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सरकार के मुखिया की सेहत को लेकर गोपनीयता की आदत

सम सामयिक
टीसीए श्रीनिवास-राघवन /  April 16, 2020

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन को कोरोनावायरस संक्रमण की चपेट में आने के बाद कई दिनों तक लंदन के एक अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा। अब उनकी सेहत में तेजी से सुधार हो रहा है और अस्पताल से उन्हें छुट्टी दे दी गई है। 

इस प्रसंग में पाठकों का ध्यान समाज की एक पुरानी दुविधा की तरफ आकृष्ट करना चाह रहा हूं। समाज को अक्सर यह असमंजस रहता है कि क्या नेता के गंभीर रूप से बीमार होने की बात छिपाई जानी चाहिए या उसे सार्वजनिक कर देना चाहिए?

यह समस्या लंबे समय से चली आ रही है। करीब 2,000 साल पहले रोमन साम्राज्य के तीसरे शासक कलीगुला धीरे-धीरे पागलपन की तरफ बढ़ रहे थे लेकिन इसके बारे में सिर्फ दो लोगों को मालूम था। इसी तरह भारत में बहुत कम लोगों को पता था कि औरंगजेब कुछ अनजान बीमारियों की चपेट में आ गया जिसकी वजह से 1707 में उसकी मौत हो गई।

असल में, दुनिया के किसी भी बड़े नेता के मामले में करीब एक जैसी कहानी है। यह अपेक्षा के अनुरूप ही है क्योंकि ये सारे लोग अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद इंसान ही थे, देवता नहीं और अपनी बीमारियों के बारे में छिपाना इंसान की बड़ी कमजोरी है।

परिवारों के भीतर भी ऐसा होता है। कारोबारी घरानों में भी यह होता है। खेल जगत की टीमों में भी ऐसा देखा जाता है। फिर सरकारों में ऐसा क्यों न हो?

स्वास्थ्य को लेकर गोपनीयता का मसला ब्रिटेन में 1960 के दशक में जोर-शोर से उठा था। दरअसल विंस्टन चर्चिल के निजी चिकित्सक रहे लॉर्ड मोरान ने अपने संस्मरण में उनके स्वास्थ्य को लेकर कुछ खुलासे किए थे। इस किताब के मुताबिक, चर्चिल को 1942 में स्ट्रोक के अलावा दिल का दौरा भी पड़ा था।

लॉर्ड मोरान ने अपने संस्मरण में यह सवाल उठाया था कि क्या एक बीमार नेता का गहरे संकट के समय पद पर बने रहना उचित था? निष्ठावान ब्रिटिश अवाम इस खुलासे से खासी परेशान हो गई और उसने यह सवाल उठाया कि क्या एक डॉक्टर का अपने मरीज की सेहत से जुड़े ब्योरे देना भरोसे में खलल नहीं डालता है?

चर्चिल का निधन 1965 में हो चुका था लिहाजा इस दलील का कोई मतलब नहीं रह गया था। खासकर यह देखते हुए कि चर्चिल ने इतने अहम पद पर रहते हुए कितने बड़े संकट का सामना किया था। गुस्सा अधिक होने की वजह यह थी कि एक राष्ट्रीय नायक को सुपरमैन से कमतर दिखाया जा रहा था और वह भी उस शख्स के द्वारा जो सच नहीं बोल सकता था लेकिन बोल रहा था।

लेकिन इस बहस में उस बड़े सवाल को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है जो मोरान ने उठाया था। क्या एक बहुत बीमार नेता का गहरे संकट के समय पद पर बने रहना सही है? आखिर कोई बीमारी किस स्तर पर पहुंचने के बाद निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित करती है?

उदाहरण के तौर पर, हिटलर 1943 से ही सिफिलिस से उपजे मानसिक रोगों की चपेट में आ गया था और फिर उसने ऐसी गलतियां की जिसका खमियाजा लाखों लोगों को जान देकर चुकाना पड़ा। ये गलतियां तो इतिहास के पन्नोंं में भी दर्ज हैं।

अगर चर्चिल बहुत बीमार थे तो अमेरिका के राष्ट्रपति फ्रैंकलिन रूजवेल्ट भी अस्वस्थ चल रहे थे। उन्हें 1940 के बाद से ही धूम्रपान के चलते दिल की परेशानी चल रही थी। आखिरकार द्वितीय विश्व युद्ध खत्म होने के चार महीने पहले ही अप्रैल 1945 में दिल का गंभीर दौरा पडऩे से उनकी मौत हो गई। लेकिन उनकी सेहत के बारे में सही जानकारी को छिपाकर रखा गया था।

यूं तो स्टालिन को भी धूम्रपान की लत थी लेकिन अपनी उम्र के सातवें दशक में भी वह थोड़े खुशकिस्मत रहे। लेकिन उनकी सेहत से जुड़ी जानकारियां तो हमें आज भी बहुत कम हैं। उनकी आत्मकथा लिखने वाले किसी भी लेखक ने उनकी सेहत से जुड़ी जानकारियां अधिक नहीं दी हैं। जहां तक उनके निजी चिकित्सकों का सवाल है तो किसी ने भी उनके बारे में लिखने का साहस नहीं दिखाया।

इसी के साथ हमें माओत्से तुंग के चिकित्सक ली जिसुई के लिखे संस्मरण को भी नहीं भूलना चाहिए। चर्चिल के बारे में लिखे संस्मरण की तरह मैंने माओ के बारे में लिखे संस्मरण को भी पढ़ा है। इससे पता चलता है कि माओ को भले ही किसी बड़े वैश्विक संकट का सामना नहीं करना पड़ा था लेकिन अपनी जिंदगी के कुछ आखिरी वर्षों में उनकी तबीयत बेहद खराब रही थी। यह अलग बात है कि माओ की बीमारी के बारे में किसी को भी नहीं बताया गया था। यहां तक कि 1971 में चीन के दौरे पर पहुंचे अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन को भी इस बारे में कोई अंदाजा नहीं था।

सवाल है कि शीर्ष नेताओं की सेहत को लेकर ऐसी गोपनीयता क्यों बरती जाती है? आम तौर पर यह तर्क दिया जाता है कि सरकार के मुखिया की सेहत राष्ट्रीय हित का मसला होते हुए भी उसे राष्ट्रीय विमर्श का मुद्दा नहीं बनाया जाना चाहिए। यह कुछ सीमित अर्थों में सही हो सकता है, खासकर देश के किसी बड़े खतरे से निपटने के समय।

लेकिन हमने आत्मकथाओं एवं इतिहास से जो कुछ भी सीखा है, उसके मुताबिक केवल राष्ट्रीय हित की वजह से यह गोपनीयता नहीं बरती जाती है। इसकी कहीं बड़ी वजह राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों से संभावित खतरा है, अगर उन्हें पता चल गया तो वे क्या करेंगे?

मोहम्मद अली जिन्ना की खराब सेहत के बारे में केवल उनके डॉक्टर जाल रतनजी पटेल को ही मालूम था। लेकिन पटेल ने इसे एकदम गोपनीय रखा। जिन्ना गंभीर बीमारी की वजह से सितंबर 1948 में चल बसे।

इसके उलट महात्मा गांधी की सेहत के बारे में सब जानते थे। असल में, गांधी जी को अपनी सेहत के बारे में चर्चा करने में मजा आता था। इसकी वजह कहीं यह तो नहीं थी कि उनका कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं था जिसे लेकर वह फिक्र करें।

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