बिजनेस स्टैंडर्ड - आर्थिक प्रभाव और निपटने के कदम
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आर्थिक प्रभाव और निपटने के कदम

नीलकंठ मिश्रा /  April 14, 2020

चंद रोज पहले मेरी माताजी ने मुझसे कहा, 'मैंने देखा है कि कैसे जब दुश्मन केयुद्धक विमान हमारे सर के ऊपर से गुजरते थे तो कैसे बिजली गुल कर दी जाती थी, मैं केरोसिन लेने के लिए लंबी कतारों में खड़ी हुई हूं और खाद्यान्न की कमी से भी जूझी हूं लेकिन मैंने इससे पहले कभी ऐसा कुछ नहीं झेला।' दुख की बात है कि केवल उन्होंने ही नहीं मुझ समेत हमारे दौर के तमाम पर्यवेक्षकों के लिए आर्थिक पूर्वानुमान और वित्तीय बाजार पूर्वानुमान की दृष्टि से भी बात कुछ ऐसी ही है।

इससे पहले फैली वैश्विक महामारियां या तो स्थानीय थीं (2003 में सार्स) या फिर ऐसे मामले बहुत पुराने थे। मसलन सन 1968 का हॉन्गकॉन्ग फ्लू, आधी सदी पहले फैला था और सन 1918 का घातक स्पैनिश फ्लू एक सदी पहले। इससे निपटने के नीतिगत उपाय भी अलग-अलग रहे। अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने बीते दो सप्ताह में अप्रत्याशित हस्तक्षेप किए हैं। दुनिया भर की सरकारों ने भारी प्रोत्साहन पैकेज दिए हैं। दुनिया आपस में पहले से ज्यादा जुड़ गई है।

ऐसे में पहले सिद्धांत की शरण में जाना होगा। मान लेते हैं कि दुनिया भर की तमाम गैर अनिवार्य सेवाएं दो महीने के लिए बंद कर दी जाती हैं और जिन लोगों का बाहर जाना जरूरी नहीं हो वे घर पर ही रहते हैं। जाहिर है अनिवार्य की परिभाषा अलग-अलग देशों में लोगों के लिए अलग-अलग है। परंतु इसे सहज बनाने के लिए हम अनिवार्य की परिभाषा को खाद्य और बुनियादी किराने और बिजली, पानी, सफाई, कचरा प्रबंधन, अनिवार्य स्वास्थ्य सुविधाओं, दूरसंचार (सोशल मीडिया, टीवी और वीडियो), ईंधन या वित्तीय सेवाओं (बैंक, बीमा और प्रतिभूति बाजार) आदि तक सीमित कर देते हैं। दो महीने के बाद हर चीज सामान्य हो जाती है।

आर्थिक उत्पादन और वित्तीय बाजारों पर इसका दीर्घकालिक प्रभाव क्या होगा? क्या सबकुछ पहले जैसा हो जाएगा या नहीं?

इन दो महीनों में अनिवार्य वस्तुओं की आपूर्ति करने वालों और सेवा क्षेत्र की आय बनी रहेगी। भले ही इसकी गति कम रहे। हमारा अनुमान है कि देश की श्रमशक्ति का दो तिहाई हिस्सा इस क्षेत्र में आता है। अन्य देशों में ऐसा नहीं होगा क्योंकि भारत के अधिकांश श्रमिक कृषि क्षेत्र में काम करते हैं जो लॉकडाउन से काफी हद तक अप्रभावित हैं। हमारे आधे से अधिक खुदरा दुकानदार खाद्यान्न और बुनियादी किराना बेचते हैं। दालों, अनाज, सब्जियों और फलों की मांग में कमी नहीं आएगी। मांस की मांग अवश्य कम हो सकती है। वैकल्पिक शल्य चिकित्सा टल सकती है क्योंकि लोग संक्रमण के डर से अस्पताल से दूर ही रहेंगे और ईंधन की मांग में कमी आएगी क्योंकि लोग बाहर नहीं निकल रहे। इन कारोबार से जुड़े लोगों के खर्च भी इस दौरान कम होंगे लेकिन उनके अस्तित्व पर खतरा नहीं आएगा।

