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अगली पीढ़ी को ध्यान में रख अंजाम देने होंगे सुधार

जिंदगीनामा
कनिका दत्ता /  04 19, 2020

सैकड़ों मील दूर अपने पुश्तैनी घरों की ओर वापस लौट रहे प्रवासी श्रमिकों का जो हुजूम बस अड्डों, मुंबई के बांद्रा उपनगरीय स्टेशन और गुजरात के सूरत में एकत्रित हुआ, उसके बारे में ध्यान देने वाली बात यह है कि वे अपेक्षाकृत युवा हैं।

ये युवा घर से काम करने वाले मध्यवर्गीय युवाओं के विपरीत बेरोजगार होने पर मजबूर हैं। भले ही ये युवा उम्र के लिहाज से इस महामारी के सबसे कम जोखिम वाले वर्ग में आते हों लेकिन वे इसके सबसे बड़े गैर चिकित्सकीय पीडि़त हैं।

विडंबना है कि उनका भविष्य काफी हद तक बड़ी पूंजी के प्रबंधकों और मालिकों पर निर्भर करता है। वह उन नीति निर्माताओं पर भी निर्भर करता है जो इस महामारी में उच्चतम जोखिम वाली श्रेणी में आते हैं।

इसे इस तरह समझते हैं कि देश की 10 बड़ी कंपनियों के सीईओ की औसत आयु 57.6 वर्ष है। इनमें से अधिकांश 1950 के दशक के आखिरी या 60 के दशक के शुरुआती दौर में हैं। केवल टीसीएस के सीईओ 49 वर्ष के हैं। प्रधानमंत्री की उम्र 69 वर्ष है और पद संभालते समय वह देश के पिछले छह प्रधानमंत्रियों में तीसरे सबसे युवा प्रधानमंत्री बने थे। उनकी कैबिनेट के तीन बड़े मंत्री और पीएमकेयर्स महामारी न्यास के न्यासी अमित शाह (55), निर्मला सीतारमण (60) और राजनाथ सिंह (68) की उम्र के हैं। राज्यों के मुख्यमंत्री अपेक्षाकृत युवा हैं लेकिन उतने भी नहीं। अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू की उम्र 40 वर्ष है और वह सबसे युवा हैं।

लाखों श्रमिकों और उनका प्रबंधन करने वालों के बीच उम्र का यह अंतर अपेक्षित ही है क्योंकि श्रमिकों को मेहनती काम करने होते हैं। परंतु लॉकडाउन के दौरान जिस तरह वे अचानक सड़कों पर आए उससे उनकी दयनीय स्थिति सामने आई और देश के भविष्य से जुड़े कठिन सवाल भी। मीडिया का भी शुक्रिया कहा जाना चाहिए क्योंकि उसकी उपस्थिति ने प्रशासन को मजबूर कर दिया कि वे कम से कम इस श्रमिक वर्ग की तात्कालिक जरूरतों को पूरा करें। परंतु राजनेताओं को लंबी अवधि के दौरान उनके भविष्य के बारे में सोचना होगा। अर्थव्यवस्था महामारी के आने के पहले ही लडख़ड़ा रही थी और अब यही संकेत निकल रहा है कि अर्थव्यवस्था पहले की तरह नहीं चल सकती।

यह कोई स्थायी विकल्प नहीं है कि लाखों प्रवासी श्रमिकों को कठिनाई भरे ग्रामीण जीवन में छोड़ दिया जाए और जब रोजगार के अवसर तैयार हों तो वापस उनकी जरूरत महसूस की जाए। वर्ष 2011 की जनगणना बताती है कि देश की आबादी में आंतरिक प्रवासियों की हिस्सेदारी 37 फीसदी है जबकि 2001 में यह 30 फीसदी थी। अगर यह मान लिया जाए कि बीते नौ वर्ष के दौरान भी यही रुझान जारी रहा होगा तो यह सोचना भी हृदय विदारक है कि देश की आबादी का इतना बड़ा हिस्सा इतनी निराशा में दिन बिता रहा है और सरकार के उपकार पर निर्भर है। मोबाइल फोन से उपजी सोशल मीडिया क्रांति जिसने सोमवार को बांद्रा स्टेशन पर भीड़ एकत्रित करने में मदद की, दर्शाती है कि प्रवासियों को अपनी अनौपचारिक शक्ति का अंदाजा है। यह शक्ति बहुत आसानी से व्यापक सामाजिक अशांति का कारण बन सकती है।

