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गलत पड़ताल से नहीं निकलेगा कोई हल

नीति नियम
मिहिर शर्मा /  April 15, 2020

सीमित समझ होने पर हमें लगता है कि हर समस्या का हल एक ही है। तमाम अर्थशास्त्रियों और उद्योगपतियों की मौजूदा आर्थिक दिक्कतों का हल किसी न किसी तरह के प्रोत्साहन में ही नजर आ रहा है। लेकिन कोविड-19 महामारी और उससे जुड़ी आर्थिक लागत आम मंदी की तरह नहीं हैं। हमें सामान्य तौर पर अपनाए जाने वाले उपायों का इस्तेमाल करने में सावधानी बरतनी होगी। पिछली हर मंदी के दौरान आपूर्ति झटका महसूस किया गया हो लेकिन अर्थशास्त्री समेकित मांग में कमी को लेकर प्रतिक्रिया देते हैं। ब्याज दर मेंं कमी, अपारंपरिक मौद्रिक नीति या बॉन्ड खरीद, कर कटौती या सरकारी व्यय के माध्यम से नकदी डाली जाती है। क्या मौजूदा संकट में यह उचित हल है? शायद नहीं। उपचार समस्या की सही पहचान पर निर्भर करता है। इस मामले में समेकित मांग को झटका असल मसला नहीं है। लॉकडाउन और आपूर्ति शृंखला बाधित होने से मांग पर असर पड़ा है लेकिन वह असल समस्या नहीं है। बल्कि यह मौजूदा समस्या के उपचार का हिस्सा है। हम पहले के स्तर पर उत्पादन नहीं चाहते क्योंकि समाज पहले जैसा नहीं रह गया है। टीका बनने तक हालात एकदम अलग रहेंगे। लोगों के घर में रहने से मांग कम होनी तय है। इससे उत्पादन भी प्रभावित होगा। ऐसे मेंं अर्थव्यवस्था के गलत क्षेत्रों मेंं सक्रियता बढ़ाने का नुकसान उठाना पड़ सकता है।

किसी मरीज को जब जानबूझकर कोमा में डाला गया है तो उसे जगाने के लिए प्रोत्साहन देने का कोई अर्थ नहीं है। इसका यह अर्थ नहीं कि इन हालात में समन्वित सरकारी कदमों की कोई भूमिका ही नहीं है। सरकार तब तक अर्थव्यवस्था को बचाने और वायरस को नियंत्रित करने में अहम भूमिका निभा सकती है, जब तक कि गतिविधियां पहले की तरह सामान्य नहीं हो जातीं।

जरूरी नहीं कि ये कदम व्यापक वित्तीय प्रोत्साहन की तुलना में कम लागत वाले हों। यहां बात पैसे बचाने की नहीं बल्कि उचित आर्थिक उपाय करने की है। अर्थशास्त्री एमैनुएल साएज और गैब्रिएल जकमैन जो प्रोत्साहन के हिमायती हैं, उनका कहना है कि एक उचित तरीका यह होगा कि सरकार की कल्पना अंतिम तौर पर भुगतान करने वाले के रूप में की जाए। घर में बैठे लोगों के सार्वभौमिक बेरोजगारी बीमा का बोझ राजकोष वहन कर सकता है। लॉकडाउन में बंद कारोबारों, किराये, ब्याज आदि का भुगतान भी वहन किया जा सकता है।

