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मप्र: क्वारंटीन में स्वास्थ्य विभाग

संदीप कुमार /  April 13, 2020

मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व वाली सरकार कोविड-19 महामारी से निपटने के क्रम में मुश्किल स्थिति का सामना कर रही है। प्रदेश में अब तक मंत्रिमंडल का गठन नहीं हुआ है इसलिए वहां कोई स्वास्थ्य मंत्री भी नहीं है। राज्य के जिस स्वास्थ्य विभाग को कोरोना के खिलाफ लड़ाई लडऩी थी वह निष्क्रिय पड़ा है। कारण? प्रमुख सचिव स्वास्थ्य पल्लवी जैन गोविल, मप्र स्वास्थ्य निगम के प्रबंध निदेशक जे विजय कुमार समेत विभाग में पदस्थ चार आईएएस अधिकारी तथा 40 से अधिक अन्य कर्मचारी स्वयं कोरोनावायरस संक्रमण के शिकार हैं।


स्वास्थ्य संकट

कुमार और गोविल के पॉजिटिव आने के बाद सरकार की पहली प्रतिक्रिया खबर को दबाने की रही। इसके चलते वायरस स्वास्थ्य विभाग के तमाम अधिकारियों तक फैल गया। सोमवार शाम तक भोपाल में कोविड के 142 पॉजिटिव मामले थे जिनमें से 80 से अधिक स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी और उनके परिजन हैं। यहां तक कि कोरोनावायरस कंट्रोल रूम भी संक्रमण से अछूता नहीं रहा। वहां भी वीणा सिन्हा (अतिरिक्त निदेशक स्वास्थ्य संचार) और एक अन्य अधिकारी पल्लव दुबे कोरोना से संक्रमित मिले।

इसके बावजूद शुरुआत में शीर्ष अधिकारी अस्पताल में आइसोलेट होने को तैयार नहीं हुए। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) भोपाल के निदेशक डॉ. सरमन सिंह ने गोविल को लिखे पत्र में कहा, 'यह पत्र आपके और स्वास्थ्य आयुक्त फैज अहमद किदवई के साथ टेलीफोन पर हुई चर्चा के संदर्भ में है। जैसा कि आपने बताया आपके कुछ अधिकारी जिनमें कोविड के लक्षण नहीं हैं, वे एम्स में भर्ती होने के अनिच्छुक हैं। ऐसे मरीजों को घर पर आइसोलेट करने की अनुशंसा की जाती है।' अभी चंद रोज पहले मुख्यमंत्री चौहान ने कहा था कि कोविड-19 के हर पॉजिटिव मरीज को अवश्य भर्ती कराया जाए।

एम्स भोपाल में पदस्थ एक अन्य चिकित्सक कहते हैं, 'यदि वरिष्ठ सरकारी अधिकारी कोविड-19 प्रोटोकॉल के बुनियादी मानकों का उल्लंघन करेंगे तो आम आदमी से क्या आशा की जाए?'

स्वास्थ्य विभाग के संक्रमित अधिकारियों में विदेश यात्रा या किसी संक्रमित से संपर्क का कोई रिकॉर्ड नहीं मिला है। ऐसे में इस संक्रमण की वजह अभी भी तलाशी जा रही है। आशंका है कि एक अधिकारी के संक्रमण के बाद महामारी से निपटने की लगातार हो रही बैठकों में यह वायरस तेजी से फैल गया। प्रदेश के जनसंपर्क आयुक्त पी. नरहरि कहते हैं, 'हम स्वास्थ्य विभाग में हुए लगातार संक्रमण का स्रोत तलाशने का प्रयास कर रहे हैं। हम उन लोगों का भी पता लगा रहे हैं जो इस बीच संक्रमित लोगों से मिले।'


राजनीतिक विफलता

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने गत 11 मार्च को कोविड-19 को महामारी घोषित किया। जिस समय देश के अधिकांश राज्य इससे जूझने की तैयारी कर रहे थे, मध्य प्रदेश राजनीतिक संकट से दो-चार था। कोविड-19 को लेकर जारी हो रही चेतावनियों के बीच कांग्रेस और भाजपा के विधायक समूह में एक रिसॉर्ट से दूसरे रिसॉर्ट में आ जा रहे थे। आखिरकार भाजपा ने प्रदेश में कांग्रेस की सरकार गिरा दी और चौहान ने 23 मार्च को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। एक दिन बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 25 मार्च से देशव्यापी लॉकडाउन की घोषणा कर दी।

प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमल नाथ कहते हैं, 'फरवरी में जब कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कोरोनावायरस के संभावित खतरों से अवगत कराया तब भाजपा एक निर्वाचित सरकार को गिराने में लगी हुई थी और बेंगलुरू में बागी विधायकों की सेवा कर रही थी।'

भाजपा के पास मौजूदा परिस्थितियों के लिए स्पष्टीकरण है। पार्टी प्रवक्ता रजनीश अग्रवाल कहते हैं, 'कैबिनेट की नियुक्ति आसान काम नहीं है। कई चीजों का ध्यान रखना होता है। मुख्यमंत्री बिना ध्यान भटकाए महामारी से निपटने में लगे हैं।'

भोपाल गैस त्रासदी के पीडि़त भी महामारी से बुरी तरह प्रभावित हैं। गैस पीडि़तों के लिए काम करने वाली रचना धींगरा कहती हैं, 'प्रदेश सरकार ने भोपाल मेमोरियल अस्पताल और शोध संस्थान (बीएमएचआरसी) को जबरन कोविड-19 अस्पताल में बदल दिया। जबकि यह अस्पताल सर्वोच्च न्यायालय के समझौते के तहत गैस पीडि़तों को मिला था। करीब 3.5 लाख गैस पीडि़त इस अस्पताल पर निर्भर हैं। आज तक कोविड का एक भी मामला यहां नहीं आया है लेकिन गैस पीडि़तों को चिकित्सा मिलनी बंद हो गई। सरकार ने कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की। यही वजह है कि पिछले 15 दिनों में तीन गैस पीडि़तों की मौत हो चुकी है।'

इस बीच प्रदेश का जनसंपर्क विभाग जोरशोर से काम कर रहा है। हाल ही में जनसंपर्क संचालनालय से जारी एक पत्र में कहा गया, 'कोविड-19 महामारी से लडऩे के लिए यह आवश्यक है कि सरकार के संबंधित कदमों का व्यापक प्रचार किया जाए। इसलिए अतिरिक्त निदेशक से लेकर सहायक सूचना अधिकारी तक सभी अधिकारियों को नियमित रूप से कार्यालय आने का निर्देश दिया जाता है।'

मंत्रिमंडल की कमी के कारण काम प्रभावित होने की बात को खारिज करते हुए नरहरि कहते हैं, 'हर जन प्रतिनिधि इस लड़ाई का हिस्सा है। मुख्यमंत्री लगातार राज्य के विधायकों और सांसदों के साथ संपर्क में हैं। हमारी प्राथमिकता महामारी को नियंत्रित करना है।'

नरहरि बताते हैं कि सरकार पूरी तैयारी के साथ महामारी से लड़ रही है। नरहरि के मुताबिक, 'शुरुआती 5 लैब के बजाय अब जांच के लिए 7 लैब हैं। अब रोजाना 100 टेस्ट के बजाय 1000 से ज्यादा टेस्ट हो रहे हैं। बीमारी से निपटने के लिए 2,000 से अधिक आईसीयू बेड और हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वि की 24 लाख गोलियों का स्टॉक है।'

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