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भारत में कोविड के विस्तार की आशंका निराधार!

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  04 19, 2020

कोविड के दौर में हम फिल्मों की बात क्यों कर रहे हैं? खासतौर पर तब जबकि फिल्म का नाम भी आउटब्रेक या कंटेजियन नहीं है। बल्कि यह है सन 1992 में बनी क्लासिक, अ फ्यू गुड मेन।

फिल्म के जो संवाद सबसे अधिक चर्चित हैं उनमें से एक वह है जहां टॉम क्रूज का किरदार जैक निकोलसन के किरदार से सच बताने को कहता है। निकोलसन का किरदार कहता है, 'तुम सच बरदाश्त नहीं कर पाओगे।' निकोलसन का किरदार तो एक खराब और असुविधाजनक सच को छिपाने और उचित ठहराने का प्रयास कर रहा था लेकिन इस आलेख में हम इस दलील को उलटकर देखेंगे।  क्या हम आपके सामने वही प्रतिप्रश्न उठा सकते हैं कि कोरोनावायरस संकट के दौर में देश में हालात उतने बुरे नहीं हुए जितना कि शायद आपने सोचा होगा इसलिए आप सच का सामना नहीं कर पा रहे हैं? इसमें दो राय नहीं कि देश में हालात बहुत अच्छे नहीं हैं। पूरा देश बंद है, हमारे यहां लॉकडाउन अधिक कड़ाई से लागू है। इसके चलते आर्थिक गतिविधियां ठप हैं, रोजगार छिन रहे हैं और बड़ी तादाद में लोग प्रभावित हुए हैं। इसके बावजूद वैश्विक स्तर पर ढेर सारे लोगों को असहज करने वाला सच यह है कि भारत में इस बीमारी से लाखों लोग या कहें दसियों हजार लोगों की मौत नहीं हो रही है।

देश में शवों की भरमार नहीं है और अस्पतालोंं में बिस्तरोंं की कमी नहीं है। हमारे शवगृह और कब्रिस्तानों में लकड़ी या जगह की कमी नहीं है। देश में क्रिकेट के मैदान के आकार जितनी भी ऐसी जगह नहीं है जिसकी तुलना सन 1918 में फैली स्पैनिश फ्लू की महामारी से की जा सके।

इस अच्छी खबर को या कहें बुरी खबर की अनुपस्थिति को अंतरराष्ट्रीय समुदाय में और भारत में कई लोग सहजता से पचा नहीं पा रहे हैं। हम एन आर नारायण मूर्ति की समझदारी भरी बात का सहारा लें तो, 'हम ईश्वर में भरोसा करते हैं और बाकी आप सब आंकड़े लाने में।' कोविड-19 संकट पर भारत सरकार की रोजाना की ब्रीफिंग की यह कहकर आलोचना की जाती है कि वह अस्पष्ट है, उसमें सूचनाओं की कमी है और यह भी कि उसमें अफसरशाही शैली के बहाने किए जाते हैं। परंतु इससे आपको आंकड़े तो मिलते हैं। ऐसे में शंका की वजह है। ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूट की शमिका रवि इन आंकड़ों पर रोज नजर रखती हैं और जानकारीपरक चार्ट प्रकाशित करती हैं। उनका प्रमुख चार्ट दिखाता है कि कैसे 23 मार्च तक देश में संक्रमण की दर गति पकड़ चुकी थी लेकिन इसके बाद गिरावट आने लगी।

खासतौर पर तब जब अप्रैल के आरंभ में तबलीगी जमात वाले मामले लगभग पूरी तरह सामने आ गए। आंकड़े पहले तीन दिन में दोगुने हो रहे थे, फिर इसमें पांच दिन लगने लगे। तबलीगी मामले के बाद मामले चार दिन में दोगुने हुए और एक बार फिर आंकड़े पांच दिन में दोगुने होने लगे। उनके चार्ट के अनुसार अगर लॉकडाउन नहीं होता तो देश में संक्रमण मौजूदा स्तर से नौ गुना अधिक होता।

आप इस आकलन की वैधता पर सवाल उठा सकते हैं। क्या आप आधिकारिक आंकड़ों पर यकीन कर सकते हैं? हमारी तरह आपको भी बाहरी आंकड़ों की बाट जोहनी होगी। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक अब आंकड़े सात दिन में दोगुना बढ़ रहे हैं। यूरोपीय बीमारी नियंत्रण केंद्र की भी यही राय है। निराशावादियों के चहेते जॉन हॉपकिंस विश्वविद्यालय ने जिसके लोगो का इस्तेमाल करके कहा गया था कि लाखोंं लोग मारे जाएंगे, उसका कहना है कि देश मेंं कोविड के मामले आठ दिन में दोगुना हो रहे हैं।

मुझे अक्सर ऐसी बातें पढऩे को मिलती हैं कि भारत आंकड़े छिपा रहा है। यह भी कहा जाता है कि जल्दी ही भारत इस वायरस के सबसे खतरनाक शिकार के रूप में सामने आएगा और लाखों लोग मारे जाएंगे और तीसरी बात यह कही जाती है कि भारतीय मीडिया के लोग या तो मोदी सरकार को लेकर इतने आश्वस्त हैं कि सच नहीं बोल रहे या फिर वे भयभीत हैं। सच यह है कि हमारे तमाम संवाददाता उन आंकड़ों को संदेह से देख रहे हैं। वे साबित करना चाहते हैं कि सरकारी आंकड़ों में हेरफेर है और वे चीन और उत्तर कोरिया की तरह फर्जी हैं। लेकिन हमें अस्पतालों से या गैर भाजपा शासित राज्यों से भी ऐसा कोई तथ्य नहीं मिल रहा है।