कई जगह मौद्रिक प्रोत्साहन पर विचार किया जा रहा है। लेकिन यूरोप की आंतरिक बुनावट ऐसी है कि एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में राजकोषीय हस्तांतरण दिक्कतदेह हो सकता है। यह ईसीबी पर है कि वह यूरो क्षेत्र के अधिक संकटग्रस्त इलाकों की मदद करे। परंतु अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व द्वारा प्राथमिक बाजार कॉर्पोरेट ऋण सुविधा की शुरुआत खतरनाक है। बैंक ने कहा कि पीएमसीसीएफ कंपनियों की ऋण तक सीधी पहुंच मुहैया कराएगा ताकि वे बेहतर ढंग से कारोबार कर सकें और महामारी के दौर में क्षमता बनाए रख सकें। यही करने की जरूरत है। परंतु मौद्रिक प्राधिकार की मदद से नहीं। फेडरल बैंक के एक पूर्व अधिकारी का कहना है कि फेडरल बैंक को पीएमसीसीएफ जैसे उपाय के माध्यम से सीधे कंपनियों को ऋण देने का काम नहीं करना चाहिए, क्योंकि फेड नकदी की समस्या दूर करने में लगा है। उसका सीधा ऋण देनदारी में चूक का जोखिम बढ़ाएगा वह भी बिना किसी क्षतिपूर्ति के। उनका कहना है कि यह सीधे तौर पर करदाता के पैसे से कॉर्पोरेट सब्सिडी देने का मामला है तथा केंद्रीय बैंक की क्षमता के बाहर की बात है। कोई केंद्रीय बैंक यह तय करने की स्थिति में नहीं है कि कौन सी कंपनी मजबूत है। केंद्रीय बैंक यह भी नहीं तय कर सकता है कि कौन सा क्षेत्र या कंपनी व्यापक राष्ट्रीय हित में है जिसे रियायत दी जाए। यह निर्वाचित प्रतिनिधियों का काम है।

कुछ मायनों में कॉर्पोरेट बॉन्ड खरीदना भी संदेहास्पद हस्तक्षेप प्रतीत होता है। इससे वे कंपनियां लाभान्वित हो सकती हैं जिन्हें शायद सब्सिडी की जरूरत ही न हो। भारतीय रिजर्व बैंक ने लंबी अवधि के पुनर्वित्तीय परिचालन (टीएलटीआरओ) को लक्षित किया है। यह एक तरीका है जिससे बैंकों को कॉर्पोरेट बॉन्ड और वाणिज्यिक पत्र खरीदने में सहयोग मिले। परंतु शुरुआती नीलामी में नतीजे बहुत उत्साहित करने वाले नहीं रहे। हालांकि रघुराम राजन समेत कई अर्थशास्त्रियों ने इसका समर्थन किया था। यदि यह कानूनी होता (आरबीआई अधिनियम की धारा 18 इन हालात में केंद्रीय बैंक को उल्लेखनीय ताकत देती है) तो जोखिम प्रबंधन का बेहतर तरीका शायद एक नई संस्था को ऋण देने का होता। ऐसी संस्था जो शायद सरकार नियंत्रित विशिष्ट निवेश उपक्रम हो। सही तरीका यही होगा कि बैंकों को नकदी मुहैया कराई जाए लेकिन केंद्र और राज्य सरकारों को यह सुविधा हो कि वे निगमों की मदद का तरीका स्वयं निर्धारित करें। इससे जवाबदेही सुनिश्चित होगी और अस्पष्टता खत्म होगी। तब सरकार प्रत्यक्ष लागत चुकाने पर मजबूर होगी। बैंकों ने टीएलटीआरओ सुविधा का इस्तेमाल प्रमुख तौर पर उच्च दर वाले कॉर्पोरेट बॉन्ड में निवेश में किया है। सच यही है कि यह अतिरिक्त नकदी उच्चतम दर वाली कंपनियों में जाएगी जो जरूरी नहीं कि वे कंपनियां हों जिन्हें तीव्र सुधार की आवश्यकता हो।

एक व्यवस्थित राहत और सुधार पैकेज केवल तभी काम करेगा जब सरकार ऋण ले सके। केंद्र सरकार अच्छा करेगी लेकिन राज्य के बॉन्ड अब कॉर्पोरेट बॉन्ड से बेहतर प्रतिफल देंगे। यह विचित्र है क्योंकि राज्यों को जन स्वास्थ्य और आर्थिक सुधार के मोर्चों पर जीवन मरण के प्रश्न से जूझना होगा। राज्यों की उधारी सीमा में एकबारगी रियायत सीमा पर विचार किया जाना चाहिए।

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