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कोरोना के खिलाफ जंग के जमीनी लड़ाके

वीनू संधू /  April 17, 2020

पिछले कुछ हफ्तों से मनीषा घुले और करीब 30 महिलाओं की उनकी टीम पूरे दिन केवल तीन से चार घंटे ही सो पा रही है। गन्ना काटने वाले मजदूर हर साल काम की तलाश में कर्नाटक और पश्चिमी महाराष्ट्र का रुख करते हैं लेकिन इस बार वे बीड के अपने गांवों को लौट चुके हैं। महाराष्ट्र के इस इलाके में बार-बार सूखा पड़ता है और मनीषा यहीं काम करती हैं। कोविड-19 महामारी के प्रसार को रोकने के लिए जब लॉकडाउन की घोषणा हुई तो ये मौसमी प्रवासी मजदूर आननफानन में अपने गांवों को लौट गए। राज्यों की सीमाएं सील हो रही थी लेकिन इसके बावजूद वे गांवों की ओर लौटने में सफल रहे। गांवों में कई लोग ऐसे भी थे जिन्हें लगता है कि ये मजदूर अपने साथ वायरस लेकर आए हैं।

बीड में महिलाओं के स्वास्थ्य अधिकारों के लिए काम करने वाली मनीषा अब इन प्रवासी मजदूरों को राशन, रोजमर्रा की जरूरी चीजें, साफ-सफाई की वस्तुएं और परामर्श मुहैया कराने में लगी हैं। वह करीब 300 गांवों में 5,000 से अधिक परिवारों तक इन चीजों को पहुंचाने में मदद कर रही हैं।

बीड से करीब एक हजार किलोमीटर दूर राजस्थान के टोंक जिले में रमा शर्मा खानाबदोश बंजारा, मदारी और कलंदर जनजातियों से जुड़े लगभग 300 परिवारों के लिए यही काम कर रही हैं। वह और उनकी टीम इन परिवारों को राशन, मास्क और सैनिटाइजर वितरित करने के अलावा कोविड-19 वायरस के बारे में भी जानकारी दे रही है जिसने पूरी दुनिया की रफ्तार को थाम लिया है। यह टीम घूमंतू जनजातियों के इन परिवारों को समझा रही है कि क्यों बार-बार हाथ धोना चाहिए, चेहरे को छूने से क्यों बचना चाहिए और सैनिटाइजर का कब और कैसे इस्तेमाल करना है। अब तक उनकी रोजमर्रा की जिंदगी में दूर-दूर तक इसकी कोई जगह नहीं थी।

मनीषा और रमा जमीनी स्तर पर उस विशाल नेटवर्क का हिस्सा है जिसे सीआईआई फाउंडेशन ने बनाया है। भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) ने पूरे देश में विकास गतिविधियों के लिए 2011 में इसकी स्थापना की थी। इस नाजुक समय में यह मजबूत नेटवर्क ग्रामीण और हाशिये पर पड़े समुदायों को मदद पहुंचाने और मानसिक सहारा देने में काम आ रहा है। इनमें से कई लोगों की आजीविका बंद हो गई है और उनके लिए परिवार पालना मुश्किल हो रहा है। सीआईआई गुजरात से लेकर त्रिपुरा और जम्मू कश्मीर से लेकर तमिलनाडु तक 26 राज्यों में काम कर रहा है। अब तक वह इन इलाकों में करीब 20 लाख लोगों तक तैयार भोजन, राशन और साफ-सफाई से जुड़ा सामान पहुंचा चुका है।

साथ ही गांवों और उपेक्षितों को कोविड-19 के बारे में जागरूक किया जा रहा है। इस वायरस से बचने और इसके प्रसार को रोकने के लिए यह बेहद अहम है। उदाहरण के लिए केवल सीआईआई फाउंडेशन ही सात राज्यों में कोविड-19 से जुड़ा राहत का काम कर रहा है। साथ ही वह खानाबदोश जनजातियों, खेतों में काम करने वाली महिला मजदूरों, दिहाड़ी मजदूरों और गरीब तथा उपेक्षित मुसहर समुदाय को इस बारे में जागरूक कर रहा है। सीआईआई के महानिदेशक चंद्रजित बनर्जी ने कहा, 'इन सभी उपायों और प्रयासों के लिए हमारी सदस्य कंपनियों ने फंड मुहैया कराया है। वे नकद या दूसरे तरीकों से इसमें मदद कर रही हैं। सीआईआई अपनी व्यापक मौजूदगी और नेटवर्क से जमीनी स्तर पर बदलाव लाने में मदद कर रहा है।'

ये प्रयास इसलिए कारगर हो रहे हैं क्योंकि जो इन कामों में लगे हैं वे उन्हीं इलाकों के लोग हैं, स्थानीय भाषा बोलते हैं और लोग उन पर विश्वास करते हैं। उदाहरण के लिए संदीप कुमार हरियाणा के सिरसा जिले में एक किसान सहकारी संस्था के सदस्य हैं। इस संस्था का गठन सीआईआई फाउंडेशन ने पराली जलाने की समस्या से निपटने और फसल अवशेष प्रबंधन के लिए 2019 में किया था। चूंकि इसके सभी सदस्य किसान और स्थानीय किसान समुदाय के प्रतिनिधि हैं, इसलिए वे गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों और खेतिहर मजदूरों को अच्छी तरह जानते हैं जिन्हें लॉकडाउन के बाद राशन और अन्य जरूरी चीजों की बेहद जरूरत है। वे न केवल जागरूकता बढ़ाने और राशन किट के वितरण में मदद कर रहे हैं, बल्कि समुदाय की स्थिति के बारे में सही जानकारी भी मुहैया करा रहे हैं। इससे सीआईआई को गांववालों की जरूरत के हिसाब से अपनी राहत की रणनीति बनाने में मदद मिल रही है।

