बिजनेस स्टैंडर्ड - अर्थव्यवस्था में नई जान डालने का हो जतन
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अर्थव्यवस्था में नई जान डालने का हो जतन

श्याम पोनप्पा /  April 16, 2020

यह ऐसा समय है जब लॉकडाउन को सफल बनाने के लिए शासन-प्रशासन पुरजोर कोशिश करता रहा है। इसी के साथ बड़ी संख्या में लोगों तक भोजन एवं अन्य जरूरी सामान पहुंचाने की भी सख्त जरूरत है जबकि बाकी लोगों को इस दौरान सुरक्षित रहने की जरूरत है। एमआईटी के एक विद्वान 1918 में कहर बरपा चुके स्पैनिश फ्लू का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि लोगों के इकट्ठा होने पर रोक लगाने वाले और लंबे समय तक इस फैसले पर डटे रहने वाले शहरों में कम मौतें हुई थीं। ऐसे शहर फ्लू की महामारी खत्म होने के बाद आर्थिक प्रगति के मोर्चे पर काफी मजबूत साबित हुए।

ऐसी संभावना है कि आर्थिक एवं सामाजिक क्षमता के हिसाब से लॉकडाउन की लागत एवं लाभ भी अलग-अलग हों। इस लिहाज से हमारे सामने बहुत मुश्किल दौर आ सकता है। आगे सरकार को राहत मुहैया कराने, लोगों के पुनर्वास एवं नुकसान से निपटने की कार्य-योजना सोच-समझकर बनानी होगी। इसमें शहरी एवं विस्थापित गरीबों को मदद पहुंचाने का लक्ष्य भी रखना होगा।

लॉकडाउन का क्रियान्वयन सुनिश्चित रखने के साथ ही उत्पादक गतिविधियों एवं अर्थव्यवस्था को फिर से पटरी पर लाने की योजना बनाना और लोगों का भरोसा बहाल करना भी अहम होगा। इसके लिए अगर व्यवस्थागत दृष्टिकोण अपनाया जाता है तो उसका नतीजा कहीं बेहतर होगा। आर्थिक गतिविधियों की बहाली योजना में ऋण एवं कर्ज परिशोधन की शर्तों को उदार बनाने जैसे कदमों की बड़ी भूमिका होगी। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने हाल ही में इस बारे में तीन महीने की जो छूट दी है शायद उसे और बढ़ाने की जरूरत होगी। इसके पीछे बुनियादी मकसद यह है कि निर्माण क्षेत्र जैसे बड़े पैमाने पर कार्यरत गतिविधियों में फिर से जान डाली जा सके। देश भर में करीब 2 लाख बड़ी परियोजनाएं कई चरणों में हैं। इन्हें दोबारा चालू हालत में लाया जाना चाहिए ताकि वे चिंता का मुद्दा न रह जाएं। आरबीआई को दरों में और कमी करने जैसे कुछ अन्य कदम उठाने के बारे में सोचना पड़ सकता है।

अर्थव्यवस्था के सुस्त होने से घटित एक अशुभ घटना वित्तीय तनाव की है जिससे गैर-निष्पादित परिसंपत्तियां (एनपीए) बढ़ सकती हैं। गत 30 सितंबर को समाप्त पहली छमाही में भारत में दूरसंचार को छोड़कर गैर-वित्तीय बड़ी कंपनियों में से करीब आधी वित्तीय तनाव से जूझ रही थीं। इनमें भारत की कुछ सबसे बड़ी कंपनियां भी शामिल थीं जो बिजली, इस्पात एवं रसायन क्षेत्रों से संबंधित हैं। पहली छमाही खत्म होने पर 201 बड़ी कंपनियों का कुल कर्ज करीब 15 लाख करोड़ रुपये था जो सभी उधारियों के आधे से भी अधिक है। इसके अलावा भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण और दूरसंचार कंपनियों का कर्ज बोझ भी है। विडंबना की बात है कि आज के समय में ये दूरसंचार कंपनियां ही हमारी जीवनरेखा बनी हुई हैं। अतीत में गलत सोच से बनाई गई नीतियों के चलते कर्ज तले दबकर पतन के कगार पर जा पहुंची दूरसंचार कंपनियों के लिए बदले हुए हालात में शायद सुविचारित एवं केंद्राभिमुख नीतियां बनाने पर ध्यान दिया जाएगा ताकि यह क्षेत्र प्रभावी ढंग से काम कर सके।

इसकी शुरुआत अमेरिका के एफसीसी नियमों की तर्ज पर 60 गीगाहट्र्ज, 70-80 गीगाहट्र्ज और 500-700 मेगाहट्र्ज वायरलेस उपयोग के प्रशासकीय नियमों में फौरन बदलाव के साथ हो। अक्टूबर 2018 में 5 गीगाहट्र्ज वाई-फाई के मामले में ऐसा किया भी जा चुका है। इससे भारत में संचार उपकरणों के नवोन्मेष, उनके उत्पादन एवं उपयोग का मौका पैदा होगा जिससे इस क्षेत्र को शायद संजीवनी मिले। इससे आयातित संचार प्रौद्योगिकी एवं उपकरणों पर हमारी निर्भरता कम करने में भी मदद मिल सकती है। हालांकि नीतियों एवं खरीद समर्थन में ऐसे बदलाव अभी तक किए नहीं गए हैं। अब हमारे उच्च-प्रौद्योगिकी विनिर्माताओं के पास इकलौता रास्ता यही बचा है कि वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कामयाबी हासिल करें, तभी वे घरेलू बाजार में अपने उत्पाद बेच पाएंगे।

