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काम तो होता रहेगा, सबसे पहले अपना परिवार

सोमेश झा /  April 16, 2020

सरकार चरणबद्ध तरीके से आर्थिक गतिविधियां शुरू करना चाहती है लेकिन देश में जहां तहां फंसे प्रवासी कामगारों को घर जाने की बेचैनी है। आने वाले दिनों में कोरोनावायरस के प्रकोप की अनिश्चितता को देखते हुए उनके सब्र का बांध टूट रहा है।

बेंगलूरु में काम करने वाले 45 साल के निर्माण मजदूर परशुराम ठाकुर कहते हैं, 'मैं अपनी पत्नी और बच्चों को देखना चाहता हूं। मैं घर जाना चाहता हूं। काम तो बाद में भी हो सकता है, परिवार सबसे पहले है।' बिहार के रहने वाले ठाकुर के परिवार में पत्नी, दो बेटियां और एक बेटा है और सभी उन पर निर्भर हैं।

बिहार में परिवार के साथ दो महीने बिताने के बाद ठाकुर जनवरी में बेंगलूरु लौटे थे जहां वह हर महीने 9,600 रुपये कमाते हैं। उन्होंने कहा कि उन्हें लॉकडाउन से पहले की मजदूरी मिल गई है और खाना भी मिल रहा है लेकिन उनके दिमाग में हर समय घर की ही चिंता लगी रहती है। उन्होंने कहा, 'बिहार में कोरोनावायरस बीमारी के कम मामले हैं। शहरों में यह तेजी से फैल रहा है। मैं बाद में वापस आ जाऊंगा। अभी मैं अपने परिवार के साथ रहना चाहता हूं।' लेकिन ठाकुर को अभी अपना काम करने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ेगा क्योंकि जिन स्थानों पर वह काम कर रहे थे वे शहर के भीतर हैं जहां लंबे समय तक कोई काम नहीं होगा। 

पिछले कुछ दिनों के दौरान घर जाने को बेचैन प्रवासी कामगारों ने मुंबई, दिल्ली और सूरत समेत देश के कई बड़े शहरों में सड़कों पर बवाल किया है। मुंबई में ट्रेन सेवाएं शुरू होने की अफवाह के कारण मंगलवार को हजारों कामगार बांद्रा रेलवे स्टेशन पहुंच गए थे। सूरत और दिल्ली में प्रवासी कामगारों का आरोप है कि उन्हें भोजन जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं मिल रही हैं। इन शहरों में पिछले कुछ दिनों से सामाजिक अशांति की तस्वीरें देखने को मिल रही हैं। दिल्ली में दो रैन बसेरों में आग लगने के बाद सैकड़ों प्रवासी कामगार यमुना किनारे रहने को मजबूर थे। आरोप है कि खाने की कमी के कारण इन रैन बसेरों में रहने वालों ने ही इन्हें आग के हवाले कर दिया। पश्चिम बंगाल से तमिलनाडु के तिरुपुर आए जुल्फिकार मुल्ला लॉकडाउन पर सरकार की घोषणाओं से उलझन में हैं। तिरुपुर कपड़ों के निर्यात का मुख्य केंद्र है। 21 मार्च को मुल्ला के मालिक ने कहा कि उन्हें तुंरत घर जाने के बारे में सोचना चाहिए और मुल्ला ने 24 मार्च का टिकट बुक कर दिया। लेकिन 22 मार्च को रेलवे ने 23 मार्च से 31 मार्च तक सभी बुकिंग रद्द कर दी। उन्होंने फिर 7 अप्रैल का टिकट बुक किया लेकिन 25 मार्च को रेलवे ने सभी ट्रेनों को 14 अप्रैल तक रद्द कर दिया। मुल्ला ने फिर 17 अप्रैल का टिकट बुक किया लेकिन मंगलवार को उन्हें टेक्स्ट मेसेज मिला कि उन्हें ट्रेन नहीं चलेगी क्योंकि लॉकडाउन बढ़ा दिया गया है।

मुल्ला 300 अन्य प्रवासी कामगारों के साथ तिरुपुर के करीब एक बस्ती में रहते हैं। इनमें से अधिकांश बिहार या पश्चिम बंगाल के हैं। मुल्ला ने कहा, दिल में घबराहट हो रही है, परिवार वाले रो रहे हैं। हालांकि उन्हें रोजाना 300 रुपये के हिसाब से पिछला पैसा मिल गया है लेकिन केंद्र सरकार के आदेश के बावजूद कपड़ा फैक्टरी ने लॉकडाउन की अवधि का भुगतान नहीं किया है। केंद्र ने 29 मार्च के अपने आदेश में कंपनियों से लॉकडाउन के दौरान कामगारों का वेतन नहीं काटने का अनुरोध किया था। मुल्ला चार अन्य कामगारों के साथ एक ही कमरे में रहते हैं। उन्होंने कहा कि उन्हें अब तक केवल दो बार ही राशन मिला है। पहली बार उन्हें देशव्यापी लॉकडाउन की घोषणा के चार-पांच दिन बाद राशन मिला था और दूसरी बार कुछ दिन पहले। हर कामगार को दो किलो चावल, 100 ग्राम तेल और 100 ग्राम दाल मिली। उन्होंने कहा कि लॉकडाउन लागू होने के बाद फैक्टरी मालिक ने केवल एक बार उनकी खबर ली है। मुल्ला ने कहा, 'मैंने लॉकडाउन के बारे में अपनी परेशानी बताने के लिए पश्चिम बंगाल सरकार के हेल्पलाइन नंबर पर भी फोन किया था। कुछ दिन पहले मुझे वहां से फोन आया था। वे मेरे घर का पता और दूसरी जानकारी मांग रहे थे। उनका कहना था कि वे प्रवासियों को ले जाने की व्यवस्था कर रहे हैं।' इसने मुल्ला को और उलझा दिया है।