अर्थशास्त्रियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की तात्कालिक और तार्किक प्रतिक्रिया यह रही कि सरकार ने जो मामूली पैकेज घोषित किया है, उससे परे जाकर इनकी मदद की जाए। परंतु यह अस्थायी निदान हो सकता है। मेरा मानना है कि इन प्रवासी श्रमिकों की क्षमताओं के इस्तेमाल में बड़ा अवसर छिपा है। वर्ष 2021 से 2031 के बीच हर वर्ष देश की श्रमिक आबादी में शामिल होने वाले 97 लाख लोगों (आर्थिक समीक्षा के अनुसार) के साथ भी यही लाभ जुड़ा हुआ है।

महामारी का यह संकट हमारे राजनीतिक नेतृत्व को अवसर मुहैया कराता है कि हम अगली पीढ़ी के सुधारों की बुनियाद रखते समय पात्रता योजनाओं से परे सोचें। एक अहम घटक है दक्षिण-पूर्वी एशियाई मॉडल का अनुसरण करना। इसके तहत न केवल प्राथमिक और द्वितीयक स्तर की शिक्षा के साथ औद्योगिक प्रशिक्षण का भरपूर विस्तार करना होगा बल्कि यह भी सुनिश्चित करना होगा कि इसमें एक मानक स्तर की गुणवत्ता सुनिश्चित हो और सालाना प्रथम अंकेक्षण उतना निराश करने वाला न रह जाए जितना कि वह अभी नजर आ रहा है। इसके साथ ही राजनेताओं को भी छोटे और मझोले उपक्रमों के लिए बनने वाले कारोबारी सुगमता मानकों की पुरानी समस्या को गंभीरता से लेकर हल करना होगा। छोटे और मझोले उपक्रम बाहरी और आंतरिक झटकों को लेकर काफी संवेदनशील होते हैं। नोटबंदी, वस्तु एवं सेवा कर को लागू करने में की गई हड़बड़ी और उसके बाद अब कोविड-19 महामारी ने इस क्षेत्र को बुरी तरह प्रभावित किया है।

यह संभव है कि प्रवासी श्रमिकों और उनके परिजन को सही उपायों और प्रोत्साहन की मदद से एक अलग भविष्य दिया जा सके। आखिर चीन की कृषक अर्थव्यवस्था ने सन 1977 के बाद तमाम उद्यमियों का उभार देखा। स्टार्टअप और एसएमई युवाओं के कारोबार हैं और असली सशक्तीकरण उनके माध्यम से ही हासिल हो सकता है। एक सूचकांक के रूप में देखें तो ई-कॉमर्स भारतीय अर्थव्यवस्था का सबसे जीवंत क्षेत्र रहा है और इस क्षेत्र की 10 सबसे बड़ी कंपनियों के सीईओ / संस्थापकों की औसत आयु 41 वर्ष है। यह पुरानी अर्थव्यवस्था के उनके समकक्षों से 16 वर्ष कम है। यह कल्पनातीत है कि सही अवसर मिलने पर 45 करोड़ की प्रवासी आबादी के बीच कोई सचिन या बिन्नी बंसल या विजय शेखर शर्मा नहीं निकलेगा। जाहिर है इससे ऐसे काम में श्रमिकों की कमी हो जाएगी जो अधिकांश लोग नहीं करना चाहते। परंतु इससे प्रवासियों की तादाद और अधिक बढ़ेगी। परंतु वह एक अलग किस्सा है।

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