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कोरोनावायरस की देशबंदी में थमा एनसीआर का निर्यात इंजन

शुभायन चक्रवर्ती / नोएडा April 12, 2020

उत्तर भारत की तकलीफदेह गर्मी शुरू होने के पहले ही नोएडा की सड़कें वीरान पड़ गई हैं। नोएडा और ग्रेटर नोएडा के बीच सुनसान सड़क के किनारे आवासीय परिसर खाली हैं। इनमें से अधूरी पड़ी संपत्तियों के कुछ डेवलपरों ने पिछले साल आसपास के प्लॉटों को सरकार को बेचने का फैसला किया था, जहां सरकार ने दो बड़े औद्योगिक केंद्र बनाने की योजना बनाई थी।

पास के ही चाय विक्रेता मनोज ने कहा कि अब मई में निर्धारित तिथि पर इसका उद्घाटन संभव नहीं लगता। उन्होंने कहा कि भवन सामग्री से लदी ट्रकों की यहां कतार लगी रहती थी, जबकि कुछ सप्ताह से सड़कें खाली पड़ी हैं।

नोएडा के सब डिविजनल मजिस्ट्रेट ऑफिस के मुताबिक नोएडा-ग्रेटर नोएडा मेगा इंडस्ट्रियल जोन की 95 प्रतिशत इकाइयां इस समय बंद हैं।

दिल्ली से सटे उत्तर प्रदेश का गौतम बुद्ध नगर जिले की उत्तर भारत से इलेक्ट्रॉनिक्स, इंजीनियरिंग और परिधान निर्यात में बड़ी हिस्सेदारी है। राज्य के कोविड-19 के कुल मामलों में से 58 प्रतिशत से ज्यादा पॉजिटिव मामले इसी जिले से आए हैं।

केंद्र के सबसे बड़े और प्रभावी निर्यात क्लस्टर होने पर गर्व करने वाला यह बड़ा औद्योगिक शहर बड़े घाटे में नजर आ रहा है। इसकी बड़ी वजह यह है कि सिर्फ सरकार द्वारा संचालित विशेष आर्थिक क्षेत्र नोएडा-एसईजेड में स्थित 274 विनिर्माण इकाइयों में से पिछले मंगलवार को महज 7 चल रही थीं।  310 एकड़ क्षेत्र में फैले इस विशेष आर्थिक क्षेत्र में रत्न एवं आभूषण, इलेक्ट्रॉनिक्स और सॉफ्टवेयर जैसे सेक्टर के आधार पर सुविधाएं दी गई हैं। सरकार की ओर से बनाए चारों ओर से जमीन से घिरे एसईजेड में से एक इस एसईजेड में बड़े पैमाने पर कम और अर्धकुशल लोगों को रोजगार मिलता है। पिछले साल जनवरी महीने में इस जगह 40,000 से ज्यादा लोग कारोबार करते थे, जिसका सालना कारोबार 90 अरब रुपये था।

और बुरे हुए हालात

अब तक कुछ खुली हुई इकाइयों में से एक सहश्र इलेक्ट्रॉनिक्स के प्रबंध निदेशक अमृत मनवानी ने कहा, 'इन सभी लोगों की नौकरियां अब जा चुकी हैं। स्थिति को देखते हुए यह कहना बहुत कठिन होगा कि उत्पादन कब तक अधिकतम स्तर पर पहुंच सकेगा और कब तक लॉकडाउन खत्म होगा।' वेंटिलेटर सहित मेडिकल इलेक्ट्रॉनिक्स के निर्माता मनवानी मंगलवार को जिलाधिकारी कार्यालय के चक्कर काट रहे थे। उन्होंने कहा, 'हमने 2 इकाइयों में 200 से ज्यादा लोगों को रोजगार दिया है। लेकिन बमुश्किल 20 लोगों की मंजूरी मिली है। अब निर्यात बाध्यताएं पूरी कर पाना बहुत मुश्किल होगा।' उन्होंने कहा कि ढुलाई एक और बड़ी चुनौती है क्योंकि ज्यादातर अंतरराष्ट्रीय कारोबारी जैसे फेडेक्स और गति अब कह रहे हैं कि कंसाइनमेंट एयरपोर्ट तक पहुंचाएं क्योंकि उनके ट्रकों को सड़कों पर आवाजाही में समस्या हो रही है।

फार्मा, केमिकल्स, खाद्य प्रसंस्करण की फैक्टरियों को इस समय पूरी तरह छूट है, उसके बावजूद नौकरशाही का संकट बना हुआ है। साथ ही जरूरी प्रमाणपत्र पाने की राह में भ्रष्टाचार के मामले भी आ रहे हैं।

चल रही एक और इकाई के मालिक सुशील कांत गुप्ता ने कहा, 'निश्चित रूप से कोई एकरूपता नहीं है कि प्राधिकारी किस तरीके से जरूरी कारोबार करने के लिए प्रमाणपत्र दे रहे हैं।' एक हफ्ते तक बंदी के बाद उनकी रबर और प्लास्टिक की फैक्टरी फिर से खुल पाई है।

देशबंदी शुरू होने के बाद से ही केंद्र व राज्य सरकार की एजेसियों की ओर से सरकारी अधिसूचनाओं की बाढ़ आई हुई है और तमाम कारोबारियों तक वह पहुंच नहीं पा रही हैं।

असंख्य मुसीबतें

देश भर में वाटर प्यूरीफायर की आपूर्ति करने वाली केंट आरओ का नोएडा के पॉश इलाके सेक्टर 59 में मुख्य वितरण केंद्र व कॉर्पोरेट मुख्यालय बंद है। इसके चेयरमैन महेश गुप्ता ने कहा, 'मैंने जिलाधिकारी कार्यालय में अनुरोध किया कि कम से कम सर्विसिंग करने वाले हमारे लोगों को अनुमति दे दी जाए, जिससे खराब हो गए या सही काम नहीं कर रहे वाटर प्यूरीफायरों की मरम्मत की जा सके।'

नोएडा इलेक्ट्रॉनिक सिटी की गलियों में सैकड़ों की संख्या में छोटे कंपोनेंट निर्माता हैं। एक प्रिंटेड सर्किट बोर्ड निर्माता इकाई के प्रबंधक मनोहर कुमार कहते हैं, 'हाल में कई बार बिजली आपूर्ति बाधित हुई। अगर दो डिग्री तापमान भी बढ़ जाता है तो हमारे संयंत्र में भंडारित केमिकल्स बड़ा जोखिम बन सकते हैं। हम उन्हें कहीं हटा नहीं सकते हैं।'

बहरहाल इस अफरातफरी में कुछ सकारात्मक भी हुआ है। देशबंदी में गार्डों और वाचमैन का वेतन अचानक बढ़ गया है। सुनसान औद्योगिक इलाकों में सशस्त्र गार्डों की मांग बढ़ी है, जो औद्योगिक इलाकों में करोड़ों डॉलर के माल की निगरानी कर सकें। लेकिन हर कोई खुश नहीं है। दादरी मेन रोड पर गारमेंट्स से भरे गोदाम की अकेले निगरानी कर रहे सूरजलाल ने कहा, 'मुझे एक सप्ताह के 1,000 रुपये मिलते हैं। पिछले सप्ताह मैनेजर ने 500 रुपये रोज देने का वादा किया था, लेकिन अभी तक तो एक पैसा नहीं मिला है।'

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