कुमार ने कहा, 'गांवों में सामाजिक दूरी का कोई वजूद नहीं होता है। इसलिए हमें उन्हें समझाने में काफी मेहनत करनी पड़ती है कि एकदूसरे से दूर रहना, घर में ही रहना और खरीदकर लाए गए हर सामान को साफ करना क्यों जरूरी है।' कुमार और उनकी टीम यह सुनिश्चित करती है कि इस बारे में सुबह और शाम मंदिरों और गुरुद्वारों से घोषणा हो। साथ ही टीम ने इस महामारी और इससे बचने के लिए जरूरी उपायों के बारे में हिंदी में पर्चे भी बंटवाए हैं। साथ ही उन्होंने गांवों में दवा का छिड़काव भी किया है।

पंजाब में लुधियाना के रायकोट ब्लॉक में एक किसान उत्पादक संस्था (एफपीओ) के प्रवर्तक हरमिंदर सिद्धू स्थानीय स्वयंसेवकों के साथ 50 गांवों में काम कर रहे हैं। कुमार, सिद्धू और उनका एफपीओ विभिन्न मुद्दों पर सीआईआई फाउंडेशन के साथ जुड़े हैं। इनमें पराली जलाने का मुद्दा भी शामिल है। सिद्धू कहते हैं, 'हम राहत सामग्री से भरी वैन गांवों में भेज रहे हैं।' उनके काम को देखते हुए एसडीएम ने उन्हें अपना काम जारी रखने को कहा है। सिद्धू ने कहा, 'जब लॉकडाउन की घोषणा हुई थी तो वह आलू निकालने का समय था। किसानों को अपने खेतों तक जाने और माल ढुलाई के लिए पास की जरूरत थी। हमने इस काम में उनकी मदद की।'

सीआईआई ने राहत किट और 25,000 सैनिटाइजर की बोतलें भेजी। सिद्धू ने कहा, 'हमने जरूरतमंद लोगों में इनका वितरण किया। ऐसे लोगों को प्राथमिकता दी गई जो खेतों में काम करने जाते हैं।' सभी चौपाल बंद हैं और गांव के युवाओं को सुबह 6 बजे से रात 8 बजे तक गांव की ओर आने जाने वाले रास्तों पर नजर रखने का काम सौंपा गया है। उन्होंने कहा, 'इसके पीछे यह सोच है कि लोगों अनावश्यक रूप से गांवों से बाहर न निकलें।' एक स्थानीय कलाकार को भी साथ जोड़ा गया ताकि जनजागरूकता के लिए दिलचस्प ढंग से संदेश दिए जा सकें। एक ट्रैक्टर से गांव-गांव जाकर लाउडस्पीकर के जरिये इन संदेशों की घोषणा की जाती है।

फिर एक और मामला आ गया। सिद्धू ने कहा, 'खबर आई कि लुधियाना में एक परिवार ने कोविड-19 के कारण मरने वाली एक बुजुर्ग महिला का शव लेने से इनकार कर दिया है। डॉक्टर, पुलिस और प्रशासन पहले से भारी दबाव में हैं और उन्हें इस तरह की समस्याओं से नहीं जूझना चाहिए।' इसलिए अब दिन में दो बार गांव के मंदिरों और गुरुद्वारों से घोषणा की जा रही है। इसके जरिये लोगों से अनुरोध किया जा रहा है कि वे सतर्कता बरतने के साथ इंसानियत भी दिखाएं।

मनीषा ने कहा, 'लोग परेशान हैं।' वह सीआईआई फाउंडेशन के वूमन इग्जेेम्पलर नेटवर्क का हिस्सा हैं। यह ऐसा कार्यक्रम है जो जमीनी स्तर पर अच्छा काम करने वाली महिलाओं की पहचान करता है और उन्हें नेतृत्व और क्षमता निर्माण कौशल का प्रशिक्षण दिया जाता है। सीआईआई ने 2017 में उन्हें दिल्ली में तीन दिन का प्रशिक्षण दिया था। वह बीड जिले में महिला विकास मंच की संस्थापक हैं। उन्होंने कहा कि हर गांव में स्कूल, ग्राम पंचायत के कार्यालय या ऐसे ही मुख्य स्थानों पर शिकायत बक्से रखे गए हैं। महिलाएं अपनी शिकायत या सुझाव उनमें डाल सकती हैं और फिर फील्ड स्टाफ इन पर कार्रवाई करता है। अहम जानकारी या सुझाव सीआईआई को भेजे जाते हैं।

मनीषा अपने आप में एक स्थानीय नेता हैं। यह उन्हीं के प्रयासों का नतीजा है कि बीड महाराष्ट्र के उन जिलों में शामिल है जिन्होंने पहलेपहल घर दोघांचे अभियान लागू किया था। यह पति-पत्नी के बीच संपत्ति के संयुक्त मालिकाना हक के लिए राज्य सरकार की योजना है। मनीषा की कोशिशों 20 हजार महिलाएं अपने मकान की संयुक्त हकदार बन पाई। उनके हस्तक्षेप ने 20,000 महिलाओं को अपने घरों की संयुक्त मालिक बनना संभव बनाया। उनके व्यक्तिगत नेटवर्क में आंगनवाड़ी और आशा कार्यकर्ता भी शामिल हैं।

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