कल्पना करें कि ऐसा कर पाना कितना मुश्किल होगा। इसी के साथ आपको यह आभास भी होने लगेगा कि हमारे पास गिने-चुने घरेलू उत्पाद चैंपियन ही क्यों हैं जो ऑप्टिकल स्विच, नेटवर्किंग उपकरण और वायरलेस यंत्रों जैसे क्षेत्रों में विपरीत हालात से जूझ रहे हैं। हालांकि आमूलचूल बदलाव लाने के लिए संरचनात्मक परिवर्तनों का खाका तैयार करना होगा जिसमें दूरसंचार ऑपरेटरों की सलाह भी ली जाए। दीर्घावधि संदर्भ में संसाधनों के आवंटन में एक मौलिक पुनर्विचार की जरूरत है जो सुसंगत, सतर्कता से तैयार नीति एवं समर्थन से ही अंजाम दिया जा सकता है। सरकार का कानून व्यवस्था और सुरक्षा बनाए रखने के अलावा प्राथमिक दायित्व अपने नाकाफी एवं गैर-भरोसेमंद ढांचे का विकास करना भी है। यानी कुशल उत्पादन क्लस्टर के निर्माण, उनके एकीकृत संचालन एवं दक्षता विकास वाली सुविधाओं एवं सेवाओं पर जोर देना होगा। मसलन, ऐपल ने अपने आई-फोन का निर्माण चीन से भारत स्थानांतरित नहीं करने का जो फैसला है उसके लिए कथित तौर पर भारत में चीन जैसे बड़े कारखाने की कमी और नाकाफी लॉजिस्टिक सेवाओं को जिम्मेदार बताया जा रहा है। ऐसे विमर्शों को भी हमें अपनी योजना में जगह देनी चाहिए। वैसे ऐपल को भी विशालकाय कारखानों की संकल्पना की व्यवहार्यता पर पुनर्विचार की जरूरत पड़ सकती है।

हालांकि हमें ऐसे विशालकाय कारखानों के निर्माण का लक्ष्य नहीं रखना चाहिए जो टिकाऊ न साबित न हो सकें। इसके बजाय अधिक व्यावहारिक नजरिया यह हो सकता है कि छोटी, टिकाऊ उत्पादन इकाइयों का संकुल बनाया जाए जिससे उनकी गतिविधि एवं आउटपुट असरदार एवं कारगर ढंग से बढ़ सके। ऐसे कदम तमाम व्यवहार्य क्लस्टर का आधार बन सकते हैं और जहां पर संभव हो वहां मौजूदा आरंभिक क्लस्टरों को ही विकसित किया जाए। ऐसे ढांचागत आधार कृषि एवं संबद्ध कार्यों के लिए देश भर में फैलाने की जरूरत है ताकि कृषि क्षेत्र की उत्पादकता बारिश पर आधारित एवं व्यापक खेती पर आश्रित न रहते हुए अधिक नियंत्रित हालात वाले तरीकों पर निर्भर हो।

विनिर्माण क्षेत्र का सबसे बड़ा नियोक्ता वाहन उद्योग अन्य क्षेत्रों के लिए एक नजीर देता है। कुछ समय पहले तक वाहन उद्योग भी दूरसंचार क्षेत्र की तरह सफलता की कहानी बयां करता था लेकिन अब यह अनुचित नीतियों की वजह से लडख़ड़ाने लगा है। इसने महज तीन साल में ही बीएस-4 मानकों से सीधे बीएस-6 मानकों की तरफ बढऩे की उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल की है। करीब 70,000 करोड़ रुपये के भारी निवेश के साथ वाहन उद्योग ने दो उत्सर्जन मानकों की छलांग लगाई है जबकि यूरोपीय कंपनियों को एक स्तर लांघने में ही पांच-छह साल लगे हैं। इस तरह उनके पास लोकल-सोर्सिंग के लिए वक्त नहीं है, लिहाजा चीन जैसे वैश्विक आपूर्तिकर्ताओं पर अतिशय निर्भरता हो जाती है। 

वाहन उद्योग का अपनाया हुआ सहयोगपूर्ण नियोजन मॉडल अन्य क्षेत्रों के लिए एक मॉडल साबित हो सकता है लेकिन सवाल यह है कि अब आगे क्या होगा? एक तरह से वाहन उद्योग की समस्या राइड-शेयरिंग एवं ई-वाहन के चलन से बाजार की मांग में आए आमूलचूल बदलाव के साथ ही नीतियों एवं कराधान के प्रति सरकार के रवैये की वजह से भी बढ़ी है।

भविष्य की बात करें तो सामाजिक लक्ष्यों के लिहाज से अधिक अनुकूल नीतियों के बारे में समावेशकारी नजरिये से सोचने की जरूरत है। सड़क एवं रेल परिवहन के वाहनों के विनिर्माण के लिए ऑटो एवं अन्य उद्योगों के बारे में उद्देश्य की पूर्ति के लिहाज से विचार करना होगा ताकि कम लागत वाले सहज परिवहन वाहन बनाए जा सकें। अगर व्यवस्थित एवं केंद्राभिमुख योजना बनाकर तमाम क्षेत्रों में उनका क्रियान्वयन किया जाए तो आर्थिक गतिविधियों में बहाली को बेहतर ढंग से हासिल किया जा सकता है।

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