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एमएसएमई में भ्रम और निराशा का माहौल

श्रेया जय /  April 14, 2020

ओखला औद्योगिक क्षेत्र में प्लास्टिक का सामान बनाने वाली एक फैक्टरी में काम करने वाले मनोज शुक्ला कहते हैं, 'मुझे पता नहीं कौन बेहतर स्थिति में है। वे मजदूर जो गांव लौट गए हैं या मैं। जो गांव चले गए हैं, उन्हें शायद ही अब नौकरी मिलेगी। मैं यहीं रहा लेकिन मुझे किराने का सामान खरीदने के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है।'

शुक्ला को इस इलाके में चहलपहल की आदत थी। यहां की सड़कों में काफी भीड़भाड़ रहती थी। इनमें लकदक सफेद कमीज पहने युवा प्रबंधक स्नातक और शुक्ला जैसे दिहाड़ी मजदूर शामिल थे। ब्रेक के समय सभी आसपास के ठेलों में चाय पीने के लिए एकत्र होते थे। इस औद्योगिक क्षेत्र में स्थित इकाइयों में इलेक्ट्रॉनिक्स से लेकर दवा बनाने तक का काम होता है। ओखला औद्योगिक क्षेत्र में एक तरफ कई कंपनियों के कॉरपोरेट ऑफिस हैं और दूसरी ओर सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्योगों की फैक्टरियां। लेकिन अब यहां की चहलपहल गायब हो चुकी है। सड़कों पर ट्रकों की कतार है जिन्हें कहीं नहीं जाना है।

शुक्ला जैसे अन्य लोग फैक्टरियों के आसपास के बसे इलाकों हरकेश नगर, संजय कॉलोनी, संजय नगर और ओखला फेज-2 की सस्ती आवासीय बस्तियों में रहते हैं। ये सभी एमएसएमई उद्योग में काम करते हैं और जानते हैं कि यह क्षेत्र कोविड-19 महामारी और उसके कारण आने वाली आर्थिक मंदी को झेलने की स्थिति में है।

एमएसएमई मंत्रालय की 2018-19 की सालाना रिपोर्ट के मुताबिक नई दिल्ली में 936,000 पंजीकृत कंपनियां हैं जिनमें करीब 23 लाख कुशल और अद्र्धकुशल कारीगर काम करते हैं। मुलतानी फार्मास्यूटिकल्स के चेयरमैन प्रदीप मुलतानी ने कहा, 'यह ऐसी स्थिति है जिसमें ज्यादा कुछ नहीं किया जा सकता है। सरकार शानदार काम कर रही है। लेकिन जमीनी स्तर पर भ्रम की स्थिति बनी हुई है। सरकार ने हमें कामगारों को पूरा वेतन देने को कहा है। लेकिन मजदूर जा चुके हैं। उनके बिना हम हैंड सैनिटाइजर का उत्पादन तेज नहीं कर सकते हैं।'

उन्होंने कहा कि अभी उनके पास केवल 25 फीसदी कामगार ही रह गए हैं। मुलतानी उनके वेतन का भुगतान कर रहे हैं और उन्हें खानापीना मुहैया करा रहे हैं। उन्होंने कहा कि उनकी इकाइयां हैंड सैनिटाइजर बनाने और भेजने के लिए तैयार हैं। मुलतानी ने कहा, 'हम जरूरी सेवाओं में आते हैं और मूल्य नियंत्रण के दायरे में भी हैं। लेकिन हमें दो से अधिक कर्फ्यू पास नहीं मिल रहे हैं। लॉजिस्टिक्स में भी परेशानी हो रही है।'

