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मुश्किल हालात

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  April 17, 2020

हर कोई चाहता है कि सरकार अधिक से अधिक सहायता करे। उससे अपेक्षा की जा रही है कि अपनी आजीविका गंवा चुके 10 करोड़ से अधिक लोगों के लिए अधिकाधिक राहत उपाय, कारोबारी जगत को उबारने के लिए वह पैकेज, राज्यों को वित्तीय मदद, जन स्वास्थ्य पर अधिक खर्च आदि हरसंभव मदद करे। विशेषज्ञ भी इस बात पर लगभग एकमत हैं कि इन क्षेत्रों को वित्तीय मदद पहुंचाई जाए। चूंकि राजकोषीय मोर्चे पर इसके लिए गुंजाइश नहीं है तो और अधिक नकदी छाप कर गरीबों की सहायता की जाए और कारोबारों को उबारा जाए। सामान्य परिस्थितियों में इसकी कीमत मुद्रास्फीति के रूप में चुकानी पड़ती अथवा विदेशी मुद्रा संकट उत्पन्न होता जिसे गैरवाजिब माना जाता लेकिन फिलहाल दोनों को कम जोखिम भरा माना जा रहा है। खासकर विदेशी मुद्रा भंडार को कमजोर तेल कीमतों और पर्याप्त तेल भंडार से मदद मिल रही है।

आखिर कितनी नकदी की जरूरत है? किसी भी आंकड़े पर पहुंचने के पहले हमें यह बात ध्यान में रखनी होगी कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने अपने पूर्वानुमान में कहा है कि इस वर्ष भारत की आर्थिक वृद्धि दर 1.9 फीसदी रह सकती है। आशंका की मूल वजह यह है कि कोष का इतिहास बताता है कि वह आशावादी पूर्वानुमान प्रकट करता है जिसे बाद में कम किया जाता है। इस वर्ष भी हालात अलग नहीं हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था में गिरावट दर्ज की जा सकती है। सकल घरेलू उत्पाद में आधा योगदान देने वाले निर्माण, विनिर्माण, परिवहन और व्यापार, ऋण क्षेत्र और मनोरंजन तथा स्वागत उद्योग इस समय बिल्कुल निष्क्रिय हैं। मार्च के आंकड़े बताते हैं कि बिजली की खपत 25 फीसदी कम हो गई है, बेरोजगारी तीन गुना बढ़कर 24 फीसदी हो गई है और निर्यात 35 प्रतिशत घटा है। हमें यह ध्यान में रखना होगा कि चीन का जीडीपी गत तिमाही में 6.8 फीसदी घटा है। ऐसे हालात में यदि भारत वृद्धि हासिल भर कर लेता है तो यह आश्चर्य की बात होगी।

यहां राजकोषीय मोर्चे पर एक बात यह भी है कि कर आधार भी उडऩ छू हो जाएगा। केंद्र और राज्य की सरकारें अगर तयशुदा कर राजस्व से 10-15 फीसदी कम भी हासिल कर लेती हैं तो भी यह उनकी खुशकिस्मती होगी। हालांकि यह नुकसान भी करीब 5 लाख करोड़ रुपये का होगा। यानी राजकोषीय घाटा उस ऐतिहासिक स्तर तक बढ़ जाएगा जो हमने आज तक नहीं देखा। यह सन 1990-91 के स्तर को पार कर जाएगा। ऐसे में अगर सरकार को संकट के दौरान तकरीबन 5 लाख करोड़ रुपये के अतिरिक्त फंड का प्रबंधन करना है तो उसके पास नकदी छापने के अलावा कोई विकल्प नहीं रह जाएगा।

इसके अलग जोखिम हैं क्योंकि अप्रत्याशित समय में उठाए गए असाधारण कदम प्राय: अगले संकट के आने तक आदत में शुमार हो जाते हैं। अमेरिका जैसे देशों का घाटा फिलहाल बहुत अधिक है लेकिन शायद वे इसका प्रबंधन कर लें लेकिन विकासशील देशों के लिए ऐसी परिस्थितियों की कीमत हमेशा बहुत अधिक होती है। यही कारण है कि ऊर्जित पटेल ने विकसित देशों का अनुकरण करने के खिलाफ चेतावनी दी थी। ऐसी रूढि़वादिता वांछनीय है लेकिन शायद इसे पर्याप्त जन समर्थन नहीं मिलेगा। हालांकि मोदी सरकार आमतौर पर ऐसे मामलों में रूढि़वादी कदम उठाती रही है। कुल मिलाकर हम एक खतरनाक चौराहे पर खड़े हैं।

सरकार से हेलीकॉप्टर मनी (नकद पैसे देना) की मांग को लेकर जगे ताजा उत्साह से पहले से ही सरकार से अपेक्षाएं बढ़ रही हैं। छोटे कारोबारों की मदद, बैंक ऋण पर सरकारी मदद आदि इसके उदाहरण रहे हैं। अब कई लोग लोक कल्याणकारी राज्य की मांग को नैतिक निहितार्थ से जोड़ रहे हैं। हालांकि सरकार के लिए संसाधन जुटाना आसान नहीं होगा क्योंकि संकट समाप्त होने के बाद अर्थव्यवस्था के सुधार की गति काफी धीमी रहेगी। चाहे जो भी हो, बमुश्किल 2,000 डॉलर प्रति व्यक्ति आय के साथ कल्याणकारी राज्य भी पूरी तरह परिपक्व नहीं है। आशा यही की जा रही है कि सरकार इस संकट में अपनी ओर से अधिकतम प्रयास करे। परंतु यह भी समझना होगा कि कितना भी कर दिया जाए, वह पर्याप्त नहीं होगा। लोगों को मुश्किल से गुजरना ही होगा। एक अपेक्षाकृत कम आय वाली अर्थव्यवस्था संकट से गुजर रही है और इसकी कीमत चुकानी होगी। जो लोग हाशिये पर हैं और जिनके पास कोई नकदी नहीं है उनको सबसे अधिक नुकसान होगा। क्या कोई और तरीका है? मुझे संदेह है कि ऐसा है। अगर ऐसा दिखावा किया जाता है तो वह पलायनवाद के सिवा कुछ नहीं होगा।

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