बिजनेस स्टैंडर्ड - संकट के दौर में पूंजी का बंटवारा
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संकट के दौर में पूंजी का बंटवारा

अजय शाह /  April 17, 2020

कोरोनावायरस से उत्पन्न महामारी और उससे निपटने की प्रतिक्रिया से विभिन्न कंपनियों पर दबाव पैदा हो गया है। मजबूत वित्तीय तंत्र इनमें से कुछ को जीवनदान देगा। वित्तीय तंत्र को यह समझना होगा कि माहौल बदल चुका है। उसे पूंजी आवंटन के दौरान ध्यान रखना चाहिए कि उन्हें ही पूंजी दी जाए जिनके बचने और बेहतर प्रदर्शन करने की आशा हो। पूंजी आवंटन में किफायत का अर्थ यह है कि सभी कंपनियों को नहीं बचाया जाना चाहिए। सन 2020 और 2021 में देश की बहुत सारी कंपनियां इसकी भेंट चढ़ जाएंगी। हमें वित्तीय तंत्र के अन्य हिस्सों की सेहत का भी ध्यान रखना होगा।

वित्तीय स्थिति खराब होने पर सबसे पहले ऐसा ही किया जाता है। खराब स्थिति वाली कंपनियों को तीन श्रेणियों में बांटा जाता है: पहली वे जो किसी सूरत में कामयाब नहीं हो सकतीं, दूसरी वे जो बस ठीकठाक रह सकती हैं और तीसरी वे जिनकी मदद से बड़ा अंतर पैदा किया जा सकता है। यह वर्गीकरण इस बात में मदद करता है कि उन जगहों को लाभान्वित किया जाए जहां सबसे अधिक सुधार होने की संभावना हो। यह निहायत क्रूरतापूर्ण लग सकता है। परंतु यदि हम किसी आतंकवादी हमले के बाद चिकित्सा संसाधनों को बराबरी से बांट दें तो इसके नतीजे अच्छे नहीं होंगे।

जब कोविड-19 जैसी प्राकृतिक आपदा सामने आती है तो कई कंपनियों को नुकसान उठाना पड़ता है। एक हालिया अध्ययन बताता है कि कुछ खास परिस्थितियों में देश की बड़ी कंपनियों में से करीब एक चौथाई के पास इतनी नकदी नहीं है कि वह 30 दिन तक राजस्व के बाधित होने की भरपाई कर सके। जब राजस्व में ऐसी कोई बाधा उत्पन्न होती है तो इन कंपनियों को बचाव के  लिए बाहरी पूंजी की आवश्यकता होती है।

ऐसे में यही करने की जरूरत होती है: यानी पूंजी को उन स्थानों पर आवंटित करने का प्रयास करना जहां उत्पादन सबसे अधिक प्रभावित हो। कुछ कंपनियां इस स्थिति में नहीं होंगी और उनमें पैसे लगाने का अर्थ होगा फंसी हुई पूंजी को बचाने की कोशिश में नई पूंजी फंसाना। कुछ कंपनियों को ज्यादा पूंजी की आवश्यकता होती है लेकिन उतनी नहीं कि वे उच्च प्रतिफल दे सकें। यह मध्यम क्षेत्र है जहां कंपनियों के लिए अपना बचाव और सफलता दोनों सामने आ सकती हैं। ऐसा तभी हो सकता है जब नई पूंजी लाई जाए। एक सक्षम वित्तीय तंत्र को ऐसा ही करना चाहिए। किसी भी निवेशक के लिए सबसे अच्छा सौदा तभी होता है जब वह एक मजबूत फर्म में अपना पैसा लगाए। जहां यह पूंजी जीवन-मरण के बीच का अंतर पैदा करे।

यह एक नाटकीय क्षण की तरह प्रतीत होता है लेकिन यह भूमिका उससे अलग नहीं है जो वित्तीय तंत्र हमेशा निभाता है। किसी भी अर्थव्यवस्था में इसकी भूमिका मस्तिष्क की होती है। यह पूंजी का वैकल्पिक इस्तेमाल सुझाता है और इससे अपेक्षा की जाती है कि वह ऐसी जगह पूंजी निवेश करेगा जहां सबसे अधिक प्रतिफल हासिल होगा। वित्तीय तंत्र इक्विटी और डेट पूंजी के लिए कई प्रस्तावों को ठुकराता भी है। जिन फर्म को अपना अस्तित्व बचाने के लिए पूंजी की आवश्यकता होती है, उनमें इस पूंजी की जबरदस्त मांग होना स्वाभाविक है। वे कई ऋणदाताओं या इक्विटी निवेशकों के पास जाएंगे और उनसे यह बताने की कोशिश करेंगे कि कैसे उनकी फर्म को निवेश की आवश्यकता है।

