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आशा की किरण

संपादकीय /  April 16, 2020

भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) ने इस वर्ष मॉनसून के सामान्य रहने की भविष्यवाणी की है। कोविड-19 महामारी के कारण छाई चौतरफा निराशा के बीच यह एक सुखद खबर है। यदि यह बात सही साबित होती है तो देश की आधी आबादी की आजीविका पूरी करने वाले कृषि जगत के लिए बहुत अच्छी खबर है। इतना ही नहीं जलविद्युत उत्पादन तथा पानी का इस्तेमाल करने वाले अन्य उद्योगों के लिए भी यह बढिय़ा संकेत है। रबी सीजन के आखिरी समय तक कोविड-19 का असर दिखने लगा था लेकिन इसके बावजूद वर्ष 2019-20 के दौरान कृषि और उससे संबंधित क्षेत्रों के 3.5 फीसदी की दर से विकसित होने का अनुमान है। माना जा रहा है कि वर्ष 2020-21 में भी यह वृद्धि दर बरकरार रहेगी। इस आशावाद को देश में पानी के मौजूदा भंडार से भी बल मिलता है। केंद्रीय जल आयोग के अनुसार देश के 123 बड़े जलाशयों में पानी का मौजूदा भंडार पिछले वर्ष के स्तर से 63 फीसदी अधिक है और वर्ष के इस समय के औसत से 57 फीसदी अधिक है।

इससे आने वाली गर्मियों में कृषि तथा घरेलू क्षेत्र के लिए पानी की जरूरत पूरी करने में मदद मिलेगी। बेहतर कृषि से समूची अर्थव्यवस्था को मदद मिल सकती है क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों में वस्तुओं और सेवाओं की मांग में इजाफा होगा। परंतु यह तभी होगा जब हम कृषि क्षेत्र को श्रम की उपलब्धता, विपणन और नकदी की स्थिति आदि को कोरोना महामारी के दुष्प्रभाव से बचा पाएं।

अहम बात यह है कि आईएमडी ने देश के विभिन्न हिस्सों में मॉनसून के आगमन, प्रगति और उसके वापस लौटने को लेकर भी तारीखों को संशोधित किया है। यह अनुमान पिछले एक दशक के अनुभवों के आधार पर लगाया गया है। ऐसा करने से एक तरह से देश के मॉनसून आधारित फसल कैलेंडर में भी बदलाव आया है। अहम बात है कि मॉनसून का मौसम जून के मध्य से अक्टूबर तक यानी साढ़े चार महीने तक चलेगा जबकि पहले इसके जून से सितंबर तक चार महीने ही चलने का अनुमान था। हालांकि केरल में मॉनसून के प्रवेश की तारीख अभी भी 1 जून है परंतु देश के मध्य भाग में इसके विस्तार में तीन से सात दिन तक का ज्यादा समय लग सकता है। इसके बावजूद करीब 8 जुलाई तक मॉनसून पूर्वोत्तर समेत सारे देश में पहुंच जाएगा। पहले इसके जुलाई के मध्य तक पूरे देश में पहुंचने का अनुमान था। मॉनसून के देश से पूरी तरह बाहर जाने की नई तारीख 15 अक्टूबर है, पहले यह तारीख सितंबर के आखिर की थी। अब यह परिवर्तन जलवायु परिवर्तन के कारण हो रहा है या नहीं यह अलग बहस का विषय है लेकिन इसका फसलों की बुआई और कटाई की योजना तथा अन्य मॉनसून आधारित गतिविधियों पर अहम असर होगा।

सच यह भी है कि आईएमडी के लंबी अवधि के मौसम संबंधी अनुमान अभी भी उतने विश्वसनीय नहीं हैं जितने कि उसके अल्पावधि और मध्यम अवधि के अनुमान। हर वर्ष वह इस समय जो प्रारंभिक अनुमान जताता है वे प्राय: गलत साबित होते हैं। कई बार संशोधित क्षेत्रवार अनुमान जो बाद में जारी किए जाते हैं, वे भी गलत साबित होते हैं। बारिश के वितरण के संकेत जो कृषि के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण हैं, वे तब जारी किए जाते हैं जब बारिश शुरू हो चुकी होती है और फसलों की बुआई भी काफी हद तक हो चुकी होती है। वह अनुमान किसानों और नीति निर्माताओं के खास काम का नहीं होता। ऐसे में बेहतर यही होगा कि आईएमडी के मॉनसूनी बारिश के अनुमान के मॉडल बेहतर बनाए जाएं ताकि विभिन्न अंशधारकों द्वारा इनका बेहतर उपयोग सुनिश्चित किया जा सके।

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