मुलतानी इस मायने में भाग्यशाली हैं कि उनकी फैक्टरी कम से कम काम तो कर पा रही है। कई छोटी इकाइयों का तो बुरा हाल है। इस इलाके में एक इलेक्ट्रिक केबल कंपनी ने तो अपनी अतिरिक्त केबल को सड़क पर डाल रखा है क्योंकि उसके पास गोदाम की जगह नहीं है। इस इकाई में तैनात गार्ड और वहां खड़े तीन अस्थायी कामगार मायूस दिख रहे हैं। उनमें से एक मजदूर ने कहा, 'साहब ने परचून का सामान खरीदने के लिए हमें अभी-अभी कुछ एडवांस दिया है। हमें पता नहीं है कि अगले महीने वेतन मिलेगा या नहीं।' इलेक्ट्रॉनिक सामान उद्योग में 70 फीसदी एमएसएमई इकाइयां हैं। उद्योग को आशंका है कि इनमें से अधिकांश कुछ ही महीनों में गैर-निष्पादित परिसंपत्तियां बन जाएंगी। इंडियन इलेक्ट्रिकल्स ऐंड इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ने इसी महीने वित्त मंत्रालय को लिखे एक पत्र में कहा था, एक तरफ तो हमारा काम बंद है, कोई नया ऑर्डर नहीं है और नकदी नहीं आ रही है, दूसरी ओर हमारी कई नियामकीय देनदारियां हैं जिनमें नकदी जाएगी और नकदी का गंभीर संकट पैदा होगा।

संगठन ने सरकार से इस मामले में हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया है ताकि उद्योग की कार्यशील पूंजी जरूरतों में सुधार हो और नकदी बचाई जा सके। उसकी मांग है कि ईपीएफ, ईएसआई और बोनस का भुगतान छह महीने तक टाला जाना चाहिए। साथ ही जीएसटी और टीडीएस जमा में भी छह महीने की मोहलत मिलनी चाहिए। सरकार को सभी बीमा कंपनियों की किस्त अदायगी की तिथियां आगे बढ़ाने की अनुमति देनी चाहिए जबकि कवरेज जारी रहना चाहिए।

सुनसान पड़ी सड़कों पर सैकड़ों ट्रक और टेम्पो खड़े हैं जिन पर धूल की मोटी परत चढ़ी है। ट्रक ड्राइवर और क्लीनर नदारद हैं। फैक्टरियों के बीच स्थित गलियों में छोटे-छोटे कमरे बने हैं जहां फैक्टरी मजदूर किराये पर रहते हैं। यहां सामाजिक दूरी संभव नहीं है। उन्हें पानी के एकमात्र नल और छोटी-छोटी दुकानों के आसपास भीड़ लगानी पड़ती है। दिल्ली नगर निगम के एक अधिकारी ने साफ-सफाई और दवा के छिड़काव के बाद जब इस इलाके का दौरा किया तो यहां की स्थिति देखकर झल्ला उठे। उन्होंने कहा, 'हम रोज उन्हें एहतियाती उपायों के बारे में बताते हैं लेकिन वे नहीं सुनते हैं।'

एक सिंथेटिक फैब्रिक फैक्टरी में काम करने वाले सन्नी राणा लॉकडाउन के कारण परेशान हैं। राणा के पिता गांव से उनसे मिलने के लिए आए थे लेकिन लॉकडाउन के कारण फंस गए। राणा के पिता, राणा, उनकी पत्नी और दो बच्चे दो कमरों में रह रहे हैं। उनके बच्चे इस बात को लेकर परेशान हैं कि वे बाहर खेलने नहीं जा सकते हैं। उनकी समझ में नहीं आ रहा है कि आसपास के सारे बच्चे अचानक कहां गायब हो गए हैं। राणा ने कहा, 'मैं फैक्टरी से कुछ दूर रहता हूं। जब मेरा दोस्त अपने गांव गया और मैं नहीं जा सका तो मैं उसके कमरे में शिफ्ट हो गया जो फैक्टरी से बराबर में है। इससे मैं देख स सकता हूं कि फैक्टरी कब खुलती है और मैनेजर अब आता है। मैनेजर ने मुझे 2,000 रुपये एडवांस दिए थे और उसके बाद से उसका फोन बंद है।'

(पहचान उजागर नहीं करने के लिए कुछ नामों को बदला गया है)

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