वास्तविक असर गैर जरूरी वस्तुओं और सेवाओं की खपत पर पड़ेगा। विनिर्माण ठप पड़ गया है, कपड़े से लेकर जूता और उपभोक्ता वस्तुओं तक तमाम फैक्टरियां बंद हैं। फर्नीचर, वाहन और कलपुर्जे तक सारा कारोबार ठप है। निजी विद्यालय और ट्यूशन बंद है, हालांकि वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग और ऑनलाइन टूल विकल्प के तौर पर काम आ सकते हैं। ऑटो, ट्रेन, बस और उड़ान आदि सभी बंद हैं। लोग अवकाश पर नहीं जा रहे हैं, न फिल्में देखते हैं और न खाना खाते हैं। इसमें वस्तुओं और सेवाओं के निर्यात को जोड़ा जाना चाहिए। वहां मांग में कमी यात्राओं पर प्रतिबंध तथा अन्य शहरों में लॉकडाउन की वजह से है।

इन उद्यमों तथा कुछ हद तक अनिवार्य वस्तुएं और सेवाएं मुहैया कराने वाले उद्यमों के लिए एक चुनौती तयशुदा कीमत की है। यह वह लागत है जिसका बोझ उठाना ही पड़ता है, भले ही उत्पादन की मात्रा कितनी भी हो। इसमें मोटे तौर पर वेतन, ब्याज भुगतान, किराया और विभिन्न सुविधाओं के बिल आदि शामिल हैं। ये सभी हस्तांतरण हैं: कोई चुकाता है और कोई हासिल करता है। यदि लॉकडाउन अवधि में घड़ी को रोका जा सकता तो व्यवस्थागत स्तर पर होने वाले नुकसान को न्यूनतम किया जा सकता और हालात सामान्य हो सकते हैं। इकलौती दिक्कत दैनिक वेतनभोगियों को आ सकती है। उनके लिए दो महीने के लॉकडाउन के बाद दोबारा बचत तैयार करना मुश्किल होगा।

परंतु इससे राजकोषीय मोर्चे पर निपटा जा सकता है। उदाहरण के लिए किराये की बात करें तो आदर्श स्थिति में मकान मालिक समझेंगे कि किरायेदार को बाहर निकालकर महीनों तक मकान खाली रखने से बेहतर होगा कम किराये पर उसे बरकरार रखना। आवास कीमतों की तरह किराये में भी गिरावट आएगी।

वेतन के साथ अलग बात है। संस्थागत स्मृति के क्षरण से और कुछ मामलों में समूचे उपक्रम बंद होंगे। कामगारों की तादाद कम होगी और महाराष्ट्र और तेलंगाना की तरह कुछ राज्य वेतन कटौती भी कर सकते हैं। इन राज्यों में वेतन और पेंशन अस्थायी रूप से 75 फीसदी तक कम किया जा रहा है। यह कटौती आय के स्तर के हिसाब से समायोजित की जा रही है। कम वेतन वालों की कटौती कम है ताकि सभी अपनी अनिवार्य आवश्यकताएं पूरी कर सकें। यदि कुछ निजी कंपनियां घटा हुआ वेतन भी दे सकीं तो वे शायद ऐसा करेंगी लेकिन इसके लिए जरूरी है कि भविष्य में मजबूत वृद्धि का वादा हो। ताकि उनकी आशाएं बरकरार रहें।

बैंकिंग तंत्र में सालाना 10 लाख करोड़ रुपये का ब्याज भुगतान और गैर बैंकिंग क्षेत्र में 5 लाख करोड़ रुपये का ब्याज भुगतान किया जाता है। इससे व्यवस्थागत स्तर पर निपटना मुश्किल है। रिजर्व बैंक ने ब्याज भुगतान स्थगित करने का विकल्प दिया है और भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड ने देनदारी चूक के दिशानिर्देश शिथिल किए हैं। ये अहम कदम हैं लेकिन लागत तो उत्पन्न होती रहेगी। कर्जदार और कर्ज लेने वाला दोनों ऋण भुगतान को आगे विलंबित करने के लिए ऋण की अवधि पर नए सिरे से चर्चा करेंगे। परंतु सूक्ष्म वित्त जैसे ऋणों के पास यह विकल्प नहीं होगा। यदि इन लागत को समाप्त किया जाए तो कर्जदार अपनी देनदारियां कैसे निपटाएंगे? बैंक बचत खाते और सावधि जमा के ब्याज को टाल नहीं सकते।

यह ढांचा बताता है भले ही घड़ी को रोकना आदर्श हो लेकिन वैसा करना संभव नहीं है। उद्यमों पर पडऩे वाले आर्थिक प्रभाव को कम करने के लिए दोहरी नीति अपनानी होगी। एक तरफ लॉकडाउन के दौरान उद्यमों की नकदी तक पहुंच सुनिश्चित करनी होगी और दूसरी ओर भविष्य के लिए मजबूत वृद्धि सुनिश्चित करनी होगी।

Keyword: Economic, Coronavirus, Lockdown, लॉकडाउन, कोरोनावायरस, महामारी, बिजली, बीमा,
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