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खत्म होनी चाहिए उद्योग की बंदी

श्यामल मजूमदार /  April 13, 2020

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) ने पिछले सप्प्ताह एक अहम बात कही कि संगठित क्षेत्र के कामगारों और उद्यमों के लिए तत्काल उपाय करने की जरूरत है ताकि कोविड-19 संकट के कारण उन्हें फिर से असंगठित क्षेत्र में जाने से बचाया जा सके। आईएलओ का कहना एकदम सही है क्योंकि अब यह पूरी तरह साफ हो चुका है कि देश 14 अप्रैल के बाद पूर्ण लॉकडाउन में विस्तार को झेलने की स्थिति में नहीं है।

आईएलओ के आंकड़ों के मुताबिक देशव्यापी लॉकडाउन के कारण असंगठित क्षेत्र के करीब 40 करोड़ कामगार गरीबी के कुचक्र में फंस सकते हैं। 25 मार्च से शुरू हुए इस लॉकडाउन के कारण बड़ी आर्थिक गतिविधियां पूरी तरह ठप हैं जिससे असंगठित क्षेत्र के कामगारों की आजीविका को खतरा पैदा हो गया है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकनॉमी के महेश व्यास ने पिछले सप्ताह मंगलवार को इस अखबार के अंग्रेजी संस्करण में अपने लेख में कहा था कि मार्च में बेरोजगारी की दर पहले ही 8.7 फीसदी के चिंताजनक स्तर पर पहुंच गई थी। सेंटर ने तीन साल पहले देश में बेरोजगारी के बारे में अपना सर्वेक्षण शुरू किया था और उसके बाद से मार्च में बेरोजगारी दर सबसे अधिक थी। इससे भी ज्यादा परेशान करने वाली बात यह है कि मार्च के अंत में  जब लॉकडाउन शुरू किया गया था तो बेरोजगारी की दर बढ़कर 23.8 फीसदी हो गई।

इसके कारण साफ हैं। लाखों कामगारों के वेतन में कटौती और छंटनी की आशंका है। आय पैदा करने वाली गतिविधियों पर इसका प्रभाव खासकर असुरक्षित कामगारों और असंगठित अर्थव्यवस्था के सबसे कमजोर तबकों के लिए बेहद कठोर है। जाहिर है कि संगठित क्षेत्र के लिए भी स्थिति बहुत अच्छी नहीं हो सकती है।

उदाहरण के लिए सरकार ने कंपनियों को नौकरियों में कटौती नहीं करने का सुझाव दिया है लेकिन भारतीय उद्योग परिसंघ द्वारा देस की प्रमुख कंपनियों के मुख्य कार्याधिकारियों के बीच कराए गए सर्वेक्षण में आधे से अधिक का कहना था कि 15 से 30 फीसदी छंटनी अपरिहार्य है। रिटेलर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने कहा है कि अगर सरकार ने हस्तक्षेप नहीं किया तो खुदरा क्षेत्र में काम कर रहे 60 लाख कामगारों में से करीब 40 फीसदी की नौकरी जा सकती है।

यह एक आपदा होगी। इसलिए उद्योग को समुचित सुरक्षा दिशानिर्देशों के साथ ऐसे इलाकों में जल्दी से जल्दी अपना कामकाज करने की अनुमति दी जानी चाहिए जहां संक्रमण नहीं हैं। साथ ही कामगारों को चरणबद्ध तरीके से उनके कार्यस्थल तक पहुंचाने के लिए सरकारी प्रयासों की जरूरत है। प्रवासी कामगारों को जल्दी से जल्दी वापस लाया जाना चाहिए क्योंकि उनके पास अपने परिवार की मदद के लिए दैनिक आय का कोई जरिया नहीं होता है।

अगर ऐसा नहीं हुआ तो उद्योगों के बंद होने का कारण प्रभावित होने वालों की एक अंतहीन सूची होगी। पर्यटन, मनोरंजन, रियल एस्टेट, निर्माण और दूसरे कई क्षेत्रों में देश के अधिकांश कामगारों को रोजगार मिलता है। क्या सरकार हर कारोबार को संभाल सकती है? और कब तक? लॉकडाउन के दबाव के कारण प्रभावित होने वाले कारोबार की संख्या बढऩे पर उनके लिए मदद की जरूरत भी घातांक दर से बढ़ती जाएगी जो किसी भी सरकार के बूते से बाहर की बात होगी। सच्चाई यह है कि जब बड़े कारोबार बंद होते हैं तो वे अपने साथ कई अन्य कारोबार को ले डूबते हैं और उनसे पैदा होने वाले रोजगार हमेशा के लिए बंद हो सकते हैं। उदाहरण के लिए अगर लॉकडाउन आगे भी जारी रहता है और आंशिक रूप से भी कारोबार शुरू करने की तत्काल अनुमति नहीं दी जाती है तो भारतीय निर्यातकों को निर्यात के बड़े ऑर्डर से हाथ धोना पड़ सकता हैं क्योंकि वे विदेश में अपने ग्राहकों को अपने उत्पाद के नमूने नहीं भेज पाएंगे। इन्हीं नमूनों से उन्हें बाद में पक्के अनुबंध हासिल होंगे। ऐसे नमूने अप्रैल और मई में भेजे जाते हैं और बांग्लादेश तथा चीन ने पहले ही अपने नमूने भेजने शुरू कर दिए हैं। इसलिए हमारे पास गंवाने के लिए एक पल का भी समय नहीं है।

