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अनाज से गोदाम भरे मगर पेट खाली

संजीव मुखर्जी / नई दिल्ली April 16, 2020

उत्तर प्रदेश में आगरा के करीब स्थित बमरौली कटारा गांव के दिहाड़ी मजदूर रमणीक लाल के परिवार में छह सदस्य हैं। देश में कोविड-19 के प्रसार को रोकने लिए लगाए गए लॉकडाउन के बाद पास की राशन की दुकान ही परिवार का पेट पालने के लिए रमणीक की एकमात्र उम्मीद है। वह आगरा शहर में निर्माण मजदूर का काम करते थे लेकिन पिछले महीने से काम बंद है। अब उनके पास राशन की दुकान जाने के अलावा कोई काम नहीं है।

अपने हाथों में कुछ कागजात थामे रमणीक लाल कहते हैं कि मुफ्त राशन केवल उन्हीं के लिए है जिनका नाम राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून (एनएफएसए) के तहत दिए गए राशन कार्ड में है। उन्होंने कहा, 'मेरे परिवार में छह सदस्य हैं जिनमें बच्चे और बुजुर्ग भी हैं लेकिन कार्ड में केवल तीन लोगों का नाम है। मेरे पास परिवार के उन सभी सदस्यों के पहचान के सारे कागजात (आधार कार्ड और बैंक पासबुक) हैं जिनके नाम राशन कार्ड में नहीं हैं लेकिन दुकानदार एक किलो भी फालतू राशन देने को तैयार नहीं है।' वह सबूत के तौर पर दस्तावेज दिखाते हुए कहते हैं, 'मैं तीन लोगों के राशन से छह लोगों का पेट कैसे भरूंगा।'

केंद्र सरकार के गोदामों में 7.7 करोड़ टन से अधिक अनाज भरा है जो खाद्य कानून के तहत एक साल के राशन के कोटे से भी अधिक है क्योंकि इस योजना के तहत सालाना उठाव करीब 5.5 से 6 करोड़ टन है। इसे देखते हुए रमणीक लाल के परिवार के तीन अतिरिक्त सदस्यों का पेट भरने में कोई समस्या नहीं होनी चाहिए।

अलबत्ता, कोविड-19 संकट और केंद्र सरकार की खाद्य कानून के सभी 81 करोड़ लाभार्थियों के लिए 5 किलो अतिरिक्त गेहूं या चावल आवंटित करने की घोषणा से देश की दशकों पुरानी सार्वजनिक वितरण प्रणाली को दो कमजोरियों को उजागर कर दिया है। एनएफ एसए को देशभर में फैली राशन की पांच लाख से अधिक दुकानों के जरिये संचालित किया जाता है। इनके माध्यम से हर साल देश के करीब 81 करोड़ लोगों को सब्सिडी के साथ सस्ता राशन दिया जाता है। पिछले तीन साल के औसत के मुताबिक हर साल लगभग 5.4 से 5.6 करोड़ टन राशन पीडीएस के जरिये आवंटित किया जाता है।

भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के गोदामों में इस साल 10 मार्च तक करीब 7,772 करोड़ टन गेहूं और चावल का भंडार था। इसमें 1,924 करोड़ टन धान भी शामिल है। इस तरह 2020-21 सत्र के लिए गेहूं की खरीद से पहले ही देश के पास एक साल के राशन के कोटे से ज्यादा भंडार है। नई फसल आने से सरकार के गोदामों में और अनाज आएगा।

इसलिए जैसे ही कोविड-19 लॉकडाउन के कारण देशभर में लाखों कामगारों की नौकरी गई, केंद्र सरकार ने एनएफ एसए के 80 करोड़ लाभार्थियों को तीन महीने की राशन और हर परिवार को साथ में एक किलो दाल मुफ्त देने की घोषणा कर दी। इससे पहले तक उन्हें हर महीने 3 रुपये किलो चावल, 2 रुपये किलो गेहूं और 1 रुपये किलो मोटा अनाज के भाव से हर महीने 5 किलो गेहूं या चावल मिलते थे। देश में कोविड-19 के प्रकोप के बाद प्रधानमंत्री गरीब कल्याण पैकेज के तहत इन सभी लाभार्थियों को अगले तीन महीने तक 10 किलो चावल या गेहूं मिलेगा।

लेकिन यहीं पर समस्या है। आंबेडकर विश्वविद्यालय में शिक्षक और भोजन का अधिकार अभियान (राइट टु फूड) की सदस्य दीपा सिन्हा ने बिज़नेस स्टैंडर्ड से कहा, '2013 का एनएफ एसए कानून 2011 की जनगणना पर आधारित था। यानी उसके बाद पिछले 9 वर्षों में पैदा हुए सदस्यों के नाम राशन कार्ड में नहीं होंगे। दूसरी बात यह है कि 2011 के बाद कोई जनगणना नहीं हुई है जबकि इस दौरान देश की आबादी बहुत बढ़ गई है। बड़ी संख्या में गरीबों और जरूरतमंदों के पास राशन कार्ड नहीं है और इस तरह वे मुफ्त राशन के हकदार नहीं हैं।' उन्होंने कहा कि फि लहाल सरकार 2021 की अनुमानित आबादी के आधार पर अतिरिक्त राशन बांड सकती है क्योंकि कोविड-19 संकट के कारण जनगणना का काम शुरू नहीं हो पाया है। जाने माने अर्थशास्त्री ज्यां द्रेजए रीतिका खेड़ा और मेघना मुंगीकर द्वारा कुछ दिन पहले जारी किए गए एक अध्ययन के मुताबिक 10 करोड़ से अधिक लोग पीडीएस से बाहर हैं क्योंकि केंद्र सरकार एनएफ एसए के तहत राज्यों को पीडीएस का कोटा तय करने के लिए 2011 की आबादी को आंकड़ों के इस्तेमाल पर जोर देती है। इस समय देश की अनुमानित आबादी करीब 137.2 करोड़ है और 67 फ ीसदी के अनुपात से 92.2 करोड़ लोग पीडीएस के दायरे में आएंगे लेकिन अभी इसके दायरे में केवल 80 करोड़ लोग ही है। इसका मतलब है कि 10 करोड़ लोग इसके दायरे से बाहर हैं।  

अगर राज्य केंद्र को योजना से ज्यादा लोग जोड़ते हैं तो उन्हें अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ेगा। इसलिए वे पीडीएस लाभार्थियों की सूची में अतिरिक्त नाम जोडऩे से परहेज करते हैं।

कुछ विशेषज्ञों के अनुसार दूसरी समस्या यह है कि राज्यों के स्तर पर इसमें कई खामियां हैं। यही वजह है कि भले ही एफ सीआई के गोदामों से अनाज राज्यों को जा रहा है लेकिन यह गरीब की थाली तक नहीं पहुंच रहा है। इस कारण अतिरिक्त मुफ्त अनाज की घोषणा के बावजूद अंतिम लाभार्थियों को इसके लिए इंतजार करना पड़ सकता है।

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