजी दिखाते हुए 21 दिन के देशव्यापी लॉकडाउन की जो घोषणा की उसके लिए वह सराहना की पात्र है। जिस समय पहले चरण का लॉकडाउन घोषित किया गया, भारत में बहुत कम मामले सामने आए थे लेकिन सरकार ने इटली में बीमारी के प्रसार से सबक लिया।

ऑक्सफर्ड विश्वविद्यालय और अन्य संस्थानों के स्वतंत्र आकलन में भारत के लॉकडाउन को किसी भी बड़ी अर्थव्यवस्था के लॉकडाउन में सबसे व्यापक और संपूर्ण करार दिया गया। अर्थव्यवस्था को बंद करने का यह कदम निर्णायक और बहादुरी भरा था। देश में अब तक लाखों के बजाय 10,500 के आसपास मामले हैं जो किसी चमत्कार से कम नहीं है। इसका श्रेय सरकार को जाना चाहिए।

सार्वजनिक स्वास्थ्य के मोर्चे पर सरकार ने निर्णायक कदम उठाए लेकिन आर्थिक मोर्चे पर वह दुविधा में रही। लॉकडाउन चाहे जब खत्म हो लेकिन आर्थिक स्थिति सामान्य होने में महीनों लग जाएंगे। माना जा रहा है कि इस वित्त वर्ष में हमारी वृद्धि दर दो फीसदी से ऋणात्मक दो फीसदी के बीच रहेगी। पहली तिमाही में जीडीपी दर 10 से 15 फीसदी ऋणात्मक रहेगी। मैंने आज तक इतने बुरे आंकड़े नहीं देखे। कारोबारी मुनाफा पूरी तरह समाप्त हो जाएगा। वैश्विक स्तर पर यूरोपीय संघ और अमेरिका में जीडीपी वृद्धि 5 से 9 फीसदी ऋणात्मक रहेगी। अमेरिका में बेरोजगारी दर के 20 फीसदी पहुंचने की आशंका है। वहां बीते तीन सप्ताह में 1.7 करोड़ लोग अपनी नौकरी गंवा चुके हैं। इस असाधारण समय में दुनिया भर के देश आर्थिक झटकों से बचने का प्रयास कर रहे हैं।

अमेरिका ने 2.2 लाख करोड़ डॉलर से अधिक के आर्थिक प्रोत्साहन पैकेज की घोषणा की है जो जीडीपी का 10 फीसदी है। आगे और प्रोत्साहन देने पर विमर्श जारी है। वित्त वर्ष 2020 में अमेरिका का वित्तीय घाटा जीडीपी के 19 फीसदी से अधिक हो सकता है। सिंगापुर जीडीपी के 12 फीसदी से अधिक का प्रोत्साहन दे चुका है। जर्मनी भी उधार लेकर खर्च करने की मंशा जता चुका है। ये तमाम उपाय केंद्रीय बैंकों द्वारा दरों में कटौती, वित्तीय तंत्र में नकदी सुनिश्चित करने और संपत्ति बाजारों की कॉर्पोरेट बॉन्ड, वाणिज्यिक पत्र के जरिये मदद करने के अलावा है।

महामारी से निपटने के लिए आर्थिक कदम उठाने के मामले में भारत अब तक रूढि़वादी रहा है। मौद्रिक नीति के मोर्चे पर आरबीआई सक्रिय रहा है। उसने दरों में कटौती की, नकदी बढ़ाई और अधिकांश ऋण को तीन महीने आगे बढ़ाया। ये सकारात्मक कदम हैं लेकिन अभी काफी कुछ किया जाना है।

राजकोषीय नीति से जुड़ी प्रतिक्रिया ने निराश किया है। हमने एक विराम के बाद जीडीपी के 0.8 फीसदी के बराबर की व्यय योजना पेश की। यह पैकेज छोटा है लेकिन निचले तबके पर लक्षित है जो इसे उचित बनाता है। परंतु वेतनभोगियों, छोटे और मझोले उपक्रमों के लिए कुछ नहीं कहा गया। सरकार को साहस दिखाना होगा।

वित्तीय बाधाओं के बावजूद जीडीपी के 4-5 फीसदी के बराबर का पैकेज आवश्यक है। खपत संबंधी व्यय होने के कारण यह मुद्रास्फीति को नहीं बढ़ाएगा। बल्कि वैश्विक लॉकडाउन मांग में व्यापक अपस्फीति की वजह है। अगर हम कृषि उपज का प्रबंधन कर लेते हैं तो हमें मुद्रास्फीति की चिंता नहीं करनी चाहिए। आज किसी कंपनी में क्रय शक्ति नहीं बची है।

