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एकीकृत श्रम बाजार

संपादकीय /  April 13, 2020

यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि देशव्यापी लॉकडाउन से भारतीयों का जो तबका सबसे अधिक प्रभावित हुआ है वह है प्रवासी श्रमिक। जो श्रमिक रोज कमाने खाने वाले थे वे लॉकडाउन के बाद एकदम असहाय हो गए और उन्होंने अपने पुश्तैनी घरों को लौटने का फैसला किया। अल्पावधि में जहां यह लॉकडाउन को लेकर बेहतर संवाद स्थापित करने की जरूरत पर बल देता है, वहीं यह भी बताता है कि शहरी इलाकों में कल्याणकारी सुविधाओं का विस्तार करने की आवश्यकता है। मध्यम से लंबी अवधि के दौरान इसका श्रम बाजार पर काफी असर हुआ है। यह स्पष्ट है कि सरकार व्यापक तौर पर इस सहलग्नता को समझती है। जानकारी के मुताबिक सरकार प्रस्तावित श्रम संहिता को आपात स्थिति में अध्यादेश के जरिये लागू करने पर विचार कर रही है। बहरहाल श्रम बाजार में किए जाने वाले बदलावों की प्रकृति को ठीक से समझा जाना आवश्यक है। प्रवासी श्रमिकों की अस्थिरता का एक संभावित कारण श्रम बाजार का वर्गीकरण भी है जिसमें संगठित क्षेत्र भी शामिल है। यह स्थायी और अस्थायी में बंटा हुआ है। स्थायी कर्मियों को जहां अत्यधिक सुरक्षा हासिल होती है जबकि अस्थायी कर्मचारियों को कोई सुरक्षा नहीं मिलती। यह विभाजन काफी लंबे समय से है। उस समय से जब यह समझ लिया गया था कि इससे नियोक्ता, कर्मचारी और व्यापक अर्थव्यवस्था किसी को मदद नहीं मिलती। इस बार तो बंटे हुए श्रम बाजार ने शायद एक सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट को भी तेज किया। श्रम बाजार का एकीकरण, ज्यादा लचीलापन और व्यापक सुरक्षा आदि अत्यावश्यक कदम हैं। श्रम कानूनों ने स्थायी, अस्थायी और अनुबंधित श्रमिकों के रूप में एक कृत्रिम जाति व्यवस्था निर्मित कर दी है। कुछ मामलों में तो ऐसा हो रहा है कि लोग एक ही असेंबली लाइन में एकसमान काम कर रहे हैं जबकि उनके वेतन भत्तों में बहुत अधिक अंतर है। स्थायी कर्मचारियों का वेतन अस्थायी अनुबंधित श्रमिकों से तीन गुना तक हो सकता है। इन श्रेणियों का खात्मा आवश्यक है ताकि अस्थायी और अनुबंधित श्रमिकों को भी किसी भी तरह के संकट के समय पूरी सुरक्षा मिल सके। लाभ का विस्तार सभी कामगारों तक करने के साथ-साथ श्रम बाजार को और अधिक लचीला बनाने की आवश्यकता है ताकि रोजगार का विस्तार हो सके। पर्याप्त हर्जाने के साथ की जाने वाली छंटनी को पूरे देश में कानूनी मान्यता हासिल है। इतना ही नहीं अनुबंधित श्रमिकों को काम पर रखने के लिए पर्याप्त और उचित प्रोत्साहन का भी अभाव है। जाहिर सी बात है एकबारगी ढेर सारे कर्मचारियों को काम से निकाले जाने को हतोत्साहित किया जाना चाहिए। इसका एक उचित तरीका यह है कि छंटनी किए जाने वाले कर्मचारियों को उचित आर्थिक हर्जाना दिया जाए। दुनिया भर में यह तरीका अपनाया जाता है। यकीनन कारोबारी जरूरत के आधार पर लिए जाने वाले ऐसे निर्णय में कोई सरकारी हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। देश की मौसमी रोजगार की प्रकृति को देखते हुए संहिता में इस हिस्से का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। यदि उन्हें अन्य लाभ नहीं मिलते हैं तो शायद उन्हें प्रति घंटे अन्य श्रमिकों की तुलना में ज्यादा भुगतान किया जाना चाहिए।

एक बात स्पष्ट है कि भारत अब श्रम कानूनों में बदलाव के लिए राज्य सरकारोंं पर निर्भर नहीं रह सकता। अनुत्पादक श्रम कानून राष्ट्रीय समस्या हैं जिन्हें जल्द से जल्द हल करने की आवश्यकता है। प्रवासी श्रमिक, अनुबंधित श्रमिक और ऐसे अन्य श्रमिकों को जिस संरक्षण की आवश्यकता है वह समुचित श्रम कानून ही मुहैया करा सकता है। नियोक्ताओं को यह पता होना चाहिए कि उनके श्रम कानून लचीले हैं। इससे भी कंपनियों को मध्यम से लंबी अवधि के दौरान ज्यादा कर्मचारियों को काम पर रखने का प्रोत्साहन मिलेगा।

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