एक आसान विकल्प है बीबीसी का अनुसरण करना। पिछले दिनों उसने एक खबर चलाई जो मुंबई के एक अज्ञात अस्पताल के दो अज्ञात चिकित्सकों के हवाले से थी। इसमें दावा किया गया कि श्वसन संबंधी बीमारियों से कई लोगों की मौत हो रही है लेकिन उनका या तो कोरोना परीक्षण नहीं हुआ या फिर उन्हें पीडि़त नहीं बताया गया। क्या वे ब्रिटेन या किसी अन्य देश के बारे में ऐसी खबर चलाएंगे? परंतु 'भूखे-नंगे' भारत में अगर कुछ लाख लोग न मरें तो खबर ही क्या? खासकर जब ब्रिटेन, इटली, स्पेन और अमेरिका में पहले ही हजारों मौत हो चुकी हैं। बशर्ते कि आप भी राष्ट्रीय अंकेक्षक जैसे न हों जो काल्पनिक राष्ट्रीय नुकसान को वास्तविक मान बैठते हैं।

सच्चाई इससे अलग है। मैं इस बात को लेकर कोई शर्त नहीं लगा रहा कि कल को खबर इससे बुरी भी हो सकती है। खासतौर पर लॉकडाउन खत्म होने के बाद लेकिन अभी ऐसे अनुमान नहीं लगाए जा सकते।

यह विश्व इतिहास की सर्वाधिक धु्रवीकृत करने वाली महामारी है। पहले तो इसलिए कि वायरस चीन से आया और चीन नहीं चाहता कि कोई इस बात का जिक्र भी करे। दूसरा इसलिए कि डॉनल्ड ट्रंप और बोरिस जॉनसन जैसे उदारवादी धड़े को नापसंद नेता इसके प्रबंधन में नाकाम रहे। तीसरा क्योंकि नरेंद्र मोदी इसके नेतृत्व में आगे आए हैं। ऐसे में इस बीमारी का ऐसा राजनीतिकरण हुआ कि क्लोरोक्विन जैसी 86 वर्ष पुरानी औषधि तक विवादों में आ गई। क्यों, क्योंकि ट्रंप ने यह औषधि मांगी और मोदी ने भिजवाई।

हो सकता है सारी कहानियां उतनी दिलचस्प न निकलें जितना आपने सोचा हो। भारत चाहे जितना गरीब हो लेकिन 2014 के बाद ऐसा भी नहीं हुआ है कि भारतीय मीडिया, नागरिक समाज और आम नागरिक मानसिक और आध्यात्मिक रूप से चीन या उत्तर कोरिया वाली स्थिति में पहुंच गए हों जहां उन्हें अपने ही देश के नागरिकों के मरने की कोई परवाह न हो। या वे अपनी सरकारों के इन दावों पर यकीन कर लें कि उनके यहां कोरोना का कोई मरीज नहीं है। मसलन हमने देखा कि वुहान में मौत के आंकड़ों को 50 प्रतिशत तक कम करके बताया गया था।

खेद की बात है कि पिछले कुछ समय में हमें वैश्विक प्रभावशाली तबके की अतियों का शिकार होना पड़ा। खासकर फाउंडेशन पोषित स्वास्थ्य माफिया की अतियों का। ऐसे लोगों को क्यों तवज्जो दी जाए जो देश में एचआईवी पीडि़तों की तादाद 57 लाख बताते हैं और कहते हैं कि यह बढ़ रही है। सन 2008 में लान्सेट में प्रकाशित शोध के बाद यूएनएड्स से लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन तक ने अपने आंकड़े सुधारे और इसे25 लाख किया यानी 128 फीसदी की गलतबयानी। तब से भारत के आंकड़ों में कमी आ रही है। चुपचाप संशोधन कर लिया गया, किसी ने इस गलती पर माफी तक नहीं मांगी।

कुछ जानेमाने भारतीयों ने शिकायत की। राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (नाको) के मुखिया रहे एसवाई कुरैशी ने 2005 में और इससे पहले 2002 में स्वास्थ्य मंत्री रहे शत्रुघ्न सिन्हा ने उस समय शिकायत की थी जब बिल गेट्स एड्स नियंत्रण के लिए 10 करोड़ डॉलर के अनुदान के साथ भारत पहुंचे और आशंका जताई कि 2010 तक भारत में एड्स के 2.5 करोड़ तक मामले हो सकते हैं। तब दोनों शिकायतों की अनदेखी कर दी गई।

उस अनुदान का लाभ हमारे अफसरशाहों, स्वास्थ्य सेवा से जुड़े लोगों, स्वयंसेवी संगठनों सभी ने उठाया। उन्होंने जो नुकसान पहुंचाया वह दार्शनिक नहीं बल्कि हकीकत था। भारत में एड्स के हॉलीवुडीकरण ने वे संसाधन छीन लिए जो वास्तविक मसलों पर व्यय हो सकते थे। टीबी की बीमारी इसका एक उदाहरण है।

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