निवेशक सरकार की किसी भी समयबद्ध योजना को रियायत देंगे। बशर्ते कि वह स्पष्ट रूप से खपत आधारित और पारदर्शी हो। आज दुनिया की हर बड़ी अर्थव्यवस्था इसी राह पर है। भारत ने न्यूनतम वित्तीय समर्थन की घोषणा की है। अर्थव्यवस्था को बचाने की हमारी कोशिश के लिए कोई दंडित नहीं करेगा।

आरबीआई को सरकार के ऋण कार्यक्रम का समर्थन करना होगा तभी इस स्तर का व्यय सुनिश्चित हो सकेगा। दुनिया के अधिकांश केंद्रीय बैंक ऐसा ही कर रहे हैं। एक बार आर्थिक स्थिति सहज होने के बाद हम और पारंपरिक राजकोषीय व्यवस्था की ओर बढ़ सकते हैं।

पैसे का इस्तेमाल प्रधानमंत्री जन धन योजना खातों और पीएम-किसान कार्यक्रम के माध्यम से प्रत्यक्ष नकदी हस्तांतरण के लिए करना चाहिए। इसके अलावा मनरेगा आवंटन बढ़ाया जाना चाहिए। हमें इन कार्यक्रमों के माध्यम से न केवल किसानों तक धनराशि पहुंचानी होगी बल्कि करीब 15 करोड़ असंगठित कर्मचारियों के हाथ में भी धन पहुंचाना होगा। करीब 5 करोड़ अनुबंधित और स्थायी कर्मचारी जो कॉर्पोरेट के पेरोल पर हैं उनके लिए सरकार को वेतन की सीमा तय करनी चाहिए। इससे व्यापक बेरोजगारी से बचा जा सकता है।

हमें एमएसएमई और एसएमई क्षेत्र तक ऋण की पहुंच भी सुनिश्चित करनी होगी। ऐसा करने का इकलौता तरीका हैं बैंक और गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियां। बहरहाल, अधिकांश बैंक ऋण का जोखिम लेने से बचेंगे क्योंकि वे हाल ही में एक कॉर्पोरेट ऋण चक्र से निपटे हैं। सरकार या आरबीआई को ऋण जोखिम का निर्णय कर्जदाता से दूर करना होगा। बिना ऋण के अनेक एसएमई और एमएसएमई खत्म हो जाएंगे। नोटबंदी, वस्तु एवं सेवा कर तथा एनबीएफसी के पतन के रूम में इन कंपनियों को हाल में कई बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। लॉकडाउन इस ताबूत में आखिरी कील साबित हो सकता है।

हमारी श्रमशक्ति का एक बड़ा हिस्सा उनके यहां रोजगारशुदा है और हम उसे यूंही नहीं छोड़ सकते। एमएसएमई और एसएमई की सामूहिक नाकामी की गहरी आर्थिक और मानवीय कीमत चुकानी होगी। एक विकल्प यह हो सकता है कि 12 से 18 महीनों के लिए सभी एमएसएमई और एसएमई के तमाम ऋण का परिसंपत्ति वर्गीकरण निलंबित कर दिया जाए। इससे उनके एनपीए होने का खतरा टल जाएगा और ऋण संबंधी जोखिम भी समाप्त होगा।

इन कार्यक्रमों का दुरुपयोग कम करने के लिए इनमें आगे सुधार किया जा सकता है लेकिन इन्हें तत्काल लागू करना होगा क्योंकि कंपनियों के बीच भय का माहौल है। भारतीय अर्थव्यवस्था व्यापक तौर पर असंगठित है। हमारा प्रति व्यक्ति जीडीपी कम है और सामाजिक सुरक्षा भी सीमित है। ऐसे में अर्थव्यवस्था के ठिठक जाने और मानवीय और सेवा संबंधी संपर्क ठप होने पर हम किसी भी झटके को लेकर बहुत संवेदनशील हो गए हैं।

आरबीआई को भी अभी काफी कुछ करना है। बहरहाल, लब्बोलुआब यह है कि और अधिक राजकोषीय समर्थन की आवश्यकता है और हमारे कदम केवल मौद्रिक नीति की ओर झुके नहीं रह सकते। समस्या के स्वास्थ्य संबंधी पहलू से निपटने में हमने साहस का परिचय दिया है। अब आर्थिक नीति निर्माण में भी वही साहस दिखाना होगा।

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