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निजी अस्पतालों के वजूद पर संकट

सोहिनी दास और गिरीश बाबू /  04 12, 2020

वाराणसी के आसपास एक अस्पताल समूह के प्रमुख एके कौशिक कहते हैं कि इस समय उनके लिए कर्मचारियों को वेतन देना ही मुश्किल हो रहा है। बाह्य रोगी विभाग (ओपीडी) और पहले से निर्धारित ऑपरेशन के लिए मरीजों की आवक थम गई है। मरीज अस्पताल जाने से बचने की हर संभव कोशिश कर रहे हैं।

कौशिक ने कहा, 'वाराणसी, गोपीगंज और मिर्जापुर में मेरे तीन अस्पतालों में 600 कर्मचारी काम करते हैं। अब आमदनी में भारी कमी के कारण मेरे लिए उन्हें समय पर वेतन देना मुश्किल हो रहा है।' पूरे उद्योग में ओपीडी से इन-पेशेंट डिपार्टमेंट (आईपीडी) में आने यानी भर्ती होने वाले मरीजों की संख्या 10 से 12 फीसदी है। अब ओपीडी में मरीजों की संख्या बहुत कम हो गई है, इसलिए मुश्किल से ही कोई मरीज भर्ती हो रहा है। निजी अस्पताल, विशेष रूप से छोटे अस्पतालों को अपने सामने वह संकट नजर आ रहा है, जिसके लिए वे तैयार नहीं थे। विश्लेषकों का कहना है कि बड़ी अस्पताल शृंखलाओं को भी कारोबार सामान्य होने के लिए कम से कम छह महीने जूझना होगा।

एडलवाइस के विश्लेषक अंकित हातलकर ने कहा कि अस्पतालों पर यह असर अचानक पड़ा है। यह तब तक बना रहेगा, जब तक भारत में कोरोनावायरस के मामले नियंत्रण में नहीं आ जाते। उन्होंने कहा, 'यह असर कब तक रहेगा, इसका अनुमान लगाने का कोई सटीक तरीका नहीं है। लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि अस्पतालों के लिए कारोबार सामान्य होने की उम्मीद अभी बहुत दूर है। पहले से तय की जाने वाली सर्जरी अब तक के सबसे निचले स्तर पर आ गई हैं। हमारा मानना है कि वित्त वर्ष 2021 की पहली छमाही में सर्जरी के मामले अत्यंत कम रहने के आसार हैं और वित्त वर्ष 2021 में आमदनी कमजोर रहेगी।' 

इसके अलावा अस्पताल कोविड-19 के मरीजों को संभालने के लिए अपने कर्मचारियों को तैयार नहीं कर पाए हैं, जिससे उन्हें परिचालन बंद करने को मजबूर होना पड़ रहा है। इसकी यह एक नमूना देखिए। पिछले 24 घंटे के दौरान मुंबई में कम से कम दो अस्पताल बंद हो गए क्योंकि उनके यहां मरीज पॉजिटिव पाए गए थे। ये अस्पताल ताड़देव में भाटिया हॉस्पिटल और मुलुंड में स्पंदन हैं। उदाहरण के लिए स्पंदन में करीब 65 डॉक्टरों और नर्सों को क्वारंटीन में रखा गया है। मुंबई में वॉकहार्ट और जसलोक जैसे प्रमुख अस्पतालों को पहले ही सील कर दिया गया है, जबकि इन दोनों अस्पतालों को कोविड-19 के मरीजों के इलाज का केंद्र बनाया गया था।

एक निजी अस्पताल के मालिक ने नाम न प्रकाशित करने का आग्रह करते हुए बताया, 'अस्पतालों को सबसे पहले अपने कर्मचारियों के लिए व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरणों (पीपीई) पर पैसा खर्च करने की जरूरत है, भले ही वे कोविड-19 के मरीजों का इलाज कर रहे हों या नहीं। इन किट की कीमत कम से कम 1,800 रुपये प्रति इकाई है। यही वजह है कि छोटे अस्पताल इन किट का इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं या दोबारा इस्तेमाल कर रहे हैं। कुछ एक ही किट पूरे दिन पहन कर रहे हैं, जिसके दौरान वे विभिन्न मरीजों की जांच कर रहे हैं। यह आपदा को न्योता देना है।'