लॉकडाउन के कारण ऐसे क्षेत्र भी मुश्किल में फंसने लगे हैं जो छोटे-मोटे संकट झेल सकते हैं। इनमें वित्तीय सेवा क्षेत्र भी शामिल है। अब बजाज फाइनैंस द्वारा जारी आंकड़ों को ही देखिए। कंपनी का कहना है कि देशव्यापी लॉकडाउन की घोषणा के बाद मार्च में अंतिम दस दिनों में 350,000 खाते और 4,750 करोड़ रुपये की परिसंपत्तियां उसके हाथ से निकल गईं।

ज्यादा दिलचस्प बात यह है कि प्रबंधन ने लॉकडाउन की समयसीमा के आधार पर तीन कारोबारी परिदृश्य सामने रखे हैं। पहले परिदृश्य के मुताबिक अगर निर्धारित समयसीमा के तहत 14 अप्रैल को लॉकडाउन हटाया जाता है तो कंपनी को उम्मीद है कि मई तक उसका 60 फीसदी सामान्य कारोबार लौट आएगा और सितंबर तक पूरी तरह सामान्य स्थिति बहाल हो जाएगी। दूसरे परिदृश्य में अगर लॉकडाउन 30 अप्रैल को हटाया जाता है तो इस एनबीएफसी को उम्मीद है कि पूरी तरह सामान्य स्थिति अक्टूबर में बहाल हो पाएगी। लेकिन इस सूरत में क्रेडिट लागत (रकम जो उसने फंसे ऋण के लिए अलग रखी है) 50 से 60 फीसदी अधिक होगी।

तीसरे परिदृश्य में अगर लॉकडाउन 15 मई को खत्म होता है तो कंपनी का अनुमान है कि मार्च में कोई कारोबार नहीं होगा, मई में यह 30 फीसदी होगा और जून में 50 फीसदी। यह चौथी तिमाही में सामान्य स्थिति में लौट पाएगा। इसका सबसे बदतर पहलू यह है कि क्रेडिट लागत पूरे साल के आधार पर 80-90 फीसदी अधिक होगी। कंपनी का कहना है कि अगर ऐसा होता है तो उसे परिचालन लागत के बारे में कठोर फैसला लेना होगा और इसमें 12 से 15 फीसदी कटौती की संभावना तलाशनी होगी जो अभी 7 से 8 फीसदी है।

यह बेबाक टिप्पणी दिखाती है कि क्यों भारत को 14 अप्रैल के बाद पूर्ण लॉकडाउन नहीं बढ़ाना चाहिए। अगर देश की सबसे कुशल प्रबंधन वाली गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनी का यह हाल हो सकता है तो कल्पना कीजिए कि इस लॉकडाउन का दूसरी कंपनियों पर क्या असर हो सकता है।

इनमें से किसी भी सुझाव का यह आशय नहीं है कि सरकार को नियमों को शिथिल करने पर विचार करना चाहिए। लेकिन यह भी सच है कि लॉकडाउन को अनिश्चितकाल के लिए नहीं बढ़ाया जा सकता है क्योंकि इसे भयावह परिणाम होंगे। इसलिए कोविड-19 के संक्रमण को फैलने से रोकने के उपायों और आर्थिक जरूरतों के बीच संतुलन कायम करते हुए देशव्यापी लॉकडाउन को चरणबद्ध तरीके से हटाया जाना चाहिए। केरल सरकार की एक उच्चाधिकार प्राप्त समिति द्वारा इसे चरणबद्ध तरीके से हटाने के बारे में दिया गया सुझाव एक अच्छा प्रारूप हो सकता है। इसे लागू किया जाना चाहिए अन्यथा जितनी देर उद्योग में पूर्ण लॉकडाउन रहेगा, उसे सामान्य स्थिति में लाने का रास्ता उतना ही पेचीदा होगा।

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