उन्होंने कहा कि अगर कपड़ा फैक्टरी में फिर से काम शुरू होता है तब भी वह अब यहां नहीं रहना चाहते हैं। वह अपने गृहनगर जाकर वहीं काम करना चाहते हैं। मुल्ला ने कहा, ऐसे अनिश्चित समय में जीना कठिन है।

प्रवासी कामगारों पर शोध से पता चलता है कि उनके पास संसाधनों की कमी हो रही है जिनमें राशन और नकदी शामिल है। लॉकडाउन को 3 मई तक बढ़ाया जा चुका है और ऐसे में राज्य सरकारें भी लंबे समय तक उनकी जरूरतों को पूरा करने में असमर्थ हैं।

अधिकांश प्रवासी कामगारों का कहना है कि उनका पास एक दिन का राशन भी नहीं रह गया है। 70 फीसदी का कहना है कि उन्हें राज्य सरकारों की तरफ पका हुआ भोजन नहीं मिला, 80 फीसदी कामगारों के पास केवल 300 रुपये रह गए हैं और करीब 90 फीसदी कामगारों के लॉकडाउन के दौरान उनके मालिकों की तरफ से पैसा नहीं मिला। यह शोध शोधकर्ताओं के एक दल ने किया जो खुद को स्ट्रांडेड वर्कर्स ऐक्शन नेटवर्क (स्वॉन) कहते हैं। इस समूह ने 27 मार्च के बाद 11,159 प्रवासी मजदूरों के बीच सर्वेक्षण के आधार पर यह दावा किया है। इनमें से अधिकांश (79 फीसदी) दिहाड़ी या निर्माण मजदूर थे। स्वॉन ने 21 डेज ऐंड काउंटिंग शीर्षक से साथ अपनी शोध रिपोर्ट में लिखा है, इस लॉकडाउन ने सरकारों और नियोक्ताओं की कलई खोल दी है। देश में ठेका मजदूरी पर प्रशासनिक निगरानी की कोई व्यवस्था नहीं है और नियोक्ताओं तथा सरकारों की कोई जवाबदेही नहीं है।

न्यू ट्रेड यूनियन इनिशिएटिव की सचिव सुजाता मोदी ने कहा कि नियोक्ताओं की ओर से कोई सहानुभूति नहीं है और कई कामगार अपने राज्यों में सरकार द्वारा किए गए उपायों के बारे में नहीं जानते हैं, इससे उनमें रोष है।

मोदी ने कहा, ठेकेदार मजदूरों को असहाय छोड़कर भाग गए हैं। कुछ नियोक्ताओं ने तो अपने कामगारों से कहा है कि जब वे काम पर लौटेंगे तो राशन का पैसा उनके वेतन में से काटा जाएगा। इस बारे में जानकारी का नितांत अभाव है क्योंकि राहत शिविरों में संवाद को कोई समुचित माध्यम नहीं है। उदाहरण के लिए तमिलनाडु में हिंदीभाषी कामगारों को भाषा की समस्या आ रही है, इसलिए उनके प्रदेशों की सरकारों को उनके साथ संवाद करना चाहिए। लॉकडाउन के कई दिन बाद जब सैकड़ों प्रवासी कामगारों ने शहरों से पैदल ही अपने गांवों की तरफ कूच किया तो राज्य सरकारों और स्वयंसेवी संगठनों ने उन्हें ठहराने के लिए शिविरों का इंतजाम किया। इस समय देश में करीब दस लाख कामगार 26,476 राहत शिविरों में रह रहे हैं। यानी औसतन हर शिविर में 40 कामगार रह रहे हैं। सरकार ने कहा कि कुछ आर्थिक गतिविधियों को 20 अप्रैल से शुरू करने की अनुमति दी जाएगी। खासकर विशेष आर्थिक क्षेत्रों और गांवों में सुरक्षित तरीके से कामकाज किया जाएगा। लेकिन अपने गांवों को लौट चुके मजदूरों को वापस लाना दुष्कर काम होगा। उदाहरण के लिए लॉकडाउन के तुंरत बाद दूसरे स्थानों से उत्तर प्रदेश पहुंचे 12 लाख कामगारों को क्वारंटीन किया गया था 14 दिन की अवधि समाप्त होने के बाद वे अपने घरों को जाएंगे।

कई वर्षों से रैन बसेरों में रह रहे बेघर लोगों का धैर्य भी अब जवाब दे रहा है। दिल्ली में सराय काले खां में एक रैन बसेरे में रहने वाले 45 साल के किशन देव मुखिया ने रोते हुए कहा, 'मुझे दिन में तीन बार चावल ही मिल रहा है। अब तो मेरी भूख जैसे मर गई है। मैं बिहार अपने परिवार के पास जाना चाहता हूं। वहां कम से कम में खेती का कुछ काम कर पाऊंगा, खाऊंगा और आराम से रहूंगा।'

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