जिन फर्म के पास नकदी की कमी नहीं होती उनकी ऊर्जा भी इस पूरे खेल में कम होती है। इससे कारोबार तैयार करने संबंधी पहलों से ध्यान हटता है। उनकी बाजार हिस्सेदारी में कमी आनी शुरू हो जाती है। किसी सामान्य वर्ष की बात करें तो जरूरत से ज्यादा नकदी एकत्रित करने का असर इक्विटी पर मिलने वाले रिटर्न पर पड़ता है लेकिन जब ऐसा कठिन वक्त आता है तो अधिक नकदी अपने पास रखने के फायदे नजर आते हैं।

एक अच्छी वित्तीय व्यवस्था वह होती है जहां सक्षम कंपनियां लगातार बाहरी पूंजी जुटाने में सक्षम हों। भारत में कुछ बड़ी कंपनियां बिना अच्छे प्रदर्शन के भी वित्तीय तंत्र में भरोसे के लायक मानी जाती हैं। उन्हें भी उनकी मर्जी से बाहरी ऋण मिल जाता है।

ज्यादातर फर्म के लिए भारतीय वित्तीय तंत्र खराब ढंग से काम करता है। कई फर्म ऐसी होती हैं जिन्हें अच्छे दिनों में पूंजी मिल जाती है लेकिन बुरे समय में ऐसा होना मुश्किल होता है। ऐसे में भारत की अधिकांश कंपनियों में नकदी जमा करके रखने की प्रवृत्ति होती है। आज इस महामारी से जूझते हमारे देश के वित्तीय तंत्र में कई दिक्कतें हैं।

जब भी आर्थिक मंदी आती है और कई कर्जदार समस्या में पड़ जाते हैं तो यह बात उन बैंकों को भी प्रभावित करती है जिन्होंने उन्हें ऋण दिया हो। सन 2020 में भारतीय वित्तीय तंत्र की हालत और बुरी हो सकती है। कई बैंक और गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियां तनाव में हैं और अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं।

ये दिक्कतें बैंकों और गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों की पूंजी डालने की क्षमता को प्रभावित करेंगी। पूंजी नियंत्रण, वित्तीय नियमन, कराधान और प्रवर्तन एजेंसियों के मिश्रण ने देश में विदेशी पूंजी का काम बहुत बढ़ा दिया है। इससे देश में विदेशी पूंजी तक पहुंच सीमित हुई है। कई प्रतिभूतियों के लिए वित्तीय बाजार नकदीकृत हैं और उनकी कीमतों में विसंगतियां हैं।

अच्छे दिनों में वित्तीय पूंजी एक दुर्लभ संसाधन है और वित्तीय तंत्र इसे कई दावेदारों के बीच वितरित करता है। फिलहाल भारत में वित्त की बाधा जरूरत से अधिक है। इससे पूंजी का संकट उत्पन्न हो रहा है। तयशुदा वित्तीय पूंजी के लिए सवाल आवंटन की किफायत का भी है। क्या भारतीय वित्तीय तंत्र पूंजी को सही जगह निवेश कर पाएगा? कई चिंताएं इस बात को लेकर भी हैं कि यह कैसे होगा। कई वित्तीय फर्म और बाजार का कामकाज नीतिगत माहौल के कारण विसंगतिपूर्ण है। वित्तीय फर्म के कई कर्मचारियों को यह समझ ही नहीं है कि कौन सी फर्म मजबूत हैं जिन्हें सीधी पूंजी मुहैया कराई जा सके। जिन भारतीय कंपनियों को पूंजी मिलेगी उनका क्या होगा? शायद उनके मौजूदा अंशधारकों को उनमें निवेशकों की तुलना में अधिक भरोसा होगा। देश में कई कारोबारी अपने पोर्टफोलियो को इस तरह नए ढंग से व्यवस्थित करेंगे कि ताकि वे सही शेयरों में निवेश कर सकेंगे। कुछ फर्म अपना खर्च कम करके बचने की कोशिश करेंगी।

 इसके लिए वे गैर जरूरी खर्च कम करेंगी। हालांकि इसका उनकी उत्पादकता और बाजार हिस्सेदारी पर बुरा असर होगा। कुछ फर्मों की बिकवाली हो जाएगी। वे या तो किसी बड़ी कंपनी के हाथों बिकेंगी या फिर निजी इक्विटी फंड के हाथ।

(लेखक नैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनैंस ऐंड पॉलिसी, नई दिल्ली में प्रोफेसर हैं।)

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