निजी अस्पताल इस संकट को पार करने के लिए सरकार से प्रोत्साहन पैकेज या अन्य किसी तरह की सहायता की मांग कर रहे हैं। अस्पतालों में आने वाले मरीजों की संख्या 50 फीसदी घट गई है, जबकि आपूर्ति पर लागत 10 से 30 फीसदी बढ़ गई है। हाल में अपोलो हॉस्पिटल्स ग्रुप के वाइस-चेयरपर्सन प्रीता रेड्डी ने कहा, 'हमें बिजली, वेंटिलेटर और पूंजी खर्च जैसी बुनियादी लागतों पर प्रोत्साहन की दरकार है। उद्योग मिलकर सरकार से आग्रह करेगा क्योंकि हम एक तरफ मरीजों के इलाज को लेकर प्रतिबद्ध हैं। दूसरी ओर अगर यह उद्योग निजी क्षेत्र के रूप में अपना वजूद नहीं बचा पाया तो चिकित्सा प्रणाली पूरी तरह बैठ जाएगी।'

इस समय कोविड-19 की जांच और इलाज सस्ता नहीं है। हालांकि जांच की कीमतें कम हुई हैं। अपोलो उम्मीद कर रही है कि राज्य सरकार और केंद्र सरकार खर्च का एक निश्चित हिस्सा वहन करके जांच और इलाज की लागत को कम करें।

अस्पतालों के लिए वेतन, बिजली बिल, सालाना मरम्मत अनुबंध जैसे बहुत से तय खर्च हैं और ये किसी ठीकठाक अस्पताल के लिए कई करोड़ रुपये में होते हैं। एसोसिएशन ऑफ हेल्थकेयर प्रोवाइडर्स ऑफ इंडिया (एएचपीआई) के तमिलनाडु चैप्टर के अध्यक्ष और मीनाक्षी मिशन हॉस्पिटल ऐंड रिसर्च सेंटर के चेयरमैन एस गुरुशंकर ने कहा कि पहले से तय होने वाली सर्जरी और ओपीडी के लिए मरीज नहीं आने से कोई आमदनी नहीं हो रही है और सभी निजी अस्पताल मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं।

छोटे क्लीनिक और अस्पताल पहले ही बंद होने के कगार पर हैं। हालांकि गुरुशंकर ने कहा कि इस संकट की घड़ी में यह उद्योग सरकार के साथ है, लेकिन उद्योग की समस्या का कोई समाधान खोजा जाना चाहिए। छोटे अस्पतालों का दावा है कि यह उद्योग पहले ही करीब 10 फीसदी मार्जिन पर चलता है।

गुरुशंकर ने कहा, 'इस महीने ज्यादातर छोटे क्लीनिक वेतन नहीं दे सकते और कर्मचारी पहले ही छोड़कर चले गए हैं। अप्रैल के अंत से ज्यादा बड़े अस्पतालों के पास कार्यशील पूंजी खत्म हो जाएगी और वे अपने खर्च पूरे करने की स्थिति में नहीं होंगे। यह बहुत खतरनाक स्थिति है क्योंकि कर्मचारी काम पर नहीं आएंगे। ऐसा पहले ही कुछ अस्पतालों में हो रहा है। अगर अस्पतालों के पास कार्यशील पूंजी खत्म हो जाएगी तो यह बड़ी आफत होगी।' उद्योग ने मांग की है कि सरकार तीन महीने तक बिजली के बिल माफ करे, वस्तुु एवं सेवा कर (जीएसटी) में छूट दे और टैक्स एरियर जारी करे और अस्पतालों के अंग्रिम पंक्ति के कर्मचारियों की सुरक्षा के लिए कदम उठाए। सरकार से यह भी कहा गया है कि वह वेंडरों से सुरक्षा साजोसामान दिलाने में मदद करे। ये वेंडर पहले ही सरकारी अस्पतालों को आपूर्ति कर रहे हैं।

कुछ छोटे अस्पतालों ने पहले ही अपने परिसर सरकार को मुफ्त में मुहैया कराए हैं, लेकिन बिना कर्मचारियों के। मुंबई के पूर्व उपनगर चेंबूर में जॉय हॉस्पिटल ने अपना पूरा परिसर वृहनमुंबई नगर पालिका को मुहैया कराया है, जो इसका इस्तेमाल करीब 45 मरीजों को रखने मेें कर रही है।

अस्पताल की मालिक दीप्ति जॉय पाटणकर ने कहा, 'हमने अपने परिसरों के इस्तेमाल के लिए कोई किराया नहीं मांगा है, लेकिन वे इस अवधि के दौरान बिजली-पानी के बिलों का भुगतान करेंगे। हमारे पास करीब 85 बेड की क्षमता है।'

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